Sunday, September 20, 2026

गीत का रहस्य

 

गीता का रहस्य

युवा पथ मासिक पत्रिका अंक ९ मई २०१२ में संत विनोबा भावे जी ने श्री भगवदगीता के उपदेशों के असर को, उनकी अपनी माता के दूध से प्राप्त अपने ह्रदय और बुद्धि के पोषण के समकक्ष बताया है | वास्तव में गीता पढने का यही रहस्य है |

एक बूढा व्यक्ति, प्रत्येक दिन की तरह, कोयले की सुलगती अंगीठी के पास बैठकर गीता पढ़ रहा था | कोयले की खाली टोकरी वहीं पास में रखी थी | बूढ़े को पढते देख उसके पोते ने जिज्ञासावश पूछा, दादा जी इस गीता को आपने सैकड़ों बार पूरा पढ़ लिया है | आपकी देखा देखी मैनें भी आपका अनुशरण किया परन्तु न तो मुझे यह याद हो पाई और न ही मैं इसे अधिक समझ पाया | मुझे नहीं लगता कि आपको भी इसके पढ़ने से जीवन में इसका कुछ लाभ हुआ होगा | इसलिए मेरे विचार से आप इसे बार बार पढकर अपना समय व्यर्थ नष्ट कर रहे हैं ?

दादा ने बड़े संयम से अपने पोते का तर्क सुनने के बाद, अपने पास रखी कोयले की खाली टोकरी उसे थमाते हुए कहा, जाओ सामने की नदी से इस टोकरी को जल से भर लाओ |

लड़के ने टोकरी उठाई और नदी की तरफ चला गया | उसने टोकरी को जल में डुबोया और वापिस आ गया | परन्तु यह क्या ? उसने देखा कि टोकरी तो खाली थी |

दादा ने ऐसे ही तीन चार बार अपने पोते को उस टोकरी में पानी भरने के लिए भेजा परन्तु पानी से भरी टोकरी लाने में हर बार लड़के का प्रयास नाकामयाब रहा | अंत में वह झल्लाकर टोकरी को फैंकते हुए बोला, इस टोकरी में जल भरना मूर्खता ही कहलाएगी |
इस पर दादा जी ने अपने पोते को बड़े प्यार से अपने पास बुलाकर तथा टोकरी को दिखाकर पूछा,
तुम्हारे प्रयास के कारण क्या तुम्हें इस टोकरी में कुछ बदलाव नजर नहीं आ रहा ?

जब लड़के ने टोकरी को ध्यान से देखा तो अचानक उसकी आखों में चमक उभर आई और चिल्लाया, अरे, यह टोकरी तो साफ़ होकर चमक रही है |

अब दादा ने अपने पोते के सिर पर प्रेम पूर्वक हाथ फेर कर समझाया, देखो, टोकरी जल से भरी तो न जा सकी परन्तु नदी के जल में बार बार डुबकी लगाने से उसमें अंदर बाहर से चमक आ गयी है | उसी प्रकार गीता को बार बार पूरा पढ़ने मात्र से ही, चाहे कोई इसका पूरा सार समझ नहीं पाए या अपने मन में समा नहीं पाए, यह मनुष्य को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रतिभावान बना देती है | यही गीता पढ़ने का रहस्य है |

 

Wednesday, August 5, 2026

ईश्वर दर्शन

 

ईश्वर दर्शन

सरस्वती चंद्र तीर्थयात्रा पर जा रहे थे। लंबे और कठिन सफर को देखते हुए साथ में बर्तन, भोजन और जरूरत का अन्य सामान भी था। रास्ते में एक गांव पार करते हुए वह वहां के एक वीरान मंदिर में रुक गए। पहले तो सोचा कि यहां कोई नहीं होगा पर मंदिर के अंदर गए तो देखा एक बीमार वृद्ध कराह रहे हैं। उनकी हालत देख लगता था कि उन्होंने काफी दिनों से कुछ खाया हो। सरस्वती चंद्र को उन पर दया गई। उन्होंने कुछ समय वहीं रुककर उनकी सेवा करने का फैसला किया। उन्होंने अपने कपड़े उस वृद्ध सज्जन को पहना दिए। अपने सारे बर्तन मंदिर के उपयोग के लिए रख दिए। अपना भोजन भी उन्हें खिला दिया। फिर आसपास से फल और कुछ औषधियां ले आए।

खाली समय में सरस्वती चंद्र मंदिर की सफाई में लगे रहते। इस तरह मंदिर का कायाकल्प हो गया। इधर वृद्ध सज्जन धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगे। कुछ दिनों के बाद सरस्वती चंद्र बिना तीर्थधाम गए ही घर वापस गए। घर वालों ने इस तरह आने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि रास्ते में ही उन्हें ईश्वर के दर्शन हो गए। इसलिए आगे जाने की उन्होंने कोई आवश्यकता ही नहीं समझी और लौट आए। इधर मंदिर के पुनरोद्धार हो जाने से लोग वहां फिर से आने-जाने लगे। इस तरह सूने पड़े मंदिर में रौनक लौट आई। वहां वह वृद्ध सज्जन हर किसी को यह बताते थे कि एक दिन यहां ईश्वर आए थे। उन्होंने ही इस मंदिर को तीर्थ बनाया और मुझे जीवन-दान दिया।

Saturday, August 1, 2026

प्रायश्चित

 

प्रायश्चित

एक मशहूर संत थे | उनकी कुटिया शहर से बाहर एक पहाड़ी की तलहटी में थी | पहाड़ी की चोटी से एक झरना बहता हुआ संत की कुटिया के पास से गुजरता था | चारों और हरियाली एवम बेशुमार पेड़ पौधों के कारण वह एक रमणीक स्थान था तथा पेड़ों पर बसर करने वाले विभिन्न प्रकार के पक्षियों की चहचाहट उस स्थान को और भी मनमोहक बना देती थी | संत को अक्सर पक्षी वाले बाबा के नाम से भी जाना जाता था क्योंकि उन्हें पक्षियों से बहुत लगाव था और वे उनके लिए अपनी कुटिया के पास बहुत सा दाना डाला करते थे |

एक बार एक आदमी उनके पास आया वह बहुत उदास एवम बेचैन दिख रहा था | उसने संत के पैर पकड़ कर कहा, “बाबा अक्सर मुझे छोटी सी बात पर ही गुस्सा आ जाता है और मैं अपना आपा खो देता हूँ | सामने वाला चाहे जो हो मैं उसे बुरा भला कह देता हूँ लेकिन बाद में अपने व्यवहार पर खुद ही पछताने लगता हूँ | कल फिर मेरे साथ ऐसा ही हुआ जब मैनें अपने सबसे प्रिय मित्र को खरी खोटी सुना दी | अब मैं पछता रहा हूँ और प्रायश्चित करना चाहता हूँ | कृप्या मेरा मार्ग दर्शन करें |

उस व्यक्ति की बात सुनकर संत ने उसे अपनी कुटिया के पास फैले पक्षियों के पंख चुनकर एक थैले में भर लाने को कहा और जब वह व्यक्ति थैला भर लाया तो संत ने उससे कहा, “जाओ जाकर थैला शहर के बीच चौक पर खाली कर दो | 

संत के कहे अनुसार उस व्यक्ति ने वैसा ही किया और वापिस आ गया | अब संत ने कहा, “वत्स तुम्हारा प्रायश्चित तब पूरा होगा जब तुम उन पंखो को वापिस ले आओगे जिन्हें तुम चौराहे पर फेंक आए थे |

वह व्यक्ति बोला, “स्वामी जी यह कैसे संभव है | पंख तो न जाने कहाँ कहाँ उड़ गए होंगे ?

इस पर संत ने जवाब दिया, “बेटा आपके मुंह से अपने दोस्त के लिए निकले अपशब्द भी तो उड़ चुके हैं वे वापिस कैसे आ सकते हैं ?

संत का जवाब सुनकर व्यक्ति सन्न रहा गया | उसे किंकर्तव्यमूढ़ देखकर संत ने उसे समझाया, “बेटा जैसे तीर से निकला बाण वापिस नहीं आता उसी प्रकार मुहं से निकले अपशब्द वापिस नहीं आते इसलिए हर परिस्थिति में अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए जिससे दूसरों को तकलीफ न पहुंचे और खुद को प्रायश्चित करने की नौबत न आए |

 

Wednesday, July 8, 2026

लोक सेवा

 

लोकसेवा

चन्द्र गुप्त मौर्या के दीवान संत प्रवृति के व्यक्ति थे | अपना कामकाज करते हुए वह निजी तौर पर अनेक लोगों की मदद करते रहते थे | एक दिन उनके सहायक ने उन्हें बताया कि एक नवनियुक्त न्यायाधीश उनसे मिलना चाहते हैं | दीवान ने सत्कार पूर्वक न्यायाधीश को बुलाकर आदर पूर्वक बैठाया तथा नाश्ते वगैरह की औपचारिकता पूरी की | यह सब शिष्टाचार निबट जाने पर न्यायाधीश ने अपनी जेब से नोटों की एक गड्डी निकाली और दीवान साहब की तरफ बढाते हुए बोले, “ये दस हजार रूपये हैं | इन्हें लेकर आप मुझे ॠण मुक्त करने की कृपा करें |

दीवान ने अचंभित होकर पूछा, “मैं तो आज से पहले आपसे कभी मिला भी नहीं हूँ फिर मैनें आपको ॠण कब दिया ?

न्यायाधीश ने बताया, “मैं आपकी रियासत की एक विधवा का बेटा हूँ | मेरी पढाई के लिए उन्होंने आपसे कुछ ॠण लिया था | अपने अंतिम समय में उन्होंने मुझे कहा था कि जब मैं समर्थ हो जाऊं तो यह ॠण उतार दूं |

दीवान थोड़ी देर विचारों में मग्न होने के बाद बोले, “आपकी बात सत्य होगी परन्तु आपका इस तरह ॠण चुकाना मुझे वाजिब नहीं लगता |

इस बार न्यायाधीश ने हैरान होकर पूछा, “कैसे, श्री मान ? 

दीवान साहब ने बड़ी ही सद्भावना से जवाब दिया, “आप इन रूपयों को मुझे देने की बजाय इनमें कुछ और मिलाकर जरूरतमंद व्यक्तियों की मदद करें और साथ में उन्हें प्रेरित करें कि वे भी समर्थ होकर ऐसे लोकोपकारी कार्य को आगे बढ़ाएँ | लोकसेवा की ऐसी परम्परा को गति देकर ही आप ॠण मुक्त हो सकेंगे |

इसी प्रकार वैश्य वैभव चेरिटेबल ट्रस्ट जिन व्यक्तियों को आर्थिक सहायता प्रदान करता है उन्हें संकल्प लेना चाहिए कि भविष्य में जब भी वे आर्थिक स्थिति से सुदृड एवम समर्थ हो जाएँगे तो ‘दस पैसे समाज को’ के नारे का अनुशरण अवश्य करेंगे |  

चरण सिंह गुप्ता

मो. 09313984463