Wednesday, October 21, 2026

गोपनीयता

 

गोपनीयता

1 जुलाई 2024, आज मेरी पुत्र वधू चेतना, धर्म पत्नी मेरे बड़े पुत्र प्रवीण कुमार मंगल, (पूज्य माता जी, मेरी पौत्री चक्षु मंगल तथा मेरे पौत्र नयन मंगल,) का जन्म दिन था | चेतना देहली की एक पाठशाला में अध्यापिका के पद पर कार्यरत थी | उसे सुबह 6 बजे घर से निकल जाना पड़ता था तथा वह शाम के चार बजे के लगभग ही वापिस घर पहुँच पाती थी |

इस वर्ष गर्मी का मौसम अपना तांडव दिखा रहा था | गर्मी अधिक होने की वजह से और चेतना को सफ़र की थकावट मिटाने का समय देने की सोचकर मैनें शाम सात बजे बाद ही उसके घर जाकर आशीर्वाद देने का विचार बनाया था |

मेरा पुत्र अपने परिवार के साथ मकान नंबर 1023 में रहता है जो उसने अभी नया ही बनाया था | जबकि हम पति-पत्नी अपने पुराने मकान नम्बर 973 सैक्टर 23 ए में निवास करते हैं | दोनों मकान के बीच का फासला केवल इतना है कि एक घर से दूसरे घर पैदल तीन मिनट में पहुँचा जा सकता है | जब प्रवीण और चेतना ने अपना गृह प्रवेश किया था तो उन्होंने हमसे बहुत आग्रह किया था कि हम दोनों भी उनके साथ 1023 में ही रहें | परन्तु मेरी पत्नी सन्तोष की अपने पुराने मकान में रहने की जिद ने ऐसा नहीं होने दिया था | उस समय मनोज जी, प्रभा, प्रवीण, चेतना तथा मेरे छोटे पुत्र के समझाने पर भी मेरी पत्नी टस से मस न हुई ? हालांकि उस समय सामाजिक द्रष्टि तथा बेटों के सामर्थ्ग तथा सेवा भाव को भांपते हुए मुझे भी अपने दोनों बेटों से अलग अपना घर बसाना अच्छा नहीं लगा था |   

मैं चेतना को जन्म दिन की हार्दिक शुभ कामना देने के मकसद से उनके निवास पर शाम 7:30 बजे के लगभग पहुँचा | अपनी पौत्री चक्षु को वहां पाकर प्रसन्नता के साथ आश्चर्य भी हुआ | चक्षु, नेशनल ब्रेन रिसर्च सैन्टर – मानेसर गुरुग्राम के छात्रावास में रहकर पी. एच. डी. कर रही है | अमूमन वह इतनी व्यस्त रहती है कि एक दिन के लिए आने में भी वह आनाकानी करती है तथा एक सप्ताह पहले ही वह यहाँ आई थी | खैर अपनी मम्मी जी के स्पेशल दिन पर आकर उनकी संगत पाना भी सौभाग्य की बात होती है | मैंने चेतना को आशीर्वाद दिया और बैठ गया |

इस समय रात के आठ बज चुके थे | मेरे वहां बैठने पर चेतना हमेशा पूछती थी कि पापा जी फल वगैरह दूं या चाय , काफी, कुछ लोगे परन्तु उस दिन एक बार दिखाई देने के बाद वह फिर दिखाई नहीं दी | प्रवीण, चक्षु तथा नयन के व्यवहार से भी मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मैं किसी अनजान के घर बिना बुलाया मेहमान आ गया था | मैं ये सोचकर उनके दर से उठा था कि वे रोक लेंगे परन्तु कहीं से कोइ आवाज सुनाई नहीं दी और मैं रात 8:30 बजे उनके घर से बाहर आ गया था |

रास्ते में मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि चेतना को पता था कि वह मेरा खाने का समय होता है फिर भी आज उसने एक बार भी खाने के लिए नहीं टोका | टोकना तो दूर दोबारा वह दिखाई भी नहीं दी थी | इसका क्या कारण रहा होगा इसी उधेड़बुन में मैं अपने घर पहुँच गया |

मुझे रात का खाना खिलाकर मेरी पत्नी सन्तोष चेतना को जन्म दिन की बधाई देने उसके घर गयी तो पाया कि वहां ताला लगा हुआ था तथा घर के चारों सदस्य कहीं गए हुए थे | वापिस आकर जब सन्तोष ने मुझे इस बारे में बताया तो मुझे सारी बातें समझ आ गयी तथा मेरी शंका का समाधान भी हो गया कि चेतना ने मुझे खाने के लिए क्यों नहीं टोका था | परन्तु मुझे इस बात का मलाल होने लगा कि उनमें से किसी सदस्य ने भी इसकी भनक भी न लगने दी और सब कुछ गोपनीय रखा |

जब प्रवीण के परिवार ने मकान 1023 में रहना शुरू किया था तो हर सदस्य ने बहुत जोर दिया था कि हम दोनों उनके साथ रहें | उस समय मनोज जी, प्रभा, प्रवीण, चेतना तथा पवन के बार बार आग्रह करने के बावजूद सन्तोष अपने फैसले से टस से मस न हुई | अत: सन्तोष के अपने पुराने मकान 973 के प्रति लगाव तथा वहीं पर ही रहने की जिद के कारण हमनें अपना अलग घर बसाए रखा था | हालांकि रात का खाना अधिकतर हम 1023 पर ही खाते थे परंतु उस समय सामाजिक द्रष्टि से मुझे भी अपने बच्चों से अलग घर बसाए रखना उचित नहीं लगा था |      

2 जुलाई को जब प्रवीण 973 पर आया तब उसकी मम्मी ने पूछा, “कल रात कहाँ चले गए थे “? प्रवीण ने सकपकाते हुए अपनी झूठ बोलने की आदतानुसार हेरा फेरी में जवाब देते हुए कहा, “चक्षु को कुछ सामान खरीदना था | अत: उसके साथ चले गए थे “|

सन्तोष के प्रवीण से पूछने तथा उसके जवाब के कारण मुझे मेरा सोचना सही लगा कि कल वे सब चेतना का जन्म दिन मनाने किसी रेस्टोरेंट में खाना खाने गए होंगे क्योंकि 1 जुलाई को रात 8:30 बजे तक उनकी रसोई ठंडी पडी थी | यही कारण रहा होगा कि चेतना ने मुझ से खाने की नहीं पूछी थी |

अत: आज मुझे महसूस हुआ कि, जब तक समर्थ हैं, संतोष का फैसला, हमारा बच्चो से अलग रहने का फैसला किसी हद तक सही था | क्योंकि बच्चों के साथ रहते तो उनकी ऐसी गोपनीयता पर प्रहार होते रहते जैसी कल रात उन्होंने दर्शाने की कोशिश की थी |

यही गोपनीयता सामने आने पर परिवार में कलह का कारण बनती हैं |   

Monday, October 12, 2026

गल्त फहमी

 गल्त फहमी

20 नवम्बर 2024 को हमारी (चरण एव संतोष) के शादी की 56 वीं सालगिरह थी | बच्चों ने अपने अनुसार खाना-पीना किया तथा सभी खुशी – खुशी विदा हो गए | विदा होने का मतलब है कि सभी अपने-अपने मकान पर चले गए | हालांकि हमारा खाना बच्चों के यहाँ ही होता था परंतु सोना अलग-अलग अपने-अपने मकानों पर ही होता था | हंभई थके - हारे आराम से सो गए |

21 नवम्बर को प्रत्येक दिन की तरह हम बिस्तर से उठे | संतोष प्रात: 8 बजे की लगभग सुबह की चाय बनाने रसोई में घुसी ही थी कि अचानक चक्कर आने के कारण अपने को संभाल न सकी और मुंह के बल जमीन पर गिर पड़ी | उनके सिर के अगले हिस्से में चोट लगी | लगभग 5 ईनच कट जाने के कारण उनके सिर से खून बहने लगा |

मैंने जल्दी से उन्हें बैठाया तथा डिटोल का फ़ोहा उनके सिर पर रख दिया | इसके बाद अपनी लड़की प्रभा को फोन करके जल्दी से आने को कहा | वह हमारे दामाद श्री मनोज जी तथा अपने लड़के भावेश को लेकर शीघ्र या गई तथा हम संतोष को लेकर मनीपाल अस्पताल लेकर चले गए |

मेरा बड़ा लड़का प्रवीण तथा उसकी पत्नि चेतना सुबह 7.30 पर ही नौकरी पर चले जाते हैं | छोटा लड़का पवन थोड़ा दूर रहता है अत: आने में देरी कर सकता था इसलिए सबसे पहले अपनी लड़की को ही बुलाया था | प्रथम उपचार के बाद मेरे पत्नी को घर भेज दिया गया था |

घर आकार संतोष की तबीयत में कोई सुधार नहीं हुआ | उन्हें उठाते, बैठते तथा चलते हुए चक्कर आ रहे थे | 22 तारीख को उन्हे अस्पताल ले जाना पड़ा जहां उन्हें भर्ती कर लिया गया | चार दिनों बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी तो दे दी गई परंतु उनके सिर में चक्कर आने बंद नहीं हुए | साथ ही उनके बाएं हाथ में भयानक दर्द होने लगा | डाक्टर को दिखाने पर पता चला कि गिरने से सिर की चोट के साथ हाथ का अंदर का मांस भी फट गया था | इसके लिए उन्हें 14 दिनों की फिजियोथरपी कराने की सलाह दी गई |  

फिजियोथरपी प्रत्येक दिन शाम के 3.30 बजे करानी थी | इसके लिए मेरे पौत्र नयन को अस्पताल ले जाना पड़ता था क्योंकि वही था जो दिन में घर रहता था तथा रात को ड्यूटी पर जाता था | चार दिन तो वह अपनी दादी को समय पर अस्पताल ले गया परंतु पाँचवे दिन अस्पताल से मेरे पास फोन आया की आप फिजियोथरपी के लिए जल्दी आ जाओ अन्यथा एक एमरजेन्सी के कारण हम आपको समय नहीं दे पाएंगे | मैनें नयन को फोन पर जल्दी आने के लिए कहा परंतु जब वह 15-20 मिनट तक नहीं आया तो देर होते देख हम बाहर खड़े एक पीन पहिया स्कूटर द्वारा अस्पताल पहुँच गए तथा फिजियोथरपी कराने लगे |

अपनी आदत अनुसार, क्योंकि मिलिट्री में डाक्टर को दिखाने के दौरान अपना फोन बंद करना पड़ता था, अस्पताल में भी मैंने अपना फोन बंद कर दिया था | इस दौरान नयन ने मुझे चार-पाँच बार फोन किया होगा जिसे मैं रिसीव नाहें कर पाया था | जब अस्पताल का                                                                                                                के लड़के गर्व के फोन पर नयन का फोन आया | मैंने उससे बात की तो जवाब मिला की वह हमें लेने आ रहा है, हम वहीं रुक गए और उसके साथ ही घर आए | इसके बाद नयन पहले की तरह अपनी दादी जी को फिजियोथरपी के लिए प्रत्येक दिन ले जाता लाता रहा | इस बीच 6 जनवरी 2025 को अचानक पवन, अपने घर से, अपना सारा सामान लेकर, मेरे मकान (973) की ऊपरी मंजिल पर रहने के मकसद से आ गया | अभी तक शाम का खाना हम प्रवीण के यहाँ खाया करते थे | पवन का सारा सामान ऊपरी मंजिल पर बिखरा पड़ा था | मैंने यह सोचकर कि अंजू आज खाना कैसे बनाएगी, चेतना को बताया देता हूँ कि वे अपना सामान आज लेआए हैं अत: आज सबका खाना वह बना देगी |

मैंने फोन पर कहा, “चेतना आज अंजू आ गई है.. |”

मेरी पूरी बात सुने बिना ही चेतना ने कहा,”ठीक है पापा जी, अभी मैंने खाना चढ़ाया नहीं है | आज वह ही बना देगी |”

चेतना की बात सुनकर मैं असमंजस में पड़ गया तथा सोचने लगा कि क्या कहूँ | इसी देरी के कारण फोन कट गया | इसके बाद एक सप्ताह तक चेतना का कोई फोन नहीं आया कि पापा जी खाना मैं बना रही हूँ | आ जाना | मुझे यह अखर रहा था | इसलिए 12 तारीख को मैं प्रवीण के यहाँ गया तथा सीधा प्रश्न किया, “चेतना किस बात की नाराजगी है?”       

चेतना :- पापा जी आप ऐसा क्यों कह रहे हो ?

मैंने बताया, एक तो यह कि एक हफ्ते से तुमने एक बार भी मुझे खाने के लिए नहीं बुलाया | दूसरे जिस दिन पवन ने अपना सामान शिफ्ट किया था मैंने यह सोचकर तुम्हें फोन किया था कि अंजू को उस दिन खाना बनाने में समस्या रहेगी तो तुम उनसे कह दो कि सबका खाना तुम्हारे यहाँ बन जाएगा परंतु तुमने तो मेरी पूरी बात सुनने से पहले ही अपना फैसला सुना दिया था | लगता है तुम्हारे बीच कुछ सौहार्द पूर्ण वातावरण नहीं है |

लगा जैसे सौहार्द पूर्ण वातावरण की बात सुनते ही चेतना की दुखती रग जाग्रत हो गई तभी तो वह एकदम बिफर पड़ी और रोते -रोते काफी देर तक अपनी सास तथा अंजू के विपरीत न जाने क्या-क्या मन की भड़ास निकालती रही |

जैसे ही चेतना चुप हुई तभी प्रवीण ने कहा, “पापा जी आपने भी नयन के साथ ठीक व्यवहार नहीं किया |”

“क्या”

जिस दिन आप नयन के देरी से पहहोचने पर स्कूटर से अस्पताल चले गए थे तो उसने आपको चार-पाँच फोन किए परंतु आपने एक बार भी जवाब नहीं दिया परंतु जब गर्व ने किया तो आपने एकदम जवाब दे दिया |

प्रवीण की बात सुनकर पहले तो मुझे गुस्सा आया कि मुझ पर शक कर रहें हैं फिर हंसी आई कि कितने नया समझ हैं अत: उन्हें समझाया, “अपनी मिलिट्री की पुरानी आदत अनुसार मैं जब भी डाक्टर के पास जाता हूँ तो अपना फोन खामोश मोड पर डाल देता हूँ तथा काम होने के बाद ही उसे चालू करता हूँ | इसलिए उस दिन गर्व के फोन आने से पहले मेरा फोन खामोश मोड पर था | वैसे तुमने अच्छा ही किया कि अपने मन की दुविधा मेरे सामने बयान कर दी परंतु इतना जरूर कहूँगा कि परिवारों के बीच बिखराव का सबसे बड़ा  कारण अधिकतर आपसी गलत फहमी ही होती है अत: इसे कभी भी पालना नहीं चाहिए |                       


Sunday, September 20, 2026

गीत का रहस्य

 

गीता का रहस्य

युवा पथ मासिक पत्रिका अंक ९ मई २०१२ में संत विनोबा भावे जी ने श्री भगवदगीता के उपदेशों के असर को, उनकी अपनी माता के दूध से प्राप्त अपने ह्रदय और बुद्धि के पोषण के समकक्ष बताया है | वास्तव में गीता पढने का यही रहस्य है |

एक बूढा व्यक्ति, प्रत्येक दिन की तरह, कोयले की सुलगती अंगीठी के पास बैठकर गीता पढ़ रहा था | कोयले की खाली टोकरी वहीं पास में रखी थी | बूढ़े को पढते देख उसके पोते ने जिज्ञासावश पूछा, “दादा जी इस गीता को आपने सैकड़ों बार पूरा पढ़ लिया है | आपकी देखा देखी मैनें भी आपका अनुशरण किया परन्तु न तो मुझे यह याद हो पाई और न ही मैं इसे अधिक समझ पाया | मुझे नहीं लगता कि आपको भी इसके पढ़ने से जीवन में इसका कुछ लाभ हुआ होगा | इसलिए मेरे विचार से आप इसे बार बार पढकर अपना समय व्यर्थ नष्ट कर रहे हैं ?”

दादा ने बड़े संयम से अपने पोते का तर्क सुनने के बाद, अपने पास रखी कोयले की खाली टोकरी उसे थमाते हुए कहा, “जाओ सामने की नदी से इस टोकरी को जल से भर लाओ |”

लड़के ने टोकरी उठाई और नदी की तरफ चला गया | उसने टोकरी को जल में डुबोया और वापिस आ गया | परन्तु यह क्या ? उसने देखा कि टोकरी तो खाली थी |

दादा ने ऐसे ही तीन चार बार अपने पोते को उस टोकरी में पानी भरने के लिए भेजा परन्तु पानी से भरी टोकरी लाने में हर बार लड़के का प्रयास नाकामयाब रहा | अंत में वह झल्लाकर टोकरी को फैंकते हुए बोला, “इस टोकरी में जल भरना मूर्खता ही कहलाएगी |”
इस पर दादा जी ने अपने पोते को बड़े प्यार से अपने पास बुलाकर तथा टोकरी को दिखाकर पूछा,
“तुम्हारे प्रयास के कारण क्या तुम्हें इस टोकरी में कुछ बदलाव नजर नहीं आ रहा ?”

जब लड़के ने टोकरी को ध्यान से देखा तो अचानक उसकी आखों में चमक उभर आई और चिल्लाया, “अरे, यह टोकरी तो साफ़ होकर चमक रही है |”

अब दादा ने अपने पोते के सिर पर प्रेम पूर्वक हाथ फेर कर समझाया, “देखो, टोकरी जल से भरी तो न जा सकी परन्तु नदी के जल में बार बार डुबकी लगाने से उसमें अंदर बाहर से चमक आ गयी है | उसी प्रकार गीता को बार बार पूरा पढ़ने मात्र से ही, चाहे कोई इसका पूरा सार समझ नहीं पाए या अपने मन में समा नहीं पाए, यह मनुष्य को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रतिभावान बना देती है | यही गीता पढ़ने का रहस्य है |”

 

Wednesday, August 5, 2026

ईश्वर दर्शन

 

ईश्वर दर्शन

सरस्वती चंद्र तीर्थयात्रा पर जा रहे थे। लंबे और कठिन सफर को देखते हुए साथ में बर्तन, भोजन और जरूरत का अन्य सामान भी था। रास्ते में एक गांव पार करते हुए वह वहां के एक वीरान मंदिर में रुक गए। पहले तो सोचा कि यहां कोई नहीं होगा पर मंदिर के अंदर गए तो देखा एक बीमार वृद्ध कराह रहे हैं। उनकी हालत देख लगता था कि उन्होंने काफी दिनों से कुछ खाया न हो। सरस्वती चंद्र को उन पर दया आ गई। उन्होंने कुछ समय वहीं रुककर उनकी सेवा करने का फैसला किया। उन्होंने अपने कपड़े उस वृद्ध सज्जन को पहना दिए। अपने सारे बर्तन मंदिर के उपयोग के लिए रख दिए। अपना भोजन भी उन्हें खिला दिया। फिर आसपास से फल और कुछ औषधियां ले आए।

खाली समय में सरस्वती चंद्र मंदिर की सफाई में लगे रहते। इस तरह मंदिर का कायाकल्प हो गया। इधर वृद्ध सज्जन धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगे। कुछ दिनों के बाद सरस्वती चंद्र बिना तीर्थधाम गए ही घर वापस आ गए। घर वालों ने इस तरह आने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि रास्ते में ही उन्हें ईश्वर के दर्शन हो गए। इसलिए आगे जाने की उन्होंने कोई आवश्यकता ही नहीं समझी और लौट आए। इधर मंदिर के पुनरोद्धार हो जाने से लोग वहां फिर से आने-जाने लगे। इस तरह सूने पड़े मंदिर में रौनक लौट आई। वहां वह वृद्ध सज्जन हर किसी को यह बताते थे कि एक दिन यहां ईश्वर आए थे। उन्होंने ही इस मंदिर को तीर्थ बनाया और मुझे जीवन-दान दिया।