Wednesday, August 5, 2026

ईश्वर दर्शन

 

ईश्वर दर्शन

सरस्वती चंद्र तीर्थयात्रा पर जा रहे थे। लंबे और कठिन सफर को देखते हुए साथ में बर्तन, भोजन और जरूरत का अन्य सामान भी था। रास्ते में एक गांव पार करते हुए वह वहां के एक वीरान मंदिर में रुक गए। पहले तो सोचा कि यहां कोई नहीं होगा पर मंदिर के अंदर गए तो देखा एक बीमार वृद्ध कराह रहे हैं। उनकी हालत देख लगता था कि उन्होंने काफी दिनों से कुछ खाया हो। सरस्वती चंद्र को उन पर दया गई। उन्होंने कुछ समय वहीं रुककर उनकी सेवा करने का फैसला किया। उन्होंने अपने कपड़े उस वृद्ध सज्जन को पहना दिए। अपने सारे बर्तन मंदिर के उपयोग के लिए रख दिए। अपना भोजन भी उन्हें खिला दिया। फिर आसपास से फल और कुछ औषधियां ले आए।

खाली समय में सरस्वती चंद्र मंदिर की सफाई में लगे रहते। इस तरह मंदिर का कायाकल्प हो गया। इधर वृद्ध सज्जन धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगे। कुछ दिनों के बाद सरस्वती चंद्र बिना तीर्थधाम गए ही घर वापस गए। घर वालों ने इस तरह आने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि रास्ते में ही उन्हें ईश्वर के दर्शन हो गए। इसलिए आगे जाने की उन्होंने कोई आवश्यकता ही नहीं समझी और लौट आए। इधर मंदिर के पुनरोद्धार हो जाने से लोग वहां फिर से आने-जाने लगे। इस तरह सूने पड़े मंदिर में रौनक लौट आई। वहां वह वृद्ध सज्जन हर किसी को यह बताते थे कि एक दिन यहां ईश्वर आए थे। उन्होंने ही इस मंदिर को तीर्थ बनाया और मुझे जीवन-दान दिया।

Saturday, August 1, 2026

प्रायश्चित

 

प्रायश्चित

एक मशहूर संत थे | उनकी कुटिया शहर से बाहर एक पहाड़ी की तलहटी में थी | पहाड़ी की चोटी से एक झरना बहता हुआ संत की कुटिया के पास से गुजरता था | चारों और हरियाली एवम बेशुमार पेड़ पौधों के कारण वह एक रमणीक स्थान था तथा पेड़ों पर बसर करने वाले विभिन्न प्रकार के पक्षियों की चहचाहट उस स्थान को और भी मनमोहक बना देती थी | संत को अक्सर पक्षी वाले बाबा के नाम से भी जाना जाता था क्योंकि उन्हें पक्षियों से बहुत लगाव था और वे उनके लिए अपनी कुटिया के पास बहुत सा दाना डाला करते थे |

एक बार एक आदमी उनके पास आया वह बहुत उदास एवम बेचैन दिख रहा था | उसने संत के पैर पकड़ कर कहा, “बाबा अक्सर मुझे छोटी सी बात पर ही गुस्सा आ जाता है और मैं अपना आपा खो देता हूँ | सामने वाला चाहे जो हो मैं उसे बुरा भला कह देता हूँ लेकिन बाद में अपने व्यवहार पर खुद ही पछताने लगता हूँ | कल फिर मेरे साथ ऐसा ही हुआ जब मैनें अपने सबसे प्रिय मित्र को खरी खोटी सुना दी | अब मैं पछता रहा हूँ और प्रायश्चित करना चाहता हूँ | कृप्या मेरा मार्ग दर्शन करें |

उस व्यक्ति की बात सुनकर संत ने उसे अपनी कुटिया के पास फैले पक्षियों के पंख चुनकर एक थैले में भर लाने को कहा और जब वह व्यक्ति थैला भर लाया तो संत ने उससे कहा, “जाओ जाकर थैला शहर के बीच चौक पर खाली कर दो | 

संत के कहे अनुसार उस व्यक्ति ने वैसा ही किया और वापिस आ गया | अब संत ने कहा, “वत्स तुम्हारा प्रायश्चित तब पूरा होगा जब तुम उन पंखो को वापिस ले आओगे जिन्हें तुम चौराहे पर फेंक आए थे |

वह व्यक्ति बोला, “स्वामी जी यह कैसे संभव है | पंख तो न जाने कहाँ कहाँ उड़ गए होंगे ?

इस पर संत ने जवाब दिया, “बेटा आपके मुंह से अपने दोस्त के लिए निकले अपशब्द भी तो उड़ चुके हैं वे वापिस कैसे आ सकते हैं ?

संत का जवाब सुनकर व्यक्ति सन्न रहा गया | उसे किंकर्तव्यमूढ़ देखकर संत ने उसे समझाया, “बेटा जैसे तीर से निकला बाण वापिस नहीं आता उसी प्रकार मुहं से निकले अपशब्द वापिस नहीं आते इसलिए हर परिस्थिति में अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए जिससे दूसरों को तकलीफ न पहुंचे और खुद को प्रायश्चित करने की नौबत न आए |