गोपनीयता
1 जुलाई 2024, आज मेरी पुत्र वधू चेतना, धर्म
पत्नी मेरे बड़े पुत्र प्रवीण कुमार मंगल, (पूज्य माता जी, मेरी पौत्री चक्षु मंगल तथा
मेरे पौत्र नयन मंगल,) का जन्म दिन था | चेतना देहली की एक पाठशाला
में अध्यापिका के पद पर कार्यरत थी | उसे सुबह 6 बजे घर से निकल जाना पड़ता था तथा
वह शाम के चार बजे के लगभग ही वापिस घर पहुँच पाती थी |
इस वर्ष गर्मी का मौसम अपना तांडव दिखा रहा था |
गर्मी अधिक होने की वजह से और चेतना को सफ़र की थकावट मिटाने का समय देने की सोचकर
मैनें शाम सात बजे बाद ही उसके घर जाकर आशीर्वाद देने का विचार बनाया था |
मेरा पुत्र अपने परिवार के साथ मकान नंबर 1023 में
रहता है जो उसने अभी नया ही बनाया था | जबकि हम पति-पत्नी अपने पुराने मकान नम्बर
973 सैक्टर 23 ए में निवास करते हैं | दोनों मकान के बीच का फासला केवल इतना है कि
एक घर से दूसरे घर पैदल तीन मिनट में पहुँचा जा सकता है | जब प्रवीण और चेतना ने अपना
गृह प्रवेश किया था तो उन्होंने हमसे बहुत आग्रह किया था कि हम दोनों भी उनके साथ 1023
में ही रहें | परन्तु मेरी पत्नी सन्तोष की अपने पुराने मकान में रहने की जिद ने
ऐसा नहीं होने दिया था | उस समय मनोज जी, प्रभा, प्रवीण, चेतना तथा मेरे छोटे
पुत्र के समझाने पर भी मेरी पत्नी टस से मस न हुई ? हालांकि उस समय सामाजिक
द्रष्टि तथा बेटों के सामर्थ्ग तथा सेवा भाव को भांपते हुए मुझे भी अपने दोनों
बेटों से अलग अपना घर बसाना अच्छा नहीं लगा था |
मैं चेतना को जन्म दिन की हार्दिक शुभ कामना
देने के मकसद से उनके निवास पर शाम 7:30 बजे के लगभग पहुँचा | अपनी पौत्री चक्षु
को वहां पाकर प्रसन्नता के साथ आश्चर्य भी हुआ | चक्षु, नेशनल ब्रेन रिसर्च सैन्टर
– मानेसर गुरुग्राम के छात्रावास में रहकर पी. एच. डी. कर रही है | अमूमन वह इतनी
व्यस्त रहती है कि एक दिन के लिए आने में भी वह आनाकानी करती है तथा एक सप्ताह
पहले ही वह यहाँ आई थी | खैर अपनी मम्मी जी के स्पेशल दिन पर आकर उनकी संगत पाना
भी सौभाग्य की बात होती है | मैंने चेतना को आशीर्वाद दिया और बैठ गया |
इस समय रात के आठ बज चुके थे | मेरे वहां बैठने
पर चेतना हमेशा पूछती थी कि पापा जी फल वगैरह दूं या चाय , काफी, कुछ लोगे परन्तु उस दिन एक बार दिखाई देने के
बाद वह फिर दिखाई नहीं दी | प्रवीण, चक्षु तथा नयन के व्यवहार से भी मुझे ऐसा
महसूस हो रहा था जैसे मैं किसी अनजान के घर बिना बुलाया मेहमान आ गया था | मैं ये
सोचकर उनके दर से उठा था कि वे रोक लेंगे परन्तु कहीं से कोइ आवाज सुनाई नहीं दी
और मैं रात 8:30 बजे उनके घर से बाहर आ गया था |
रास्ते में मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि चेतना
को पता था कि वह मेरा खाने का समय होता है फिर भी आज उसने एक बार भी खाने के लिए
नहीं टोका | टोकना तो दूर दोबारा वह दिखाई भी नहीं दी थी | इसका क्या कारण रहा
होगा इसी उधेड़बुन में मैं अपने घर पहुँच गया |
मुझे रात का खाना खिलाकर मेरी पत्नी सन्तोष
चेतना को जन्म दिन की बधाई देने उसके घर गयी तो पाया कि वहां ताला लगा हुआ था तथा
घर के चारों सदस्य कहीं गए हुए थे | वापिस आकर जब सन्तोष ने मुझे इस बारे में
बताया तो मुझे सारी बातें समझ आ गयी तथा मेरी शंका का समाधान भी हो गया कि चेतना
ने मुझे खाने के लिए क्यों नहीं टोका था | परन्तु मुझे इस बात का मलाल होने लगा कि
उनमें से किसी सदस्य ने भी इसकी भनक भी न लगने दी और सब कुछ गोपनीय रखा |
जब
प्रवीण के परिवार ने मकान 1023 में रहना शुरू किया था तो हर सदस्य ने बहुत जोर
दिया था कि हम दोनों उनके साथ रहें | उस समय मनोज जी, प्रभा, प्रवीण, चेतना तथा पवन
के बार बार आग्रह करने के बावजूद सन्तोष अपने फैसले से टस से मस न हुई | अत: सन्तोष
के अपने पुराने मकान 973 के प्रति लगाव तथा वहीं पर ही रहने की जिद के कारण हमनें
अपना अलग घर बसाए रखा था | हालांकि रात का खाना
अधिकतर हम 1023 पर ही खाते थे परंतु उस समय सामाजिक द्रष्टि से मुझे भी अपने बच्चों से अलग घर बसाए रखना
उचित नहीं लगा था |
2 जुलाई को जब प्रवीण 973 पर आया तब उसकी मम्मी
ने पूछा, “कल रात कहाँ चले गए थे “? प्रवीण ने सकपकाते हुए अपनी झूठ बोलने की
आदतानुसार हेरा फेरी में जवाब देते हुए कहा, “चक्षु को कुछ सामान खरीदना था | अत:
उसके साथ चले गए थे “|
सन्तोष के प्रवीण से पूछने तथा उसके जवाब के
कारण मुझे मेरा सोचना सही लगा कि कल वे सब चेतना का जन्म दिन मनाने किसी
रेस्टोरेंट में खाना खाने गए होंगे क्योंकि 1 जुलाई को रात 8:30 बजे तक उनकी रसोई
ठंडी पडी थी | यही कारण रहा होगा कि चेतना ने मुझ से खाने की नहीं पूछी थी |
अत: आज मुझे महसूस हुआ कि, जब तक समर्थ हैं, संतोष का फैसला, हमारा बच्चो से अलग रहने का फैसला किसी हद तक
सही था | क्योंकि बच्चों के साथ रहते तो उनकी ऐसी गोपनीयता पर प्रहार होते रहते
जैसी कल रात उन्होंने दर्शाने की कोशिश की थी |
यही गोपनीयता सामने आने पर परिवार में कलह का
कारण बनती हैं |