लोकसेवा
चन्द्र गुप्त मौर्या के दीवान संत प्रवृति के व्यक्ति थे | अपना कामकाज करते हुए वह निजी तौर पर
अनेक लोगों की मदद करते रहते थे | एक दिन उनके सहायक ने उन्हें बताया कि एक
नवनियुक्त न्यायाधीश उनसे मिलना चाहते हैं | दीवान ने सत्कार पूर्वक न्यायाधीश को
बुलाकर आदर पूर्वक बैठाया तथा नाश्ते वगैरह की औपचारिकता पूरी की | यह सब शिष्टाचार निबट जाने पर
न्यायाधीश ने अपनी जेब से नोटों की एक गड्डी निकाली और दीवान साहब की तरफ बढाते
हुए बोले, “ये दस
हजार रूपये हैं | इन्हें लेकर आप मुझे ॠण मुक्त करने की कृपा करें |”
दीवान ने अचंभित होकर पूछा, “मैं तो आज से पहले आपसे कभी मिला
भी नहीं हूँ फिर मैनें आपको ॠण कब दिया ?”
न्यायाधीश ने बताया, “मैं आपकी रियासत की एक विधवा का बेटा हूँ | मेरी पढाई के लिए उन्होंने आपसे कुछ
ॠण लिया था | अपने अंतिम समय में उन्होंने मुझे कहा था कि जब मैं समर्थ हो जाऊं तो
यह ॠण उतार दूं |”
दीवान थोड़ी देर विचारों में मग्न होने के बाद बोले, “आपकी बात सत्य होगी परन्तु आपका इस
तरह ॠण चुकाना मुझे वाजिब नहीं लगता |”
इस बार न्यायाधीश ने हैरान होकर पूछा, “कैसे, श्री मान ?”
दीवान साहब ने बड़ी ही सद्भावना से जवाब दिया, “आप इन रूपयों को मुझे देने की बजाय
इनमें कुछ और मिलाकर जरूरतमंद व्यक्तियों की मदद करें और साथ में उन्हें प्रेरित
करें कि वे भी समर्थ होकर ऐसे लोकोपकारी कार्य को आगे बढ़ाएँ | लोकसेवा की ऐसी परम्परा को गति देकर
ही आप ॠण मुक्त हो सकेंगे |”
इसी प्रकार वैश्य वैभव चेरिटेबल ट्रस्ट जिन व्यक्तियों को आर्थिक
सहायता प्रदान करता है उन्हें संकल्प लेना चाहिए कि भविष्य में जब भी वे आर्थिक
स्थिति से सुदृड एवम समर्थ हो जाएँगे तो ‘दस पैसे समाज को’ के नारे का अनुशरण
अवश्य करेंगे |
चरण सिंह गुप्ता
मो. 09313984463