Saturday, August 1, 2026

प्रायश्चित

 

प्रायश्चित

एक मशहूर संत थे | उनकी कुटिया शहर से बाहर एक पहाड़ी की तलहटी में थी | पहाड़ी की चोटी से एक झरना बहता हुआ संत की कुटिया के पास से गुजरता था | चारों और हरियाली एवम बेशुमार पेड़ पौधों के कारण वह एक रमणीक स्थान था तथा पेड़ों पर बसर करने वाले विभिन्न प्रकार के पक्षियों की चहचाहट उस स्थान को और भी मनमोहक बना देती थी | संत को अक्सर पक्षी वाले बाबा के नाम से भी जाना जाता था क्योंकि उन्हें पक्षियों से बहुत लगाव था और वे उनके लिए अपनी कुटिया के पास बहुत सा दाना डाला करते थे |

एक बार एक आदमी उनके पास आया वह बहुत उदास एवम बेचैन दिख रहा था | उसने संत के पैर पकड़ कर कहा, “बाबा अक्सर मुझे छोटी सी बात पर ही गुस्सा आ जाता है और मैं अपना आपा खो देता हूँ | सामने वाला चाहे जो हो मैं उसे बुरा भला कह देता हूँ लेकिन बाद में अपने व्यवहार पर खुद ही पछताने लगता हूँ | कल फिर मेरे साथ ऐसा ही हुआ जब मैनें अपने सबसे प्रिय मित्र को खरी खोटी सुना दी | अब मैं पछता रहा हूँ और प्रायश्चित करना चाहता हूँ | कृप्या मेरा मार्ग दर्शन करें |

उस व्यक्ति की बात सुनकर संत ने उसे अपनी कुटिया के पास फैले पक्षियों के पंख चुनकर एक थैले में भर लाने को कहा और जब वह व्यक्ति थैला भर लाया तो संत ने उससे कहा, “जाओ जाकर थैला शहर के बीच चौक पर खाली कर दो | 

संत के कहे अनुसार उस व्यक्ति ने वैसा ही किया और वापिस आ गया | अब संत ने कहा, “वत्स तुम्हारा प्रायश्चित तब पूरा होगा जब तुम उन पंखो को वापिस ले आओगे जिन्हें तुम चौराहे पर फेंक आए थे |

वह व्यक्ति बोला, “स्वामी जी यह कैसे संभव है | पंख तो न जाने कहाँ कहाँ उड़ गए होंगे ?

इस पर संत ने जवाब दिया, “बेटा आपके मुंह से अपने दोस्त के लिए निकले अपशब्द भी तो उड़ चुके हैं वे वापिस कैसे आ सकते हैं ?

संत का जवाब सुनकर व्यक्ति सन्न रहा गया | उसे किंकर्तव्यमूढ़ देखकर संत ने उसे समझाया, “बेटा जैसे तीर से निकला बाण वापिस नहीं आता उसी प्रकार मुहं से निकले अपशब्द वापिस नहीं आते इसलिए हर परिस्थिति में अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए जिससे दूसरों को तकलीफ न पहुंचे और खुद को प्रायश्चित करने की नौबत न आए |

 

Wednesday, July 8, 2026

लोक सेवा

 

लोकसेवा

चन्द्र गुप्त मौर्या के दीवान संत प्रवृति के व्यक्ति थे | अपना कामकाज करते हुए वह निजी तौर पर अनेक लोगों की मदद करते रहते थे | एक दिन उनके सहायक ने उन्हें बताया कि एक नवनियुक्त न्यायाधीश उनसे मिलना चाहते हैं | दीवान ने सत्कार पूर्वक न्यायाधीश को बुलाकर आदर पूर्वक बैठाया तथा नाश्ते वगैरह की औपचारिकता पूरी की | यह सब शिष्टाचार निबट जाने पर न्यायाधीश ने अपनी जेब से नोटों की एक गड्डी निकाली और दीवान साहब की तरफ बढाते हुए बोले, “ये दस हजार रूपये हैं | इन्हें लेकर आप मुझे ॠण मुक्त करने की कृपा करें |

दीवान ने अचंभित होकर पूछा, “मैं तो आज से पहले आपसे कभी मिला भी नहीं हूँ फिर मैनें आपको ॠण कब दिया ?

न्यायाधीश ने बताया, “मैं आपकी रियासत की एक विधवा का बेटा हूँ | मेरी पढाई के लिए उन्होंने आपसे कुछ ॠण लिया था | अपने अंतिम समय में उन्होंने मुझे कहा था कि जब मैं समर्थ हो जाऊं तो यह ॠण उतार दूं |

दीवान थोड़ी देर विचारों में मग्न होने के बाद बोले, “आपकी बात सत्य होगी परन्तु आपका इस तरह ॠण चुकाना मुझे वाजिब नहीं लगता |

इस बार न्यायाधीश ने हैरान होकर पूछा, “कैसे, श्री मान ? 

दीवान साहब ने बड़ी ही सद्भावना से जवाब दिया, “आप इन रूपयों को मुझे देने की बजाय इनमें कुछ और मिलाकर जरूरतमंद व्यक्तियों की मदद करें और साथ में उन्हें प्रेरित करें कि वे भी समर्थ होकर ऐसे लोकोपकारी कार्य को आगे बढ़ाएँ | लोकसेवा की ऐसी परम्परा को गति देकर ही आप ॠण मुक्त हो सकेंगे |

इसी प्रकार वैश्य वैभव चेरिटेबल ट्रस्ट जिन व्यक्तियों को आर्थिक सहायता प्रदान करता है उन्हें संकल्प लेना चाहिए कि भविष्य में जब भी वे आर्थिक स्थिति से सुदृड एवम समर्थ हो जाएँगे तो ‘दस पैसे समाज को’ के नारे का अनुशरण अवश्य करेंगे |  

चरण सिंह गुप्ता

मो. 09313984463

Tuesday, June 23, 2026

सहज पके सो मीठा होए

 

सहज पके सो मीठा होए

 

इस संसार में प्रत्येक जन्म लेने वाले प्राणी की उसके गर्भाशय में पड़ने से पैदा होने तक कुछ अवस्थाएं होती हैं जिन्हें पूरा करने के बाद ही वह इस संसार में अवतरित होने के बाद स्वथ्य जीवन व्यतीत करता है | परन्तु इन अवस्थाओं में अगर कोई व्यवधान आ जाए तो प्राणी के जीवन भर किसी न किसी रूप में नकारा हो जाने का डर लगा रहता है | 

एक तितली के जीवन की चार अवस्थाएं होती हैं अंडा, लार्वा, प्यूपा और पूर्ण तितली | हर अवस्था अपना एक खास महत्त्व रखती है तथा प्राणी के चहूँ विकास के लिए सहायक सिद्द होती है | एक बार एक संत बाग में अपना डेरा जमाए था | उसने देखा कि एक तितली अपने प्यूपा से बाहर निकलने के लिए जी जान से कोशिश कर रही थी | वह पस्त होकर थोड़ी देर के लिए शांत हो जाती थी परन्तु बाहर निकलने के लिए फिर प्रयत्न शुरू कर देती थी | संत से, अपने दयालु स्वभाव वश, तितली की यह दशा देखी नहीं गई | संत ने तितली की सहायता करने हेतू एक पैनी वस्तु लेकर प्यूपा का मुहं काटकर चौड़ा कर दिया जिससे तितली आसानी से बाहर निकल गई | संत अपना काम करके निश्चिन्त बैठ गया और तितली के उड़ जाने की प्रतीक्षा करने लगा | परन्तु यह क्या, तितली उड़ न सकी |

संत को घोर पश्चाताप हुआ जब उसे पता चला कि प्यूपा से बाहर निकलते वक्त जोर लगाने के कारण ही तितली के  पंखों की नसों में वह द्रव प्रवाहित होता है जो उसके पंखों में मजबूती भरता है तथा उसे उड़ने में समर्थ बनाता है |

वह तितली जीवन भर उड़ न सकी |

समाचार पत्रों के माध्यम से पता चलता है कि वर्त्तमान युग के पढ़े लिखे, बहुत से दम्पती अपने बच्चों के जन्म दिन को स्पेशल तथा यादगार बनाने हेतू, प्रसूति का समय न आने के बावजूद, तिथि जैसे १२-१२-१२, नव वर्ष, दीपावली और अपने जन्म दिन इत्यादि को आपरेशन करवा कर जन्म दिलाने की मंशा बना लेते हैं |

मैं संसार के प्रत्येक डाक्टर से निवेदन करता हूँ कि, अपने व्यवसाय की गरिमा को कायम रखते हुए, वे ऐसे सोचने वाले दम्पतियों को उचित सलाह देकर देश के आने वाले कर्णधारों के शरीर में जहर फैलने से बचाएं | अन्यथा नवजीवन किसी न किसी रूप में अपाहिज हो जाएगा और माँ बाप संत की तरह जीवन भर पश्चाताप ही करते रह जाएंगे |

धन्यवाद |

Sunday, May 17, 2026

कोयला और चंदन

 

 

कोयला और चंदन

 

हकीम लुकमान का पूरा जीवन जरूरतमंदों की सहायता के लिए समर्पित था। जब उनका अंतिम समय

नजदीक आया तो उन्होंने अपने बेटे को बुलाया और कहा- बेटा, मैंने अपना सारा जीवन दुनिया को

शिक्षा देने में गुजार दिया। अब अपने अंतिम समय में मैं तुम्हें कुछ जरूरी बातें बताना चाहता हूं। तुम

एक कोयला और चंदन का एक टुकड़ा उठा लाओ। बेटे को पहले तो यह अटपटा लगा लेकिन उसने

सोचा कि जब पिता का हुक्म है तो यह सब लाना ही होगा। उसने रसोई घर से कोयले का एक टुकड़ा

उठाया। संयोग से घर में चंदन की एक छोटी लकड़ी भी मिल गई। वह दोनों लेकर अपने पिता के पास

गया।

लुकमान बोले- अब इन दोनों चीजों को नीचे फेंक दो। बेटे ने दोनों चीजें नीचे फेंक दी और हाथ धोने

जाने लगा तो लुकमान बोले- ठहरो बेटा, जरा अपने हाथ तो दिखाओ। फिर वह उसका कोयले वाला

हाथ पकड़कर बोले-बेटा, देखा तुमने। कोयला पकड़ते ही हाथ काला हो गया। लेकिन उसे फेंक देने के

बाद भी तुम्हारे हाथ में कालिख लगी रह गई। गलत लोगों की संगति इसी तरह होती है। उनके साथ

रहने पर भी दुख होता है और उनके न रहने पर भी जीवन भर के लिए बदनामी साथ लग जाती है।

दूसरी ओर सज्जनों का संग इस चंदन की लड़की की तरह है जो साथ रहते हैं तो दुनिया भर का ज्ञान

मिलता है और उनका साथ छूटने पर भी उनके विचारों की महक जीवन भर साथ रहती है। इसलिए

हमेशा अच्छे लोगों की संगति में ही रहना। तुम्हारा जीवन सुखद रहेगा।

Wednesday, November 12, 2025

आतम तृप्ति (उपन्यास) भाग-1

 आत्म-तृप्ति

I

उत्तर प्रदेश में जिला बुलन्द शहर का एक छोटा सा कस्बा डिबाई | डिबाई का नाम कई कारणों से काफी प्रसिद्ध है | एक तो आसपास के बहुत से गाँवों के लिये यही एकमात्र बाजार है | दूसरे यहाँ वृहस्पतिवार को पैंठ लगती है जिसमें आसपास के गाँवों से कारिन्दे अपना अपना बनाया सामान बेचने के लिये यहाँ पटरियों पर बाजार लगाते हैं | इस बाजार में, घरों में इस्तेमाल होने वाला, छोटे से छोटा तथा बडे से बडा सामान मिल जाता है | अर्थात सुई से लेकर सोफे तक | वैसे तो यहाँ के बाजारों में रोजाना ही अच्छी खासी भीड़ रहती है परंतु पैंठ वाले दिन तो बाजार की सड़कों पर तिल रखने की भी जगह नहीं मिलती | तीसरे देहली से बदायूँ जाने का एकमात्र रास्ता यही है | चौथे गंगा नदी पर नरौरा बिजली परियोजना के लिये डिबाई ही वहाँ की जरूरतों को पूरा करता है | पाँचवे राजघाट या नरौरा पर गंगा स्नान के लिये आने वाले यात्री भी अपना पडाव डिबाई को ही बनाते हैं |

वीरवार का दिन था | शहर में चहल पहल थी | कस्बे के एक समृद्ध व्यक्ति लाला मुंशी राम जी के पौत्र एवं लाला जय प्रकाश के जुड़वां पुत्र आमोद तथा प्रमोद के गंगा चढाने का उत्सव था | घर में इस बाबत तैयारियाँ लगभग पूरी हो चुकी थी फिर भी इस मकसद से कि कहीं कोई त्रुटी न रह गई हो लाला मुंशी राम आसवस्त होने के लिए हर काम का खुद जायजा लेते हुए मुआईना करने लगे |

अपनी पारखी नजरों से देखते हुए वे आगे बढे तथा ताकीद करने लगे कि कौन सा काम कैसे करना है तथा किसे करना है | आँगन के एक कौने में औरतों को गीत गाते सुनकर अपनी पत्नि को आवाज लगाते हुए, "अजी सुनती हो, ये औरतें कैसी मरी मरी आवाज में गीत गा रही हैं | इनसे कहो कि जरा जोर से आवाज बुलन्द करके गाऐं जिससे बाहर आस पडौस में भी पता चले कि उत्सव का शुभारम्भ हो गया है |

गीत गाने वाली सभी औरतें लाला जी की आवाज बखूबी पहचानती थी अत: आवाज सुनते ही उनमें जोश भर गया और वे मुखर आवाज में गाने लगी |

बजरंगी देख यहाँ कोना खाली पडा है एक गलीचा यहाँ भी बिछवा दे |

अच्छा मालिक |

पंडित जी गंगा पर ले जाने वाले क्लश अभी सूने क्यों हैं | इन पर सतिया नहीं बनेगा क्या ? और पूजा वगैरह का सामान तो सब पूरा होगा | एक बार और जाँच करलो कहीं कोई कमी न रह जाए | सारा सामान अपने ही पास रख लो अब यह आप की जिम्मेदारी है |

बिलकुल सेठ जी, मैं सब सम्भाल लूंगा |   

अरे ये पर्दे किसने टाँगे हैं ? इनको उतरवाकर पहले प्रैस करवाओ फिर टाँगना | कितने भद्दे लग रहे हैं |

मालिक अभी करवा देता हूँ |

बेटा माला तू अभी तैयार नहीं हुई ?

बस हो ही रही हूँ पिता जी |

सभी चलने को तैयार हैं और तू अभी तक ऐसे ही घूम रही है | चल नया सूट पहन कर जल्दी से तैयार हो जा |

पिता जी मेरी चुनरी नहीं मिल रही |

बेटा शालू देख तो इसकी चुनरी कहाँ है ?

जी पिता जी |

बेटा जय प्रकाश क्या सारी गाडियाँ आ गई ?

हाँ पिता जी, उन्हें फूलों से सजवा भी दिया है |

बहुत अच्छा किया | अब खाने पीने का सारा सामान एक गाडी में लदवा दो ?

हाँ पिता जी भाई ब्रह्म प्रकाश यह काम करवा रहा है |

सभी औरतों को एक ही गाडी में बिठवा देना |

ठीक है पिता जी |

और हाँ औरतों की गाडी को और गाडियों के बीच में चलाने को कहना | तथा चलाने वाले को यह भी पक्की हिदायत दे देना कि वह सावधानी से हाँके |

अच्छा पिताजी आपके कहे अनुसार करवा दूंगा |

ऊं ..........कुछ सोचते हुए, वे दिल्ली वाले कहीं दिखाई नहीं दे रहे | क्या वे अभी पहूँचे नहीं ?

पिताजी उनकी खबर आई थी कि वे दस बजे वाली बस से आएँगे,फिर कलाई पर बंधी घडी की और देख कर, दस बजने वाले हैं आते ही होंगे |

क्या कोई लिवाने भी भेजा है ?

नहीं अभी तो कोई नहीं भेजा |

समय हो गया है बेटा किसी को भेज दो,फिर स्वंय ही, अरे ओ राजू जा देख 10 बजे वाली बस पर दिल्ली वाले आते होंगे उन्हें लिवा ला | उन्हें पहचानता हो होगा ?

नहीं सेठ जी |

माला जो वहाँ खडी सब कुछ सुन रही थी, पिता जी क्या राजू के साथ मैं चली जाऊं ?

लाला मुंशी राम माला को ऊपर से नीचे तक देखकर, पर तू तो अभी तैयार भी नहीं हुई है ?

आकर हो जाऊंगी | देर ही क्या लगती है तैयार होने में |

अच्छा जा | राजू देख जरा ध्यान से ले जाना माला को क्योंकि आज बाजार में बहुत भीड् होगी |

दस बजे वाली बस डिबाई के बस अड्डे पर आकर रूकी | माला हर उतरने वाले यात्री को देख रही थी | वह व्यक्ति भी बस से नीचे उतरा जिसे लिवाने वह राजू के साथ यहाँ आई थी | उसको देखकर माला जल्दी से उसकी तरफ लपकी, "जीजा जी नमस्ते" |

नमस्ते, नमस्ते |

कैसी है माला ?

अच्छी हूँ | बिलकुल तन्दुरूस्त | आप देख तो रहे हो |

घर पर सब ठीक हैं ?

केवल एक नहीं है |

कौन ?

वहीं जा रहे हो, खुद देख लेना |

लगता है बातों में बहुत चतुर हो गई हो |

आपका असर तो पडॆगा ही |

क्या मतलब ?

यह चतुराई मैं आप से ही सीख रही हूँ |

अरे वाह | कितना समय बिताती है मेरे साथ जो मुझ से सीख रही है ?

ज्यादा समय नहीं चाहिये, कुछ सीखने के लिए, पारखी नजर रखने वालों को  |

अच्छा जी !

माला और उसके जीजा जी के बीच होने वाली नोंक झोंक को उसी बस से उतरने वाला एक भोला-भाला एवं बेहद शरीफ सा दिखने वाला कोई ग्यारह बारह साल का लड़का बडे ध्यान से सुन रहा था | माला उससे अनभिज्ञ थी अतः उसकी और उसका कोई ध्यान नहीं गया | परंतु माला तथा उसके जीजा जी के बीच हो रहे वर्तालाप के दौरान लड़के नें माला का पूरी तौर से मुआयना कर लिया था | उसके विचार में वह खुद की उमर, 11-12 साल, के बराबर की होगी | गौरी-चिट्टी, इकहरा बदन, चंचल तथा बे-झिझक बातें बनाने में माहिर थी | नयन नक्श के मामले में भी किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी | लड़के से बे-खबर माला ने अपने जीजा जी की अटैची उठाते हुए, "राजू यह इनका थैला उठा ले |

फिर अपने जीजा जी की तरफ देखकर, और कोई सामान तो नहीं है जीजा जी ?

नहीं बस ये ही दो नग हैं |

तो चलें जीजा जी ?

सभी घर की तरफ चल दिये | उस लड़के ने भी उनका अनुशरण करना शुरू कर दिया | राजू ने माला से अटैची भी ले ली तथा तेज कदम बढाता हुआ उनसे आगे निकल गया | माला अपने जीजा जी से बातें करती हुई चल रही थी | बीच बीच में चोर निगाह से वह उस लड़के को भी निहार रही थी जो बस स्टैंड से ही उनका अनुशरण कर रहा था | माला का जब सब्र का बाँध टूट गया तो उसने अपने जीजा जी से धीरे से पूछा, "क्या वह लड़का जो हमारे पीछे-पीछे आ रहा है आपके साथ आया है ?

जीजा जी शायद अपनी साली की शंका समझ गए थे तथा उन्होने इस बात का भी अन्दाजा लगा लिया था कि माला उसे नहीं जानती | अतः शरारती अन्दाज में ऐसे बोले जैसे सचमुच में कुछ जानते ही नहीं, "कौन सा लड़का ?

वही जो हमारे पीछे पीछे आ रहा है ?”

माला के जीजा जी ने झूठे ही पीछे मुड़कर देखते हुए, नहीं तो |

अपने जीजा जी की ना सुनकर माला सोचने लगी कि यह लड़का यहाँ का तो लगता नहीं क्योंकि उसने उसे अपने मौहल्ले में इससे पहले कभी देखा ही नहीं था | फिर हमारे पीछे पीछे आने का उसका क्या मकसद हो सकता है | माला के दिमाग में कुछ गलत आशंकाओं ने घेरा डाल लिया अतः अब वह चोर निगाहों से उस लड़के की गतिविधियों को ज्यादा ध्यान से देखने लगी | आखिर अधिक देर तक उससे न रहा गया | अपने मकान की गली के नुक्कड पर ज्योंही वह लड़का उनके पीछे मुडा, माला एकदम से पल्टी तथा लड़के से तैश में बोली, "ऐ लड़के मेरे पीछे पीछे क्यों आ रहा है ?

लड़के ने अपना धैर्य न खोया तथा शांत स्वभाव से ऊत्तर दिया, "क्योंकि आप मेरे आगे आगे जा रही हैं |  

माला कुछ तैश दिखाकर, तूझे कहाँ जाना है ?

लड़का बड़े शंयम से बोला, वैसे तो बताना जरूरी नहीं समझता फिर भी आपका दिल रखने को बता देता हूँ कि मुझे भी वहीं जाना है जहाँ आपको जाना है |

माला गुस्से में अभी कुछ कहना ही चाहती थी कि उसने अपने जीजा जी के चेहरे पर एक शरारती मुस्कान को भाँप लिया | फिर झट से जब उसने उस लड़के की तरफ नजर घुमाई तो उसे भी, अपने भाई(माला के जीजा जी) की तरफ देखते हुए, वैसे ही मुस्कराते हुए पाया | माला को समझते हुए देर न लगी कि जरूर कुछ दाल में काला है | माला का गुस्सा एकदम ठंडा हो गया | वह अपनी झेंप छिपाते हुए बोली, "तो आप हमारे छोटे जीजा जी हैं, नमस्ते | 

लड़के ने कुछ जवाब न देकर माला के अभिवादन के उत्तर में केवल अपने दोनों हाथ जोड् दिये |