Tuesday, October 13, 2020

लघु कहानी (माँ का आँचल)

 


माँ का आँचल

नवम्बर का महीना था | थोड़ी थोड़ी ठंड पड़नी शुरू हो गई थी | दिन भी छोटे हो गए थे | शाम को सूरज देवता जल्दी सोने लगे थे | इसलिए छः बजते बजते अंधेरा घिरने लगता था | यही समय होता था जब नौकरी पेशा लोग अपने घरों को लौटते थे | गोरा और गायत्री भी अपने आफिस से कुछ देर पहले ही लौटी थी | गायत्री का घर गोरा के घर से पहले पड़ता था अतः उसे छोड़ते हुए गोरा आगे निकल जाती थी | 

आज गोरा को अपने घर जाकर याद आया कि उसकी घड़ी गायत्री के हैंड बैग में ही रह गई है | सुबह कहीं उठने में देर न हो जाए इसलिए गोरा उल्टे पाँव ही अपनी घड़ी लेने गायत्री के घर की और चल दी | गोरा ने ज्यों ही अपनी सहेली गायत्री के घर के अन्दर कदम रखा तो वहाँ का दृश्य देखकर वह ठगी सी खड़ी रह गई | गायत्री ने अपने चार वर्ष के लड़के गौरव को अपने वक्ष से चिपकाया हुआ था | ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे गायत्री उसे अपने अन्दर समा लेना चाहती हो | गायत्री की आँखे बन्द थी तथा उनसे अश्रुधारा बह रही थी जो रूकने का नाम ही नहीं ले रही थी |  |   

गोरा की कुछ समझ नहीं आया कि माजरा क्या था | अभी कुछ समय पहले ही तो वह अपनी सहेली गायत्री को आफिस से आते हुए रास्ते में छोड़कर गई थी | फिर इतने में ऐसा क्या हो गया कि वह जार जार रो रही है | थोडी देर गोरा गायत्री को चुपचाप खड़ी निहारती रही | वह अपनी सहेली के हाव भाव से अन्दाजा लगाने की कोशिश करने लगी कि वास्तव में गायत्री के शांत स्वभाव रोने का कारण क्या हो सकता है | गायत्री को कुछ पता नहीं था कि कोई उसके सामने खड़ा था | क्योंकि वह आँखे बन्द किए तथा गौरव को अपने सीने से लगाए शांत स्वभाव अश्रु बहा रही थी | 

सामने खड़ी गोरा ने गायत्री की मुद्रा से इतना तो अन्दाजा लगा लिया कि वे आँसू किसी दुखः के कारण नहीं थे क्योंकि गायत्री के हाव भाव दिखा रहे थे कि जैसे उसके बहते अश्रु ममता से सराबोर थे तथा वे गौरव को उसके ममत्व के रस में नहला देना चाहते हों | गौरव भी अपनी मम्मी जी के वक्षों के बीच उसकी ममत्व की छाया में सिर छुपाए अपने को सुरक्षित एवं स्नेह प्राप्त करता हुआ अपनी आँखे बन्द किए निशचल बैठा था | फिर भी गोरा ने गायत्री को झकझोरते हुए पूछा, "क्या हो गया गायत्री ?"

गायत्री ने गोरा के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और चुपचाप अश्रु बहाती रही |

गोरा ने एक बार फिर कोशिश की और पूछा, "गायत्री, गायत्री क्या हुआ ?" 

गायत्री जैसे सारे संसार का वैभव अपनी बाहों में समेटे उसका सुख भोगने में तल्लीन थी, अपनी आँखे बन्द किए हुए धीरे से बुदबुदाई," कुछ नहीं |"

"तो फिर अपनी ऐसी हालत क्यों बना रखी है ?"

"भगवान के दिए परम सुख का अनुभव कर रही हूँ |" 

गोरा उसकी गूढ़् बातों का कुछ मतलब न निकाल सकी अतः पूछा, "किस सुख की बात कर रही हो ?"

"भगवान जो एक माँ को प्रदान करता है |"

"माँ तो तुम बहुत पहले बन चुकी थी ?" 

"परंतु अभी तक मैं इस सुख से अनभिज्ञ थी |" 

"आज कैसी पागलों जैसी बातें कर रही हो | तुम्हारी यह पहेली तो मेरी कुछ समझ नहीं आ रही है |"

"इस पहेली का राज असल में मैं भी आज ही जान पाई हूँ |"

गोरा की व्यग्रता बढ़ती जा रही थी इसलिए उसने बहुत ही उत्सुक्ता से जानना चाहा, "मैं भी तो जानूँ कि वह पहेली क्या है ?"

गोरा की बात सुनकर गायत्री अपने अतीत में हिचकोले खाने लगी | उसने अपने जीवन की दाँस्तान सुनानी शुरू कर दी |

'जानती हो गोरा हम सात भाई बहन थे | आपस में लड़ते झगड़ते, हँसते खेलते तथा छीना झपटी करते न जाने कब बड़े हो गए | माँ बाप को कभी किसी की और इतना ध्यान देते पाया ही नहीं था क्योंकि हम बच्चे ही आपस में अपना दुख दर्द बाँट लिया करते थे | मुझे याद है मैं पाँच वर्ष की होने पर भी कभी कभी अपनी माँ के उघड़े स्तनों को चुसने लगती थी | जब मैं ऐसा करती थी तो मेरी माँ के चेहरे पर एक अजीब लालिमा साफ नजर आने लगती थी | उनका ममत्व उमड़ पड़ता था | एक दो घूंट पिला लेने के बाद बड़े प्यार से मेरे सिर पर ममतामयी हाथ फेरते हुए खुद शर्माकर हँसते हुए झिड़क कर मुझे दूर हटा देती थी | अपने चेहरे पर एक अजीब आभा लाते हुए वह कहती थी, "मर जानी इतनी बड़ी हो गई है फिर भी इसका बचपना नहीं गया | मुझे उनका दो घूंट पिला देना तथा सिर पर ममता से परिपूर्ण हाथ फेरना ऐसा महसूस होता जैसे मुझे अमरत्व मिल गया हो |”

उन दिनों लड़कियों की शिक्षा को भी अधिक महत्व नहीं दिया जाता था | मुश्किल से ही ऐसी कोई लड़की मिलती थी जो मैट्रीक पास होती थी | सातवीं या आठवीं कक्षा पास करने के बाद से ही लड़की को घर के काम काज में दक्ष करना अनिवार्य समझा जाता था | मौहल्ले पड़ौस के साथ साथ माँ बाप को भी फिकर सताने लगती थी अतः कहने लगते थे कि हमारी लड़की सयानी हो गई है इसलिए इसके हाथ पीले कर देने चाहिएँ | सभी के विचार रहते थे कि अधिक पढ़ लिखकर लड़की क्या करेगी, पढ़ाई लिखाई करके उसे नौकरी तो करनी नहीं फिर पैसौं के साथ साथ समय का भी खौ क्यों किया जाए | लड़की को  ससुराल जाकर तो केवल गृहस्थी ही सम्भालनी है | 

मैनें किसी तरह रो पीटकर अपने घर वालों के विरोध के बावजूद स्नातक की डिग्री हासिल कर ली |       

अचानक हमारे देश में लोगों के रहन सहन एवम विचारों में एक बहुत बड़ा परिवेर्तन आया | अपने देश की बे हिसाब बढ़ती आबादी को रोकने के लिए सरकार ने कई  कारगार कदम उठाने शुरू कर दिए | देसवासियों ने भी इनका पुरजोर समर्थन किया | हम दो हमारे दो का नारा देश के कोने कोने में गुंजायमान हो गया | यही नहीं लोगो ने इस पर अमल भी किया | इसके साथ साथ सरकार द्वारा चलाये गये साक्षरता अभियान से लड़कियों में शिक्षा ग्रहण करने की भावना को बहुत बल मिला | 

शिक्षा के क्षेत्र में जागृति आने से महिलाओं ने विभिन्न रोजगारों को अपनाना शुरू कर दिया | अपनी योग्यता, कार्यक्षमता तथा आत्म विशवास से राष्ट्र की उन्नति में योगदान देना शुरू कर दिया | गोरा, इस बहाव में मैं भी बह गई | 

मेरा विचार था कि रोजगार के क्षेत्र में आने से महिलाओं को कुछ आजादी मिल जाती होगी परंतु वास्तव में ऐसा नहीं है | उल्टा पुरानी परम्परागत कठिनाईयों के साथ साथ कामकाजी महिलाओं को और भी बहुत सी समस्याओं से जूझना पड़ता है | 

आज भी एक नारी किसी भी कार्यक्षेत्र में अपनी मर्जी से नहीं रह सकती | उसका  ऐसा करना या तो अपने पीहर या फिर अपने ससुराल वालों की मर्जी पर निर्भर रहता है | हालाँकि देश में चहूँ और विकास तो हुआ है परंतु समाज में व्याप्त रूढिवादिता वहीं की वहीं हैं |

वर्तमान में लड़के उसी लड़की से शादी करना चाहते हैं जो नौकरी पेशा हो | कमाई तो औरत करती है परंतु उस पर अपना अधिकार नहीं जमा सकती | एक महिला स्वयं पर खर्च करने में भी हिचकिचाती है क्योंकि उसे अपने वेतन का पूरा पूरा हिसाब देना पड़ता है | 

सारा दिन दफ्तर में काम करने के बावजूद घर आकर घर के कामकाज का पूरा जिम्मा उसी का माना जाता है | घरेलू कार्यों के साथ साथ बच्चों की देखभाल भी उसे बखूबी निभानी पड़ती है | बच्चों की परवरिश में कोई कमी रहने से, उनमें गल्त आदत या कोई कुसंगती पनपती है तो उसकी जिम्मीदारी भी महिला पर ही थोप दी जाती है | 

यही नहीं अगर आफिस में काम करते करते देर हो जाए तो महिला के चरित्र  पर लांछन लगाने में, मौहल्ले पड़ौस वाले तो क्या,  उसके घर वाले भी नहीं चूकते | इसी तरह दफ्तर में सामुहिक मनोरंजन के कार्यक्रमों में एक महिला का हिस्सा लेना भी उसके परिवार वालों को नागवार गुजरता है |        

कहने को तो हमारा समाज महिलाओं को स्वतंत्रता देने की राह पर चल रहा है तथा हर कोई उसकी शेखी बघारता है परंतु विचारों का पिछड़ापन जहाँ का तहाँ है | आज जरूरत है स्वच्छ मानसिकता की जो कहीं भी दिखाई नहीं देती | 

गायत्री कहे जा रही थी तथा गोरा सुनती जा रही थी | जब गोरा से अपनी सहेली की और अनाप सनाप बातें सुनी न गई तो वह खीज कर बोली, "गायत्री तुम्हारे यह सब कहने का औचित्य क्या है मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा |"

"गोरा मैं तुम्हे बताना चाहती हूँ कि इन सब झमेलों को झेलते हुए भी मैं नौकरी क्यों करती हूँ ? क्यों अपने दूध मुहे बच्चे के हाथ से अपना आँचल खींचकर उसे रोता बिलखता, दूसरों के सहारे छोडकर, अपनी नौकरी को ज्यादा तवज्जो देती हूँ |"

पैसा कमाने के आज के परिवेश को देखते हुए मैं भी इस भीड़ में शामिल हो गई थी | वर्तमान युग में आदमी के लिए पैसा कमाना इतना महत्व पूर्ण हो गया है कि वह इस को पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है | आदमी की पैसा कमाने की प्रवृति इतनी बढ़ गई है कि वह इसे इकट्ठा करने के लिए अपने रिस्ते, नाते, इंसानियत इत्यादि सभी कुछ गवाँने में कोई शर्म महसूस नहीं करता | यही कारण है कि परिवार टूटते जा रहे हैं, रिस्ते बिखर रहे हैं, अपनों से अलगाव बढ़ता जा रहा है, यहाँ तक की अपने बच्चों की परवरिश भी ढ़ंग से नहीं हो पाती है | कमाई की होड़ में किसी को ख्याल नहीं आता कि उनका लाड़ला जो सुबह से शाम तक एक अनपढ़ गवाँर तथा शुद्र कही जाने वाली बाई की संगत में रहेगा वह किस प्रवृति को धारण करेगा | जीवन की इस महत्व पूर्ण बात को नजर अन्दाज करते हुए पूंजी के बढ़ने से आदमी भौतिक सुखों को ही वास्तविक सुख मान बैठा है | भौतिक साधन जैसे कार, टी.वी., एयर कंडीशनर इत्यादि मनुष्य के अंतर्मन को शक्ति प्रदान करने की बजाय उसमें अहंकार भर देते हैं | इसी अहंकार के वशिभूत  वास्तविक्ता में वह बहुत अकेला होता जा रहा है | और जब वह अपने अकेले पन का अहसास करता है तो दुखी हो उठता है | 

गोरा, आदमी को अपनों के बीच बैठकर तथा अपने बच्चों की सच्चे मन से परवरिश करने पर ही खुशी एवं संतुष्ठि प्राप्त हो सकती है |  पुराने जमाने के लोग ठीक ही कहा करते थे कि भगवान अगर किसी को इस संसार में अवतरित करता है तो उसके भोजन का इंतजाम पहले ही कर देता है | उनका यह भी मानना था कि हर मनुष्य अपनी किस्मत लिखवाकर आता है | लाख कोशिश करने के बावजूद कोई विधाता के द्वारा लिखे उस लेख को बदल नहीं सकता | 

गोरा, जानती हो एक बार महालक्षमी ने सुदामा की दारूण स्थिति देखकर श्री कृष्ण भगवान से आग्रह किया कि वे अपने मित्र का उद्धार क्यों नहीं कर देते तो श्री कृष्ण जी ने हँसते हुए कहा, "महालक्ष्मी मैं विवश हूँ क्योंकि उसकी किस्मत में ऐसा ही लिखा है |" 

इस पर महालक्ष्मी ने संशय जताया, "भगवन लगता है आप उसकी सहायता करने से कतरा रहे हैं |"

श्री कृष्ण जी ने साफ शब्दों में कहा, "तो आप खुद उसकी सहायता कर के देख लो |" 

उस दिन महालक्ष्मी के कारण सुदामा को बहुत अधिक भिक्षा मिली | वह खुशी खुशी अपने घर लौट रहा था कि एक साँड की वजह से भगदड़ मच गई | सुदामा लोगों की चपेट में आ गया और उसका सारा सामान सड़क  पर बिखर गया | यह देखकर कृष्ण जी ने महामाया से हँसते हुए कहा, "देख लिया महालक्ष्मी, यह उसकी किस्मत में नहीं था |" अर्थात भाग्य में लिखे से ज्यादा कोई कुछ भोग नहीं सकता | गोरा, आज इस का एहसास मुझे मेरे लड़के गौरव ने दिलाते हुए तथा मेरी पैसा कमाने की ललक को एक झटके में धराशाही करते हुए समझा दिया कि मैं अपने दायित्व से कितनी विमुख हो गई थी | 

गोरा, आज जब मैं आफिस से वापिस आई थी तो रोजमर्रा की तरह अपने साथ गौरव के लिए खाने पीने का काफी सामान खरीद कर लाई थी | वह गमगीन एवं उदास होकर मेरा इंतजार कर रहा था | मैंने उसके लिए लाया सामान उसकी तरफ बढ़ाया तो उसने लेने के लिए कोई प्रतिकिर्या नहीं दिखाई | मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसके अन्दर कुछ प्रतिद्वन्द चल रहा है | मैने आगे बढ़कर बड़ॆ प्यार से उसे अपनी गोदी में बैठाकर पूछा, " बेटा क्या बात है आज आप इतने गमगीन क्यों दिख रहे हो ?"

शायद मेरे प्रशन का उस पर कोई असर नहीं पड़ा था | तभी तो उत्तर देने की बजाय वह अपनी ही सोच में डूबा रहा | मैं हाथ मुहँ धोकर वापिस आई तब भी गौरव सोच की गहन मुद्रा में था | उसकी स्थिति देखकर मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा कि न जाने आज गौरव को क्या हो गया है अन्यथा वह मुझे देखकर खिल उठता था |    

मेरे आकर उसके सामने खड़े हो जाने के एहसास से उसने अपनी नजरें उपर उठाई तथा बड़े ही संयम से बोला, "मम्मी जी आप आफिस में कितने घंटे काम करती हो ?"

मुझे गौरव का प्रशन सुनकर बहुत अटपटा सा महसूस हुआ तथा आश्चर्य भी हुआ | फिर भी उसकी मनोइच्छा को जानने के लिए कहा, "आठ घंटे |"

गौरव के दूसरे प्रशन ने तो मुझे और भी असमंजस में डाल दिया जब उसने जानना चाहा, "आपको इन आठ घंटों के कितने पैसे मिलते हैं ?"

मैं इसे गौरव की बेहूदगी समझते हुए डाँटना ही चाहती थी कि उसकी नजरों में एक आत्मविशवास की झलक देखकर सहम गई और जवाब दिया, "800 रूपये |"     

मेरा जवाब सुनकर गौरव ने धीरे से अपना तकिया उठाया तो मैं यह देख कर दंग रह गई कि उसके नीचे पाँच तथा दस रूपयों के कुछ नोट रखे थे | उन्हें देखकर एक बार तो मेरा दिल शंका से भर गया कि आखिर ये नोट उसके पास आए कहाँ से | मैं कुछ पूछना ही चाहती थी कि गौरव ने बड़े इत्मिनान से उन्हें गिनना शुरू कर दिया | वह गिनता जा रहा था, पाँच, दस,.....नब्ब और पिचानवे | जब उसने सारे नोट गिन लिए तो बड़ी दुख भरी नजरों से गौरव ने मेरी और देखा | परंतु अचानक ही उसके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान बिखर गई तथा वे 95/-रुपये मेरी और बढ़ाते हुए बहुत ही मसुमियत से बोला, "लो मम्मी जी आप जो मुझे कल मेरी जेब खर्च के लिए पाँच रूपये दोगी उन्हें मिलाकर ये 100/-रूपये हो जाएँगे |” 

मैने आश्चर्य चकित उसे देखते हुए नोट पकड़ लिए | मुझे महसूस हो रहा था कि उसके अन्दर कुछ बड़ा रहस्यमय द्वन्द चल रहा है परंतु मैं अन्दाजा लगने में असमर्थ थी कि वह क्या है | जब मैने नोट पकड़कर उसकी तरफ प्रशन वाचक दृष्टि से देखा तो उसने अपने मन की बात खोल दी और कहा, "मम्मी जी अब कल आप एक घंटा मेरे साथ बिताएँगी ना |" 

अपने छोटे से गौरव की मनोइच्छा उसके मुख से सुनकर मैं अवाक निढ़ाल सी होकर रह गई | एक अबोध बालक ने मुझे उस कर्तव्य का बोध करा दिया था जो पैसा कमाने की होड़ में मैं बिलकुल भुला चुकी थी | यही सोचकर मेरा अंतर्मन रो उठा कि मेरा बच्चा एकाकी जीवन जीते हुए मेरा प्यार पाने के लिए कितना तड़पा होगा | और अंत में ममतामयी आँचल की छाँव पाने के लिए कितनी बेहतरीन युक्ति अपनाई है | 

गोरा मेरा मन यह भी सोचकर रो रहा है कि मेरे गौरव की तरह न जाने कितने लाखों बच्चे, आज माँ बाप की पैसा कमाने की ललक के कारण उनके स्नेह, प्यार, सहानुभूति और अच्छी परवरिश इत्यादि से वंचित रह जाते होंगे | वर्तमान युग में पैसों के पीछे जीवन का मुल्य ही बदल गया है | 

कमाई के चक्कर में जैसे माँ बाप अपने बच्चों की परवरिश खुद नहीं कर पाते तथा उनको अपने नौकरों के रहमों कर्म पर छोड़ने को अपनी मजबुरी समझने लगे हैं वैसे ही बड़े होकर बच्चे भी अपना फर्ज भूलकर बुजूर्ग माँ बाप को बे-सहारा छोड़कर विदेशों में बसने लगे हैं | 

आज गौरव ने मुझे जता दिया कि माँ द्वारा जेब खर्च के लिये दिया पैसा बच्चे को उस समय तक ही खुशी दे सकता है, जब तक वह उसे खर्च नहीं कर लेता.| बच्चों को पैसा देकर माँ बाप शायद निश्चिंत हो जाते हैं कि उन्होने अपना फर्ज निभाकर बच्चे के दिल को जीत लिया है | परंतु वे यह भूल जाते हैं कि इससे वे बच्चे की भावना, प्रेम, अपनत्व, एवं आदर नहीं पा सकते | क्योंकि बच्चों की परवरिश माँ द्वारा अपने हाथों से न करने से बच्चे अपने को अकेला तथा अनाथ सा महसूस करने लगते हैं | बच्चों को अपनी माँ के आँचल का अभाव हमेशा खलता रहता है | गोरा, आज की त्रासदी यही है कि अबोध बच्चे अपनी माँ के स्नेहिल आँचल की गरिमा को प्राप्त करने के लिए हमेशा बेताब एवं लालायित रहते हैं |      


लघु कहानी (दादा जी का तारा )

 '' दादा जी का तारा ''


धीरज अपने माँ-बाप का इकलौता लड़का था | वह अपने बाप का ही नही बल्कि अपने दादा जी का भी अकेला वारिश था | हालाँकि दादा जी अधिक पढे लिखे नही थे परंतु अपने जमाने के उच्चकोटि कॆ फुटबॉल के खिलाड़ी थे | अपने देश की टीम मे खेलते हुए उन्हे बहुत से पदक जीतने का श्रेय मिला था |    परंतु समय की मार ने उनकी आंखे छीन ली तथा अपने जीवन के आखिरी दिनों में वे अंधेपन के शिकार हो गए | फुटबाल के खेल प्रेम का जजबा उनकी रग रग में इस कदर भरा था कि आंखो की रोशनी न रहते हुए भी वे फुटबाल स्टेडियम में बैठकर वहाँ खेले जा रहे मैचों का भरपूर आन्नद लिया करते थे | ऐसा लगता था जैसे आंखो से देखने की अस्मर्थता उनके फुटबाल मैच देखने की लालसा को किसी प्रकार भी कम नहीं कर पाई थी | क्योंकि अपने तजूर्बे तथा कमंटेटर की कमेंटरी से वह खेल के हर पहलू को अच्छी तरह समझ जाते थे | 

धीरज के दादा जी की दिली ख्वाहिश थी कि वे अपने लड़के, राजेंद्र को ऐसी तालीम दें कि वह भी उनकी तरह एक उच्चकोटि का फुटबाल खिलाड़ी बने परंतु लाख कोशिशों के बावजूद उनकी यह इच्छा पूरी न हो सकी | उनका लड़का बहुत ही सीधे स्वभाव, भोला, ईमानदार परंतु पढाई लिखाई में बहुत ही प्रखर बुद्धि वाला इंसान था | वह शारीरिक मेहनत नहीं कर सकता था अपितु दिमाग की उसके पास कोई कमी न थी | वह इतना प्रतिभाशाली तथा गुणवान था कि उसने अपने राज्य की स्नातकोत्तर की परीक्षा में स्वर्ण पदक हासिल किया था | भगवान की इसी देन के कारण वह उत्तर प्रदेश राज्य में एक जिला विभाग का उच्च अधिकारी नियुक्त हो गया था |  

राजेंद्र की पत्नि, किरण अधिक पढी लिखी नहीं थी परंतु उसमें एक अग्रीणी किस्म की औरत होने के सभी गुण विध्यमान थे | वह सुन्दर, सुशील, मृदुभाषी एवं हर मायने में एक गुणवती नारी थी | वह हर प्रकार से सम्पन्न थी परंतु शादी के आठ वर्ष व्यतीत होने के बावजूद भी वह माँ न बन पाई थी |  एक औरत  को अपनी सामाजिक तथा आर्थिक सम्पन्नता  निराधार ही महसूस होती है अगर वह माँ नहीं है | इसे भगवान की कृपा ही कहा जाएगा कि किरण की बड़ी बहन के अथक प्रयास एवं निष्काम भावना से भागदौड़ करने के कारण वह धीरज की माँ बनने में सफल हो गई | 

राजेंद्र अधिकतर अपने इलाके से बाहर नौकरी पर रहने के कारण अपनी पैतृक जायदाद की देखभाल करने में असमर्थ था |  अपने पिता जी का अकेला लड़का होने की वजह से, अपनी शादी के बाद, उसने अपने पिता जी को भी अपने पास बुला लिया था क्योंकि उसकी माता जी का स्वर्गवास हो चुका था अतः घर पर उसके पिता जी की देखभाल करने वाला कोई जिम्मेदार व्यक्ति नहीं था | मौका पाकर राजेंद्र के पिता जी की सारी जायदाद उसके ताऊ-चाचाओं ने कब्जा ली | बेशक उनके रिस्तेदारों ने उन्हे घर से बेघर कर दिया परंतु राजेंद्र के माथे पर एक शिकन तक न आई तथा उसने यह सहर्ष स्वीकार कर लिया |         

पुराने जमाने में एक कहावत थी कि "जिसका काम उसी को साजे और करे तो डिंगा बाजे" | अर्थात सामाजिक ताने बाने में रहते हुए एक व्यक्ति को वही काम करना शोभा देता है या करना चाहिये जिसके लिए वह समाज ने मुकर्रर किया है | जैसे एक क्षत्रीय को निडरता, वैश्य को व्यापार, सुनार को गहने बनाना इत्यादि | इसके पीछे धारणा थी कि अगर कोई व्यक्ति अपने निर्धारित कार्य को छोड़कर कोई दूसरा काम करता है तो उस पर उसके दुष्परिणाम पड़ते हैं | राजेंद्र के साथ कुछ ऐसा ही हुआ | अपनी नौकरी के रहते उसने जन्म कुंडली बनाना, सटीक भविष्यवाणी करना, रूद्राक्ष, मणिक, मोती और रत्नों की जीवन में महत्ता, होमयोपैथी का इलाज आदि के बारे में भी पूरी दक्षता हासिल कर ली थी |  परंतु अचानक ही अभी जब धीरज 9वीं कक्षा में पढ रहा था तो राजेंद्र का देहांत हो गया | राजेंद्र के आकस्मिक स्वर्गवास से उसके परिवार के बाकी सदस्यों पर गमों का पहाड़ सा टूट पडा | घर से बेघर तो वे पहले ही हो चुके थे | धीरज खुद अभी नाबालिग था | उसके दादा जी देख नहीं पाते थे | अब घर का खर्च चलाने वाला कोई नहीं था | यह एक ऐसी स्थिति बन गई थी कि अगर कोई कमजोर औरत होती तो टूटकर रह जाती और तीन प्राणियों का उसका परिवार बिखर जाता | सभी सगे संबंधी बस यह कह कर रह गए कि भगवान अच्छे आदमियों को ज्यादा प्यार करता है अतः उन्हें जल्दी अपने पास बुला लेता है |

परंतु विपदा की इस घड़ी में किरण एक सुलझी हुई तथा धैर्यवान नारी साबित हुई | किरण ने अपनी उस थोड़ी सी आमदनी में ही, जो उसे अपने पति की पेंशन के रूप में मिलनी थी, घर के खर्च के साथ साथ अपने लड़के धीरज को भी अपने स्वर्गवासी पति की तरह उच्च शिक्षा कराने का फैसला कर लिया |    क्योंकि यही उसके पति ने भी अपने लड़के को प्रेरणा देते हुए समझाया था कि उच्च शिक्षा ही उसका ध्येय होना चाहिए | धीरज भी अपने पिता जी की तरह एक तेज दिमाग का धनी था | वह अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम आता था | व्यवहार में भी वह अपने पिता जी की तरह सादगी, बडों को इज्जत देने वाला एवं सुन्दर तथा सुडौल शरीर का मालिक था | जब से उसने होश सम्भाला था तथा उसके पिता जी ने उसे भविष्य के लिये प्रेरणा देना शुरू किया था वह उनके नक्शे कदम पर चलने लगा था | अतः धीरज ने अपने पिता जी की मनोइच्छा का पूर्ण रूप से स्वागत करते हुए पूरी लग्न से, अपने कालिज से वजीफा लेते हुए, बिरला इंस्टीच्युट आफ टैकनोलोजी से अपनी इंजिनियरिंग की डिग्री उच्च नम्बरों से पास कर ली | वह जल्दी ही एक बड़ी कम्पनी में इंजिनियर भी नियुक्त हो गया | अपनी इंजिनियरिंग की पढाई के दौरान धीरज अपने दादा जी की दबी आकांशाओं को भी नहीं भूला था | उसने अपने मन में एक दृड़ निश्चय कर लिया था कि वह अपने दादा जी की मनोकामना, जो उसके पिता जी पूरा न कर पाए थे , पूरी करने की जी जान से कोशिश करेगा |

वह कालिज की फुटबाल टीम का अभिन्न अंग बन गया था | जब भी समय मिलता था वह अपने खेल के स्तर को सुधारने का प्रयत्न करता रहता था | इंटर कालिज की प्रतिस्पर्धा के चलते  उसके सधे हुए खेल की वजह से उसका नाम काफी चर्चित हो गया था | उसी के आधार पर उसका नाम देश की फुटबाल टीम में सम्मिलित कर लिया गया था | 

फुटबाल के अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामैंट शुरू हो चुके थे | इसमें 12 देशों की फुटबाल टीमें हिस्सा ले रही थी | पहले दूसरे तीसरे फिर चौथे दौर के मैच समाप्त हो गए परंतु धीरज को अभी तक किसी भी मैच में खेलने का मौका नहीं दिया गया था | वह एक रिजर्व ही बना रहा | अब तक उसकी टीम ने अपने सभी मैचों में जीत दर्ज करके टूर्नामैंट के फाईनल में प्रवेश कर लिया था | 

धीरज जो हमेशा अपने नाम के अनुरूप धीरज से काम लेता था तथा हमेशा चुपचाप अपने सीनियरों की बात मानता रहता था, आज फुटबाल के फाईनल का मैच खेले जाने वाले दिन अपना धीरज खो बैठा | वह अचानक अधीर हो उठा | उसने बड़े आत्म विशवास से अपने फुटबाल के कोच से हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन करते हुए कहा,"साहब मुझे फाईनल का मैच खेलने दिया जाए |”

“धीरज ! तुम कैसी बात कर रहे हो ?”

“सर कृपा करके, सिर्फ एक मौका |”

“नहीं ऐसा नहीं हो सकता |”

“साहब पूरे टूर्नामैंट के दौरान मुझे एक बार भी खेलने का मौका नहीं दिया गया |” 

“यह हमारे देश के गौरव का सवाल है |” 

“मैं अच्छी तरह जानता हूँ सर |” 

“इसमें सिर्फ प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को ही मैदान में उतारा जाता है |” 

“साहब आपने मेरी प्रतिभा को आज तक जाँचा ही कहाँ है | आपने तो मुझे किसान के उस तरबूज की तरह कैद कर रखा है जिसको उसने लौटे में डाल दिया था |” 

“तुम्हारा कहने का क्या अभिप्राय है ?”  

“साहब ऐसा हुआ कि एक किसान के खेत में एक तरबूज की बेल पर फल लगने शुरू हुए तो किसान ने एक फल को लोटे में डाल दिया तथा बाकियों को खुले वातावरण में फलने फुलने दिया | खुले वातावरण में पनपने वाले तरबूज तो फुटबाल की गैद से भी बड़े हो गए परंतु लोटे वाला तरबूज उस लोटे में ही समाकर रह गया | उसे बढने का अवसर ही नहीं मिला |”  

फुटबाल का कोच धीरज की बात सुनकर हतभ्रत सा रह गया | हमेशा शांत स्वभाव से रहने वाले खिलाड़ी की आत्मा के उदगार सुनकर कोच सन्न रह गया | उसे आज धीरज बहुत उत्साहित नजर आ रहा था | धीरज की बातों से कोच ने अन्दाजा लगा लिया कि उसके मन में आज फाईनल मैच के दौरान कुछ कर दिखाने का जज्बा है | अपनी गल्ती का एहसास करते हुए कोच ने सोचा कि वास्तव में धीरज सही बयाँ कर रहा था | हो सकता है वह फुटबाल के महानतम खिलाड़ी पेले की तरह अपने अचरज भरे खेल से सभी को स्तम्भित कर दे | फिर भी मन के किसी एक कोने में शंका के रहते हुए तथा बावजूद् और सभी का विरोध सहन करते हुए भी कोच ने धीरज को फुटबाल के फाईनल मैच में खेलने की अनुमती दे दी | 

मैच के शुरू होने की पहली सीटी के साथ ही धीरज ने अपने करतब दिखाने शुरू कर दिए | एक के बाद एक तीन गोल दागकर उसने विरोधी खेमे में हलचल पैदा कर दी | मैदान के चप्पे चप्पे पर धीरज ही धीरज दिखाई देता था | पलक झपकते ही वह फुटबाल के मैदान के एक कौने से दूसरे कोने में पहुंच जाता था | ऐसा प्रतीत होता था जैसे उसके पंख उग आए हों तथा वह मैदान में दौड़ने की बजाय  उड़ रहा हो | धीरज वाली टीम फुटबाल का फाईनल मैच जीत गई | मैच जीतने के बाद चारों और से धीरज की जय-जयकार के नारे बुलन्द होकर गूंजने लगे | धीरज की चारों और से प्रशसां हो रही थी | औरों की तरह उसका कोच भी आशचर्य चकित था | उसने अपने मन की जिज्ञासा मिटाने के लिये धीरज से पूछा, " मैने आज तक तुम्हें इस प्रकार का प्रदर्शन करते पहले कभी नहीं देखा | आखिर वह कौन सी शक्ति थी जिसके कारण आज तुम इतना अच्छा खेले ?

धीरज ने बड़ी ही मासुमियत से उत्तर दिया, " आज मेरे दादा जी मुझे खेलते हुए देख रहे थे |”   

तुम्हारे दादा जी तो रोज स्टेडियम में वहाँ सामने बैठते थे, कहते हुए कोच ने अपनी नजरें उस और घुमाई जहाँ से धीरज के दादा जी उसे खेलते हुए देखते थे | परंतु आज वहाँ कोई नहीं था | 

जब कोच ने अपनी प्रशन वाचक नजर धीरज पर डाली तो वह बोला, " वे आज यहाँ नहीं आ सकते थे |”

“तो फिर तुमने अपना खेल किसे दिखाया ?”

धीरज ने आसमान की और अपनी उंगली उठाकर इशारा करते हुए कहा, " अपने दादा जी को |”

“क्या मतलब ?”

मतलब यह है कि  हालाँकि मेरे दादा जी प्रत्येक दिन यहाँ आकर बैठते जरूर थे परंतु वे देख पाने में असम्रर्थ थे | उनकी आंखो की रोशनी चली गई थी |  चार दिन पहले उनका स्वर्गवास हो गया था | अतः वे तारा बन कर आसमान में चमकने लगे | आज वहीं से वे मुझे खेलते हुए देख रहे थे |

मैच जीतने के उपलक्ष में पारितोषिक के रूप में टीम के कप्तान को जब ट्राफी दी गई तो उसने धीरज को स्टेज पर बुलाकर यह कहते हुए कि इसको ग्रहण करने का असली हकदार धीरज है, उसको ट्राफी थमा दी |  

धीरज ने ट्राफी को अपने सिर से ऊचाँ उठाकर तथा आकाश की और देखते हुए जोर से पुकारा, " दादा जी |”

सूरज की किरणें ट्राफी पर पड़कर ऐसा आभाष करने लगी जैसे सैकड़ों तारों के साथ धीरज के "दादा जी का तारा" भी, आशिर्वाद देने के रूप में,आसमान से उतर कर ट्राफी पर बैठा झिलमिला रहा हो |   


लघु कहानी संग्रह (समीक्षा)

 समीक्षा

एक रचनाकार अपने सोच,विचार,स्मृतियों एवं कल्पना से अपने इर्द-गिर्द घटित हो रही घटनाओं को एक जीवन्तता प्रदान करता है | सृष्टि  के साथ साथ मनुष्यों द्वारा बनाए गए नियमों एवं कारनामों को एक रचनाकार,अपनी कल्पना के माध्यम से,कविता,उपन्यास या कहानियों का रूप देकर समाज के साहित्य को उजागर करने का प्रयास करता है |  विश्व की समस्त भाषाओं में साहित्य की निरंतर सृजना हो रही है | साहित्य समाज का दर्पण है | अतः साहित्य का अविच्छिन्न सृजन ही समाज की जीवन्तता को कायम रख सकता है |

अनादिकाल से वर्त्तमान काल तक न जाने कितनी रचनाएं मसलन वेद, उपनिषद, महापुराण, पुराण, श्लोक, काव्य, उपन्यास, गद्य, चौपाईयां तथा कहानियां समय समय पर अपने युग का प्रतिनिधित्व करती रही हैं | इनके लिए बाल्मिकि, सूरदास, कबीर, रविन्द्रनाथ टैगोर, हरिवंशराय बच्चन, मैथिलीशरण गुप्त, मुंशी प्रेम चंद, महादेवी वर्मा इत्यादि अग्रणी पंक्ति के रचनाकार हुए हैं | गद्य साहित्य में उपन्यासों के बाद मनोरंजक एवं ज्ञानवर्धक कहानियों को हमेशा सराहा गया है | 

श्री चरण सिंह गुप्ता की लघु कहानियों का यह संकलन 'मन की उड़ान-2’ इसी श्रंखला की दूसरी पुस्तक  है | इस रचनाकार ने प्रस्तुत संकलन में अपनी, पहली पुस्तक 'मन की उड़ान' की तरह ही, लेखन प्रतिभा का सशक्त परिचय दिया है | अपनी कहानी "फुर्सत" में वर्तमान युग के नौजवानों को अपने लिए बेहिसाब फुर्सत होने के बावजूद दूसरे के लिए, चाहे वह कोई अपना ही क्यों न हो, कभी फुर्सत न मिलना, "प्रेरणा स्त्रोत" में मनुष्य का अपनी वर्तमान संगत के रंग में रंग कर उसी से प्रेरणा लेकर अपने आप को उसी संगत के अनुसार ढाल लेना ,"जब ठग ठगा गया" में एक मुसाफिर साथी की सूजबूझ तथा चतुराई से एक चतुर ठग का पहचाने जाने पर खुद ही ठगा जाना, "उजाड़" में कभी कभी जनता की भलाई को सोचकर बनाई गई सरकार की योजनाएँ किसी के लिए भी हितकारी नहीं हो पाना, " सहारा" में अपनों के सहारे को तरसते इंसान को जब मुसिबत के समय कोई अनजान भी सहारा दे देता है तो वह व्यक्ति अपने आप को ऋणी मान कर सहारा देने वाले को अपनाने में कोई हिचक नहीं करता,  "संत वाणी" में जताकर कि तृष्णा सब चिंताओं की जड़ है | अतः इसका त्याग ही मनुष्य को मुक्ती दिलाकर सुखी जीवन जीने का रास्ता है, “गौणा” में प्रेयशी द्वारा अपने प्रेमी को ‘आश बिरानी जो करे जीवत ही मर जाए’ का पाठ पढ़ाना, "अब तू ही बता बेटा" में नौकरी में जरूरत से कम पगार मिलने से मजबूरन घूसखोरी की बलवती होती इच्छा,"ममता" में बच्चों का माँ के प्रति अभद्र व्यवहार से भी अपने ममत्व में कोई कमी प्रदर्शित न करना,"तीन चूड़ियाँ" में एक बच्चे की कोमल मानसिकता को बड़े ही मार्मिक ढंग से दर्शाना," ना समझ" में एक अहंकारी मनुष्य को एक सलीके से उसके अहंकार का ज्ञान दिलाकर उसे सदभावना का बोध कराना," नहले पे दहला" में गल्त रास्ते पर अग्रसर होते एक नौजवान को उसी की चाल से मात देते हुए सही दिशा दिखाना तथा "मेरे दादा जी का तारा" में अपने पूर्वजों की आखिरी इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए अपना लक्ष्य निर्धारित करके उसे पूर्णता तक पहूँचाना, पाठक के दिल को छू लेता है | इसी तरह आपकी सभी कहानियों का अंत भी बहुत ही सजीव,कौतुहल पूर्ण एवं बेजोड़ है | आशा है पाठक गण इस संकलन में संग्रहित नूतन कहानियां पढ़कर रचनाकार, श्री चरण सिंह गुप्ता, को लेखन में सफलता की नित नवीन उचाईयों का स्पर्श करने में सहायक बनेंगे |

"भगवान आपको उन्नति के शिखर पर पहुँचने में मदद करे" इसी शुभ कामना के साथ |  


चेतना मंगल 

स्नातकोत्तर  (हिन्दी)

बी. एड.


Sunday, October 11, 2020

लघु कहानी संग्रह (समर्पित)

 अभिव्यक्ति  

कोई भी छोटे से छोटे काम को सुचारू रूप से करने के लिए बहुत से लोगों की सहायता लेनी पड़ती है | इसी प्रकार लेखक को भी अपनी रचना की संजिदगी बनाने के लिए दूसरे  लोगों का सहारा लेना आवशयक हो जाता है | 

यह तो सर्व विदित है कि एक मनुष्य की सफलता में उसकी पत्नि का योगदान बहुत महत्व रखता है | मैं भी ऐसे योगदान से अछूता नहीं रहा | अपनी पत्नि, संतोष गुप्ता, के उकसाने से ही मैं भारतीय वायु सेना में रहते हुए भी जोधपुर यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल करने में कामयाब हुआ | फिर भारतीय स्टेट बैंक में वहाँ हिन्दी दिवस प्रतियोगिता के लिए अपनी पत्नि के साथ घटित घटना पर आधारित लिखा लेख प्रथम घोषित होने से मेरे अन्दर और कहानियाँ लिखने की जागृति पैदा हुई | अब पाठकों द्वारा मेरी पहली पुस्तक ‘मन की उड़ान’ में रूचि को भाँपकर मैं अपनी लघु कहानियों की यह दूसरी पुस्तक "मन की उड़ान -2” छपवाने में कामयाब  हो रहा हूँ |

मैं अपनी पौत्री चक्षु मंगल का भी ऋणि एवं आभारी रहूँगा क्योंकि इस ने अपनी सूजबूझ से, मेरी लिखी कहानियों के सन्दर्भ में, स्कैच बनाकर उन्हें जीवन्तता प्रदान की है |   

मैं अपनी कहानियों के पात्रों का भी आभार प्रकट करना चाहूंगा जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में सहयोग मिलने से ही मैं उनकी मनोदशा को काल्पनिक तथ्यों में पिरोकर कहानियों का रूप दे पाया हूँ | 

                                                    औम शांतिः


                                                                    पुत्र

                                                          प्रवीण कुमार मंगल

                                                          पवन कुमार मंगल

                                                                पुत्र वधुएँ

                                                चेतना मंगल    अंजू मंगल

                                                  चक्षु, नयन, गर्व, यश       

                                                        एवम

                                    मंगल परिवार के सभी सदस्यों को समर्पित




सृजन 


इस संसार में असंख्य प्रजाती के अनगिनत प्राणी वास करते हैं | अर्थात इनमें तरह तरह के जीव तथा भिन्न प्रकार की जातियाँ हैं | कहीं मनुष्यों का मेला है, कहीं पशु-पक्षियों का जमघट, कहीं पेड़ पौधों का जंगल है तो कहीं कीड़े मकौडों का झुंड, कहीं कलकल बहता जल है तो कहीं समुन्द्र की लहरों का प्रचंड | यहाँ प्राणियों की अत्यधिक भरमार है परन्तु इनमें से कई जीव सदभावना से प्रेरित है तो कई विकारों से युक्त है |  सदभावना मनुष्य के आतंरिक सौंदर्य, प्रेम, करूणा, सदाचार, तथा परोपकार को दर्शाता है वहीं विकारों के वशीभूत मनुष्य मान मर्यादा, इंसानियत, समबन्ध, रिस्ते नाते, सब कुछ भूल कर उनको दरकिनार कर देता है |          

मेरी इस पुस्तक की कहानियां मनुष्यों में व्याप्त विकारों और सदभावनाओं के मिश्रण को दर्शाती है |  


Saturday, October 10, 2020

उपन्यास 'अहंकार' (मधुर मिलन)

 मधुर मिलन 

दिन गुजरने लगे | विनीत हर रोज दिन में जब भी समय मिलता अपने माता पिता से मिल आता था | जब भी विनीत अपनी माँ के पास जाता था तो उनके चेहरे पर एक शुकून के साथ विषाद की रेखाएं साफ़ नजर आती थी परन्तु दोनों उसे चुपचाप सहन कर जाते थे | एक दिन गर्मियों के मौसम में जब विनीत अपनी माँ से मिलाने गया तो उसके चेहरे पर पसीने की बूँदें देखकर पुष्पांजलि ने कूलर चलाने को हाथ बढ़ाया | इस पर विनीत के मुहँ से निकला, “मम्मी जी इसकी जरूरत नहीं है मुझे पानी दे दो |” 

और जब पानी के लिए पुष्पांजलि ने फ्रिज की तरफ हाथ बढ़ाया तो विनीत ने टोका, “मम्मी जी अब इसकी आदत नहीं रही मुझे ताजा पानी ही दे दो |”

विनीत के शब्द सुनकर  पुष्पांजलि का मन रो उठा | उसे अपने व्यवहार पर ग्लानी महसूस होने लगी कि उसके अपने अहम् के कारण उसके श्रवण जैसे बेटे को कितने कष्ट उठाने पड़ रहे हैं | परन्तु थोड़ी देर में ही त्रिया चरित्र का अहम् अपनी भावनाओं पर हावी हो जाता और फिर पुराने ढर्रे के साथ खिसकने लगता | 

कभी कभी विनीत रजनी को साथ लेकर अग्रवाल  के यहाँ हो आया करता था |इसी तरह पाँच छह महीने गुजर गए |एक दिन विनीत ने अपने ताऊ जी से पूछा, “ताऊ जी अब और यह कितने दिन सहना पड़ेगा ?”

अग्रवाल ने विनीत के मन की व्यथा भांपकर उल्टा प्रश्न किया, “क्या आपने तैयारी कर ली ?”

अपने ताऊ जी का आशय समझ विनीत के चेहरे पर एक शर्मीली मुस्कान बिखर गई और उसने अपनी ताई जी की तरफ ऐसे देखा जैसे कह रहा हो, “ताई जी आप ही बता दो कि मेरी और से ताऊ जी के मन की माफिक तैयारी कर ली गई है |”

उन दोनों की भाव भंगिमा देखकर अग्रवाल ने जब अपनी पत्नी की तरफ प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा तो उन्होंने सकारात्मक भाव से सिर हिला दिया |

अग्रवाल रोमांचित हो गया और खुशी में जोर से बोला, “अरे यह भी कोई चुपचाप या इशारों में बताने की बात है अपना मुहँ खोला और ढंग से बताओ |”

शालिनी ने हंसते हुए बताया, “हाँ जी हमारी रजनी उम्मीद से है |”

अग्रवाल मूढ़ में था अत: पूछा, “बस इतना ही या कुछ और ?’

शालिनी असमंजस से, “और क्या ?’

अग्रवाल ठुमक कर तथा हाथ नचाकर, “यही कि हमारा विनीत बाप बनने वाला है” और दोनों ठहाका लगाकर हंस पड़े | इसमें विनीत ने भी साथ दिया और रजनी भी मुस्कराए बिना न रह सकी |  

अग्रवाल ने अपने प्लान की दूसरी सीढ़ी पार कर ली थी | अब उसे यह सूचना पुष्पांजलि तक पहुंचानी थी | उसने इसके लिए अपने घर सत्यनारायण भगवान की पूजा का आयोजन  किया | जिसके लिए अपने पड़ोसियों के साथ पुष्पांजलि और विनीत को भी निमंत्रण दिया | विनीत को ताकीद कर दी कि वह रजनी को साथ लेकर पूजा शुरू होने के थोड़ी देर बाद पहुंचे | रजनी को आते देख पुष्पांजलि कुछ विचलित दिखाई दी | वह सचेत होकर बैठ गई और ऐसे दिखाने लगी जैसे उसने कुछ देखा ही नहीं | पूजा समाप्त होने के बाद जब शालिनी ने जब पंडित जी से अनुरोध किया कि वह रजनी को पुत्रवती होने का आशिर्वाद दें तो पुष्पांजलि के कान खड़े हो गए | आशीर्वाद देने के बाद पंडित जी ने जब रजनी को वहाँ बैठी औरतों के पैर छूकर उनका भी आशीर्वाद लेने की सलाह दी तो पुष्पांजलि के शरीर में भारी हलचल होने लगी | वह पूजा स्थल से उठकर जाने लगी तो शालिनी ने धीरे से कहा, “रजनी को न सही अपने खून व वंश बेल के भागीदार को तो आशीर्वाद देने का तुम्हारा हक बनता है |”

कहते हैं मूलसे ज्यादा प्यारा ब्याज होता है | जब से पुष्पांजलि को यह भनक लगी थी कि उसकी पुत्रवधू गर्भवती है उसकी निगाह रजनी के पेट पर ही टिकी थी जैसे उसकी कोख में कोई खजाना भरा है तथा अगर उसकी निगाह वहाँ से हटी तो उसे कोई चुरा न ले जाए | पुष्पांजलि के चेहरे के भावों से स्पष्ट आभाष हो रहा था कि पुष्पांजलि का रोम रोम पुलकित हो रहा है | उसने शायद मन ही मन आशिर्वाद देकर अपने ब्याज को अपना भी लिया हो परन्तु मन मन भाऊँ मूढ़ हिलाऊँ को चरितार्थ करते हुए उसने शालिनी के कहने से, जब रजनी अपनी सास के चरण स्पर्श करने को झुकी तो लोक दिखावे के लिए मरे हाथों से उसे आशीर्वाद देने का दिखावा कर दिया |

पुष्पांजलि की मन:स्थिति को भांपकर अग्रवाल ने अंदाजा लगा लिया था कि आज से वह अपने परिवार में आने वाले नवजात की सेहत को सुधारने के लिए हर संभव कोशिश करेगी | परन्तु रजनी और उसके बीच सीधा सम्बन्ध न होने के कारण यह ठीक से मुमकिन नहीं हो पाएगा | अग्रवाल ने उन दोनों के बीच पड़ी दरार को पाटने के लिए राम सेवक का सहारा लेना ठीक समझा | उसने उसे अच्छी तरह समझा दियाकि उसे क्या करना है | 

उस दिन के बाद पुष्पांजलि रोज विनीत का बेसब्री से इंतज़ार करने लगी | वह विनीत के लिए कुछ न कुछ नया तथा स्वादिष्ट व्यंजन बना कर तैयार रखने लगी | आते ही वह उसे परोस देती और खाने को बाध्य करती | विनीत के मना करने पर भी वह उसकी ठाली में और दाल देती | राम सेवक मुस्कराता हुआ पुष्पांजलि के बदलते आचरण को निहारता रहता | आखिर मरण जब वह नहीं खा पाता तो अग्रवाल के सिखाए अनुसार वह विनीत को सलाह देता, “बेटा इसे अपने साथ ले जाओ घर जाकर भूख लगे तो बाद में खा लेना |”

पुष्पांजलि भी राम सेवक के सुझाव पर कोई आपत्ति न करती बल्कि उसके चेहरे पर संतुष्टि के भाव उभर आते थे कि उसकी मन की मुराद पूरी करने में उसका पति उसका साथी बन गया था | अपने घर के चिराग के आगमन की लगन ने उसे इतना प्रभावित किया कि वह अपने स्वास्थ्य की सुधबुध भूल्गई और समय पर दवाई न लेने के कारण बीमार हो गई | 

मूर्छित अवस्था में पुष्पांजलि को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा | विनीत और विजया नौकरीपेशा होने के कारण अस्पताल में अधिक समय नहीं दे पाते थे | राम सेवक अकेला कैसे संभाल सकता था | इसलिए रजनी को हाथ बटाना पड़ा | रजनी सुबह खाना बनाकर ले जाती, अपनी बेबसी को दरकिनार कर, बेखबर बिस्तर पर लेटी अपनी सास की दोपहर तक सेवा करती तथा भगवान से उनकी मंगल कामना की प्रार्थना करती रहती | धीरे धीरे पुष्पांजलि के सवास्थ्य में सुधार होने लगा | परन्तु जब से पुष्पांजलि ने आखें खोली थी उसने एक बार भी रजनी को अपने आस पास नहीं देखा था | प्रत्येक दिन उसके लिए घर का ताजा खाना आ रहा था, धुले एवम साफ़ कपड़े आ रहे थे, फल आ रहे थे परन्तु वह यह न समझ पा रही थी कि यह सब कौन कर रहा था | वह सुबह से शाम तक शून्य में टकटकी लगाए सोचती रहती थी | एक दिन शाम के धुन्धल्के में उसने खिड़की से एक साए को गुजरते देखा | उसने अपने दिमाग पर जोर देकर सोचा तो उसे वह परछाई रजनी जैसी दिखाई दी | पुष्पांजलि ने फ़टाफ़ट नर्स को बुलाया और पूछा, “वह कौन थी जो अभी अभी उस खिड़की के पास से गुज़री थी ?”

“वह आपकी सेविका थी |”

नर्स की बात सुनकर पुष्पांजलि अचम्भित थी, “मेरी सेविका |”

“हाँ मैडम जब आप होश में नहीं थी तो दिन में आपकी सेवा करने के लिए उन्होंने एक सेविका रखी थी |”

“तो क्या जो अभी खाना देकर गई थी वह वही सेविका थी ?”

“हाँ मैडम |”

“तो वह अंदर क्यों नहीं आई ?”

“पता नहीं मैडम जब से आपको होश आया है तब से वह केवल खाना देने ही आती है और बाहर पकड़ा कर चली जाती है |”

“ऐसा क्यों ?”

नर्स इसका कोई कारण नहीं बता पाई | उसने केवल इतना बताया कि वह सेविका गर्भवती होने के कारण खुद बेबस थी फिर भी उसने जी  जान से आपकी सेवा की है | यह कहना उचित होगा कि उसकी निश्छल सेवा के कारण ही आज आप स्वस्थ हो पाई हैं |

नर्स की बात सुन पुष्पांजलि का मन उसके प्रति अपने व्यवहार को सोचकर ग्लानी से भर गया | फिर भी अपने अपमान तथा अहम् का दंश भुलाना उसे भारी पड़ रहा था | वह मन ही मन बुदबुदाई, “रजनी तुम हमारे वंश बेल की जन्मदात्री बनोगी जिसके लिए मैं सदैव तुम्हारी आभारी रहूंगी परन्तु तुमने मेरे दिल पर जो जख्म दिया है मै उसे भी कभी भुला नहीं पाऊँगी |” और व्यथा से उसकी आँखें भर आई | 

स्वस्थ होने के बाद घर में प्रवेश करते ही पुष्पांजलि ने रामसेवक से प्रशन किया, “अस्पताल में आपने अकेले मेरी देखभाल कैसे की होगी ?”

“मैं अकेला थोड़े ही था घर के सभी सदस्यों ने आपका पूरा ख्याल रखा था |’

“परन्तु विनीत और विजया तो अपनी नौकरी पर जाते होंगे ?”

राम सेवक आँख चुराकर, “हाँ |”

“तो फिर खाना वगैरह, कपड़े धोना और सारा दिन अस्पताल में मेरी सेवा सुश्रा करना, कैसे कर पाते थे ?”

“आप यह सब क्यों पूछ रही हो ? ऐसे समय में कुछ तो तकलीफ उठानी ही पड़ती है |”

पुष्पांजलि ने टोंट मरने के लहजे में तथा सिर हिलाकर रामसेवक के चेहरे पर नजरें गडाकर कहा, “हाँ यह तो बात है परन्तु कई बार आस पडौस  वालों की सहायता की भी जरूरत पड़ जाती है |”

“आपने बिल्कुल ठीक कहा और फिर समाज होता किस लिए है ?’

“तो आपने समाज के किस व्यक्ति का एहसान मोल लिया ?”

इतने में अग्रवाल ने घर में प्रवेश करते हुए पूछ लिया, “राम सेवक जी घर में सब कुछ तो है अब पुष्पांजलि किस वास्तु के मोल भाव की बात कर रही हैं ?”

अग्रवाल को आया देख राम सेवक को बहुत सांत्वना मिली |वह बोला, “पुष्पांजलि पूछ रही थी कि अस्पताल में उसकी देखभाल के लिए किस किस का एहसान मोल ले लिया |”

अग्रवाल को पुष्पांजलि की सोच पर बहुत तरस आया और फिर अपने में संयम रखकर बोला, “पुष्पांजलि, अपनों द्वारा की गई सेवा एहसान मोल लेना नहीं मानी जाती |”

पुष्पांजलि ने दुखी होकर कहा, “परन्तु भाई साहब , मैं जिसका मुंह भी देखना पसंद नहीं करती उससे ही मेरी सेवा कराने का क्या औचित्य था ?’

अग्रवाल ने बड़ी निर्मलता से समझाया, “देखो पुष्पांजलि आप तो अपने घर की आर्थिक स्थिति से भली भाँती वाकिफ हो |आपकी देखभाल के लिए अलग से नर्स लगाने का मतलब था लगभग तीन हजार रूपये | और ये बहुत मायने रखते और वह घर के दूसरे काम भी नहीं करती | रही बात तुम्हारे उसका मुहँ न देखने की तो रजनी ने यह नौबत ही नहीं आने दी |”      

पुष्पांजलि रोकर बोली, “परन्तु भाई साहब रजनी ने जो मुझे दर्द दिया है उसकी वजह से उससे मैं कोई रिस्ता नहीं रखना चाहती |”

“पुष्पांजलि आप उससे रिस्ता रखो या न रखो परन्तु फिर भी वह आपके पौत्र की माँ तो कहलाएगी ही |”

पुष्पांजलि गुस्से में हाथ मटका कर, “मुझे इससे कोई सरोकार नहीं है |”

“कैसी बात करती हो पुष्पांजलि आप इस सत्य को कैसे झुठला सकती हो ?”

पुष्पांजलि झुंझला कर, “भाई साहब मैं उसके साथ नहीं रह सकती | उसने मेरे आत्म सम्मान को बहुत बड़ी ठेस पहुंचाई है |”

अग्रवाल को उसके कहने से उसे घेरने का मौक़ा मिल गया और चोट की, “पुष्पांजलि आपके साथ यह तो सौ सुनार की एक लोहार की कहावत चरितार्थ हुई थी |”

पुष्पांजलि ने अग्रवाल की बात का आशय समझ कर कंपकपाती आवाज में पूछ, “मतलब ?”

“मतलब यह कि आपने तो उसके आत्म सम्मान पर कई बार वार किया परन्तु आपके मुताबिक़ उसने एक बार में ही अपने आत्म सम्मान की सारी चोटों का बदला ले लिया |’

पुष्पांजलि निरूत्तर चुप बैठी रह गई |             

अग्रवाल ने कहना जारी रखा, “पुष्पांजलि, अक्सर मनुष्य विवेकहीनता और पशु प्रवृति की स्थिति में अपराध कर बैठता है परन्तु जब उसकी आत्मा और विवेक दोबारा प्रबल होकर अपराध की विवेचना करते हैं तो मनुष्य अपराध बोध से भर जाता है | परन्तु एक अहंकारी अपनी करनी का मंथन करके अपराध बोध तो दूर अपने को सही मानकर वह बआर बार अपनी गलती दोहराता रहता है | यही आपने किया है | पुष्पांजलि को बुत की तरह बैठे देख शालिनी बोली, “देखो पुष्पांजलि अग्रवाल जी बिल्कुल ठीक कह रहे हैं | हालाँकि हमारी संस्कृति बहू का ऐसा व्यवहार बिल्कुल बर्दास्त नहीं करती परन्तु वर्त्तमान के प्रचालन और परिवेश में बड़ों का आप जैसा व्यवहार भी तो कबूल नहीं है | इसलिए आप दोनों ही बराबर की कसूरवार हो | मेरे विचार से अब दोनों अपना अपना प्रायश्चित समझ कर सभावना की राह पर आ जाओ |”

पुष्पांजलि के चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह इस निर्णय से खुश नहीं थी | इसलिए अग्रवाल को फिर बोलना पड़ा, “पुष्पांजलि स्थिति को समझो | विनीत बेकार में हर महीने छ: हजार रूपये किराया दे रहा है जबकि आपके मकान की एक मंजिल खाली पड़ी है | उसकी मजबूरी है कि उसको हमेशा दो नाकों में सवार रहना पड़ता है | रजनी की हालत ऐसी है कि कभी भी रकम की जरूरत पड़ सकती है | आप की सेहत भी ठीक नहीं रहती |”

अबकी बार पुष्पांजलि ने मुंह खोला और धीरे से कहा, “परन्तु भाई साहब, किसी हालत में भी मैं उसके साथ नहीं रह सकती |”      

अग्रवाल उसकी बोलने की नरमाई से समझ गया कि वह उसके निर्णय पर मान जाएगी अत: कहा, “साथ रहने को कौन कह रहा है ?”

“फिर ?”

अग्रवाल ने अपना सुझाव दिया, “रजनी को विनीत के साथ मकान के एक मंजिल पर रहने दो ?’

पुष्पांजलि ने बुरा सा मुहँ बनाकर जैसे उसका जायका बिगड गया था, “भाई साहब यह कैसे मुमकिन है ?”

हालाँकि पुष्पांजलि के हावभाव से अग्रवाल ने अंदाजा लगा लिया था कि अपने आने वाले वंशज को अपनी देखरेख में ही इस संसार में पदार्पण होते देखने की इच्छुक थी फिर भी अपने अहम् के चलते वह अपने मन की कमजोरी जाहिर करना नहीं चाहती थी | यही सोचकर कि पुष्पांजलि की बात भी रह जाए और विनीत घर में भी आ जाए अग्रवाल ने राम सेवक से पूछ, “क्यों भाई साहब मेरा सुझाव उचित है या नहीं ?”

अचानक उस पर आई जिम्मेदारी से राम सेवक ने पुष्पांजलि की तरफ देखा और जब उसने पाया कि वह नीची गर्दन करके बैठी है तो उसकी सहमती समझ कहा, “भाई साहब आप तो हमेशा से ही हमें नेक सलाह देते आए हैं | जिस जगह हम आज बैठे हैं यह सब आपकी कृपा के कारण ही हमें नसीब हुआ है | आपके अथक प्रयासों से ही विनीत गृहस्थी की राह पकड़ पाया है | आप मेरे से क्या पूछते हो | जैसा आपको मुनासिब लगे हमें मंजूर होगा | 

पुष्पांजलि का बीच में न बोलना उसकी पक्की सहमती दर्शा गई | अत: विनीत का रजनी के साथ उस घर में आना तय हो गया | थोड़े दिनों तक दिखावे की घृणा को, रजनी की खोख में पल बढ़ रहे वंशज ने अपने साथ, कुछ हद तक धीरे धीरे सदभावना में परिवर्तित कर दिया | नवजात अनमोल की वजह से रजनी और पुष्पांजलि अपने बीच बनी अहम् की दीवार को गिराकर उसके पालन पोषण में ही लगी रहती हैं | आपसी मधुर मिलन से अब पुष्पांजलि का एक सम्मिलित सुखी परिवार है |


Friday, October 9, 2020

उपन्यास 'अहंकार' (समाधान)

 समाधान 

राम सेवक, पुष्पांजलि, विनीत और विजया | यह चार प्राणियों का सुखमय परिवार था | विनीत की रजनी से शादी के बाद पुष्पांजलि के मन में पनपते अहंकार के कारण अचानक उस घर में कलह का साम्राज्य हो गया और स्थिति इतनी भयावह हो गई कि तलाक की नौबत आ गई |

मेरा इस पंडित परिवार से बहुत लगाव था | मैं हमेशा उस परिवार की समस्या के निवारण के बारे में सोचता रहता था | मेरे पूर्वजों का गाँव वाला मकान अब बहुत घनी आबादी के बोझ से दब गया है इसलिए अपनी सेहत को बरकरार रखने के लिए मैनें अपना एक नया आशियाना गुडगांवा के खुले वातावरण में बना लिया है | इसका यह मतलब कतई नहीं है कि मैनें अपने पैतृक मकान से नाता तोड़ लिया है | आज मैं सुबह सुबह अपने उसी पुराने मकान की पहली मंजिल की खिड़की में बैठा बाहर का नजारा देख रहा था | जब मैं छोटा था तो सामने खुला मैदान था | पेड़ों के झुंड पर तरह तरह के पक्षियों का वास हुआ करता था | मुर्गे की बांग से पता चल जाता था कि सुबह का आगमन हो गया है | सुबह की प्राणदायक समीर की ताजगी तथा चिड़ियों का चहचहाना एक मधुर संगीत बनकर शरीर में स्फूर्ति भर देता था | 

आज वहाँ सामने न मैदान था न पेड़ | जब ये ही नहीं थे तो पक्षी कहाँ से होते | मैदान अब बहुमंजिली इमारतों से भर गया है जिनमें पक्षियों के रैन बसेरों के लिए कोई स्थान नहीं था | घर में मेरी पत्नी शालिनी के अलावा सभी निंद्रा की गोद में समाए हुए थे | वह आई और एक कप चाय मेरे हाथों में थमा कर अपने काम में लग गई | मैनें  अभी चाय की चुस्की ली ही थी कि अचानक मेरे कानों में चिड़िया के चहचहाने ने रस सा घोल दिया | मैं पुलकित तथा अधीर होकर इधर उधर उस संगीतमय आवाज के निर्गम का स्त्रोत ढूढने लगा | 

मैनें देखा कि सामने छज्जे पर रखे फूलों के गमले पर सुन्दर सी दो चिड़िया बैठी थी | उन्हें देखकर मेरी बूढ़ी होती हडियों में शक्ति का संचार हुआ और मैनें झट से उठकर उनके आगे चुग्गा डाल दिया | थोड़ा सा खाकर चिड़िया उड़कर आँखों से ओझल हो गई | अभी मैं यह सोच ही रहा था कि इतने दिनों बाद दिखने पर भी वह जी भरकर उन्हें देख भी न पाया कि दोनों चिड़िया अपने मुहँ में तिनका दबाए फिर वहाँ आ बैठी | अग्रवाल को समझते देर न लगी कि वे अपना घोंसला बनाने की तैयारी में हैं | परन्तु क्या मेरे द्वारा उनको थोड़ी देर पहले डाले गए चुग्गे से प्रभावित होकर वे तिनका लेकर मेरे सामने आकर बैठी थी | 

चिड़ियों का मकसद कुछ भी रहा हो | मैनें उनकी भावनाओं को समझते हुए आनन् फानन में एक घोंसला बनाने योग्य लकड़ी का एक खांचा दीवार पर टांग दिया | मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब मैंने देखा कि उसी मुस्तैदी से चिडियों ने उस खांचे में तिनके सजाने शुरू कर दिए | अब अग्रवाल के साथ उसके परिवार के और सदस्य भी उनके कारनामों तथा उनकी परवरिश में रूची लेने लगे थे |

अगले दिन सुबह जब अग्रवाल नें देखा कि अब केवल एक चिड़िया ही तिनके ला रही थी और दूसरी बैठकर धीरे धीरे घोंसले को अंतिम रूप दे रही थी तो उसका माथा ठनका, कहीं दूसरी चिड़िया बीमार तो नहीं हो गई | जब मैंने अपने मन की दुविधा अपनी पत्नी को बताई तो वह मुस्कराते हुए बोली, “मैं मानती हूँ कि घर का बनाना बेशक मर्दों की जिम्मेवारी होती हो परन्तु उसको सजा सवांर कर रहने लायक असली घर बनाना केवल स्त्री यानी मादा ही जानती है |” अपनी पत्नी का सटीक जवाब सुनकर मेरी सब समझ आ गया और आँखों ही आँखों में अपनी पत्नी का धन्यवाद कर दिया | 

चिड़ियों की दिनचर्या देखते देखते मैं और मेरी पत्नी को पता ही न चला कि दस दिन कैसे बीत गए | अब मादा चिड़िया ने उड़ना लगभग बंद सा ही कर दिया था | ऐसा प्रतीत होता था जैसे मादा चिड़िया किसी तपस्या में लीन  थी | केवल नर चिड़िया आती जाती दिखती थी | वास्तव में मादा चिड़िया ने अंडे दे दिए थे तथा वह उनको छाती से लगाए ध्यान मग्न मुद्रा में सेती रहती थी | और एक दिन ऐसा आया जब चिड़ियों ने चीं-चीं, चूं-चूं का आलाप करते हुए पंख फडफडा कर, फुदक फुदक कर, नृत्य की मुद्रा में कोहराम मचा दिया | 

पता चला कि चार चूजे होने की खुशी में चिडियाँ इतना उछल कूद मचा रही थी | धीरे धीरे बच्चे बड़े हुए और एक दिन उड़कर वे न जाने कहाँ चले गए | उनके जाने से मैं बहुत उदास हुआ परन्तु वह यह भांपकर आश्चर्य चकित था कि माँ-बाप चिड़ियों की दिनचर्या में कोई अंतर नहीं आया था | चिड़ियों के ऐसे व्यवहार ने मुझे उनके इस गूढ़ रहस्य पर सोचने को मजबूर कर दिया |

आखिर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि जहां मनुष्य अपने बच्चों से भविष्य की उम्मीदें लगाते हैं वहीं पक्षी अपने बच्चों की निस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं | अत: चिड़िया मनुष्य की तुलना में श्रेष्ठ प्रतीत होती है | मेरे मन में ऐसा विचार आते ही मेरा दिमाग अचानक पुष्पांजलि पर केंद्रित हो गया | मैंने सोचा कि इन निरीह चिड़ियों से सबक लेकर अगर पुष्पांजली अपने मन से अपने पुत्र विनीत के प्रति तथा विनीत अपनी माँ के प्रति कुछ दिनों के लिए मोह-ममता का त्याग कर दें तो उनकी वंश बेल फिर से आबाद होने के आसार बन सकते हैं | वैसे भी वर्त्तमान परिवेश में परिवार केवल एक या दो बच्चों में ही सिमट कर रह गया है तथा अधिकाँश बच्चे अपने माता पिता को स्वदेश में अकेला छोड़कर विदेश सेवा में कार्यरत हो जाते हैं | 

चिड़िया की जीवनी से सीख लेकर मुझे एक आशा की किरण दिखाई देने लगी थी कि मैं अपने चहेते विनीत के टूटने के कगार पर खड़े रिस्तो को फिर से बहाल करा सकता हूँ क्योंकि मैं जानता था कि एक आशा की किरण रहने पर भी निराशा पर विजय पाई जा सकती है | मैनें मन में निश्चय कर लिया कि पुष्पांजलि तथा उसके पुत्र को अपने अपने तरीके से समझाने की कोशिश करेगा कि उनके लिए अपना अहंकार तथा जिद छोडकर गृहस्थी की उन्नति की राह पर चलना ही बेहतर होगा |  

अपना मकस कामयाब बनाने के लिए अग्रवाल ने पहले विनीत से उसकी मंशा जानने के लिए बुलाया और सीधा सवाल किया, “मैनें अभी तक पक्की तरह रजनी के बारे में आपकी राय नहीं पूछी है?”

विनीत आश्चर्य से, “ताऊ जी आपका क्या मतलब है?”

“यही कि जैसी आपके घर वालों की सलाह है कि रजनी से तुम्हारा तलाक.......?”

“ताऊ जी यह मेरे घर वालों का विचार नहीं है यह तो रजनी की तरफ से आया है |”

अग्रवाल ने तपाक से पूछा, ‘तो क्या तुम तलाक नहीं चाहते?”

विनीत कुछ असमंजस की स्थिति से उभर कर बोला, “ताऊ जी उसने कारनामा ही ऐसा कर दिया है कि अब उसके साथ रिस्ता रखना जायज नहीं दिखता |” 

“मैं मानता हूँ कि जो रजनी ने किया है वह सरासर हमारी संस्कृति के विरूद्ध है परन्तु क्या उसका ऐसा व्यवहार करने के पीछे आप भी कुछ दोषी नहीं हो?”

अपने ताऊ जी का अपने ऊपर इल्जाम सुनकर विनीत लगभग उछल पड़ा और पूछा, “वह कैसे ताऊ जी ?”

इस पर अग्रवाल ने विनीत को या दिलाने की कोशिश की, “यादद करो वह लम्हा जब मैनें आपको बताया था कि तुम्हारी मम्मी जी ने रजनी को कभी अपनी बहू समझा ही नहीं | वह तो उसके साथ नौकरानी जैसा व्यवहार करती थी | गाली गलौच करना, ताने देना, यहाँ तक कि बिना कसूर के झापट रसीद करना उनकी आदत बन गई थी | आदमी कितना झुक सकता है, कितना सह सकता है, जब पानी सिर से गुजरने लगता है तो हाथ पैर मारने ही पड़ते हैं | वही रजनी ने किया और इसमें उसकी कोई गल्ती नहीं है |” 

विनीत ने तड़प कर कहा, “अपनी सास को चांटा मरने को आप गल्ती नहीं मानते ?”

‘मानता था परन्तु अब नहीं क्योंकि ऐसे परिवेश में रजनी ने सही किया है |”

विनीत चिढ कर, “कैसा परिवेश ?”

“ज्यादा भोले मत बनो | शादी के बाद एक लड़की अपना घर छोड़कर अपनी ससुराल अपने पति पर भरोसा रखकर आती है कि वह उसकी अच्छी तरह देखभाल करेगा परन्तु आपने तो उसके दुःख दर्द का ख्याल तो दूर उससे कभी पूछा भी नहीं |”

“ताऊ जी ऐसी बात नहीं है, मैं उससे पूछता तो था |”

“गल्त, मैनें आपकी आँखों में हमेशा माँ की ममता, बहन का दुलार तथा पिता के भोलेपन का आवरण ही देखा है | कभी भी वह आभा महसूस नहीं कि जो एक पति के चेहरे पर अपनी पत्नी को देखकर आती है |”

विनीत अब थोड़ा खुला, “ताऊ जी मैं इन सबके सामने कैसे पूछता ?”

“अकेले में तो पूछ कर सहानुभूति जाहिर कर सकते थे ? मुझे लगता है कि उन क्षणों में भी आप तो उसे बस शिक्षा ही देते रहे होंगे |”

शायद अग्रवाल की बात से विनीत कुछ सोचने लगा था कि हाँ ऐसा ही था | विनीत को विचारों में खोया देख अग्रवाल ने उसकी तंद्रा तोड़ी, “खैर जो भी अब तक हुआ उसे छोड़ो और बताओ इतना कुछ जानने के बाद आपके दिल में रजनी के प्रति कुछ सहानुभूति पैदा हुई है ?” 

विनीत को समझ नहीं आ रहा था कि वह अग्रवाल के प्रश्न का क्या उत्तर दे | वह असमंजसता के भंवर में गोते लगाता बोला, “ताऊ...जी...परन्तु...मेरी....मम्मी जी ?”

“ देखो विनीत मैं यह नहीं कहूँगा कि छोड़ो उनको परन्तु इतना जरूर कहूँगा कि अपनी गृहस्थी को बरकरार रखने का फर्ज भी तो आपका बनता है ?”

विनीत दुविधा में बोला, “ताऊ जी मैं क्या करूँ ?”

“विनीत आप तो वर्त्तमान के नौजवानों के ख़्वाबों से भली भांती परिचित होंगे और उनके ख़्वाबों को पूरा करने के लिए उनके माँ बाप भी अपनी तरफ से कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते |”

“मैं समझा नहीं ताऊ जी कि आपके कहने का तात्पर्य क्या है ?’ 

मैं तुम्हें समझाना चाहता कि जैसे एक पक्षी का बच्चा समर्थ होने पर अपने सगों की मोह् ममता त्याग कर अपना अलग घर बसा लेता है उसी तरह कुछ दिनों के लिए तुम्हें भी वैसा ही अनुशरण करना पड़ेगा |”

“परन्तु ताऊ जी पक्षियों और मनुष्यों में फर्क होता है ?”

“होता है, बिल्कुल होता है ! परन्तु आप यह तो देखते ही होंगे कि अपने सपनों को साकार करने के लिए आजकल कितने नौजवान अपने मातापिता के साथ रह रहे हैं ?”

“परन्तु ताऊ जी उनकी बात और है वे विदेश में जाकर बस जाते हैं |”

“तो क्या थोड़े दिनों के लिए भी आप ऐसा नहीं दर्शा सकते कि आप भी अपनी उन्नति तथा घर की सुख शांति के लिए अलग रहने पर मजबूर हो ?’ 

“थोड़े दिनों से आपका क्या मतलब है, ताऊ जी ?”

अग्रवाल ने अपने मुख पर आत्म विश्वास का दर्ड भाव लाकर कहा, “यही कि जहां आपकी पत्नी ने गृहस्थी की राह पकड़ी नहीं कि सभी के गीले शिकवे काफूर हो जाएंगे और एक मधुर मिलन हो जाएगा |”

“परन्तु ताऊ जी मैं किसी हालत में अपने अपने माता तथा पिता जी को त्याग नहीं सकता |”

“आपको उन्हें त्यागने के लिए कौन कह रहा है |”

“फिर ?”

 “ मैं तो केवल रजनी को थोड़े दिनों के लिए उनसे अलग रखने की सलाह दे रहा हूँ | आपके ऊपर उनके यहाँ आने जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा |”

विनीत विचलित होकर बोला, “मेरी मम्मी जी इस पर राजी नहीं होंगी |”

“आप अपनी मम्मी की चिंता मत करो | उन्हें मनाना मेरा काम होगा | आप अपने विचार बताओ कि क्या तुम रजनी के प्रति सहानुभूति रखते हो या नहीं ?”

अग्रवाल की बात सुनकर थोड़ी देर के लिए ऐसा महसूस हुआ जैसे विनीत की जबान उसके गले में ही अटक कर रह गई थी | वह किंकर्तव्य मूढ़ कुछ पल अपने ताऊ जी को निहारता रह गया | उसके ताऊ जी के बार बार पूछने पर वह खुला, “ताऊ जी आप अगर समझते हैं कि ऐसा करना घर की सभी समस्याओं का निदान है तो मैं इसके लिए तैयार हूँ |”

विनीत का आश्वाशन मिलने के बाद अग्रवाल ने सबसे पहले पुष्पांजलि से बात करना उचित समझा क्योंकि वह जानता था कि राम सेवक और शीला तो उसके पिछलग्गू हैं | अगर पुष्पांजलि मान गई तो वे दोनों अपने आप मान जाएंगे | एक दिन मौक़ा देखकर अग्रवाल अपनी पत्नी के साथ पुष्पांजलि के घर पहुँच गया |

पुष्पांजलि के घर की साज सज्जा के साथ उसका खुद का अपना शारीरिक श्रृंगार पूरे निखार पर था परन्तु चेहरे पर मायूसी झलक रही थी | पता नहीं वह किस कारण थी | कुछ औपचारिकता निभाने के बाद शालिनी ने पूछा, “क्या बात है पुष्पांजलि, कुछ उदास सी दिख रही हो ?”

“जीजी आप तो जानती ही हो कि मेरी उदासी का करण क्या है |” 

“यह तो मैं जानती हूँ कि तुम्हारी चिंता का कारण रजनी है परन्तु हमेशा उसकी सोच कर घुलने से क्या हासिल होगा ?” 

पुष्पांजलि आँखों में आसूं भरकर, “फिर मैं क्या करूँ जीजी ?”

अपनी बात रखने का सही मौक़ा पाकर अग्रवाल बोला, “आपको चिंता के कारण का निवारण ढूँढना चाहिए |”

अग्रवाल की बात से, जैसे बुझते दिये में तेल की एक बूँद फिर रोशनी भर देती है वैसी ही चमक पुष्पांजलि के चेहरे पर झलकी | वह सोचने लगी कि अग्रवाल ने हर पग पर उसकी सहायता तथा नेक मशवरा दिया था परन्तु उसने उनकी अवहेलना करके खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है | इतना होने के बावजूद वे जरूर हमारे घर में सुख शांति लाने का मार्ग अवश्य सुझाएंगे | अत: पूछा, “भाई साहब आपके कहने का क्या तात्पर्य है ?”

“यही कि चिंता तो एक मीठा जहर है जो चिता पर जाने का एक सहज मार्ग है जिसे कोई नहीं अपनाना चाहता |”

“जानती हूँ |”

“जानते हुए भी इसे क्यों अपने गले बांधा ?”

“भाई साहब मुझे कोई शौक नही था वह तो रजनी......?” 

पुष्पांजलि को बीच में ही टोकते हुए, “मै जानता हूँ कि आप अपनी इस चिंता का सारा श्रेय रजनी को ही देने वाली हैं |”

पुष्पांजलि हैरानी से अग्रवाल की तरफ देखकर, “फिर किसे दूं ? यही सत्य है |” 

अग्रवाल ने सीधा प्रश्न किया, “क्या आप इसकी भागीदार नहीं हैं ?”       

अग्रवाल की सुनकर पुष्पांजलि अंदर तक तिलमिला गई | उसके भीतर की भावना उस के मुख मंडल पर तैर गई परन्तु अपने इस रोष की तीव्रता को वह अपनी जबान पर न ला पाई | आहिस्ता- आहिस्ता उसकी खींची हुई मासपेशियों में तनाव कम हुआ और उसने संभल कर पूछा, “भाई साहब यह कैसा प्रश्न है ?”

“वैसे तो यह एक सीधा सा सवाल है फिर भी बटाना चाहता हूँ कि मेरे विचार से अपने इस चिंता के लिए आप खुद भी रजनी के बराबर की हिस्सेदार हैं |”

“भाई साहब वह कैसे?”

अग्रवाल ने पुष्पांजलि को समझाने के लिए पूछा, “आपको यह तो ज्ञात होगा कि क़ानून की नजर में एक आत्म ह्त्या करने वाला व्यक्ति मुजरिम कहलाता है ?”

“हाँ भाई साहब पता है|”

“फिर तो यह भी जानती होंगी कि मनुष्य को आत्म ह्त्या के लिए उकसाने वाला व्यक्ति भी उतना ही दोषी माना जाता है ?”

“हाँ, परन्तु आप यह सब मेरे से क्यों पूछ रहे हैं ?” 

“यही तो मैं आपको समझाने की कोशिश कर रहा हूँ कि आपने अपना हक मानकर रजनी को गाली-गलौच, माँ-बाप के ताने, कामचोर तथा चांटे मार कर इतना मजबूर के दिया कि वह और बर्दास्त न कर सकी और आपके साथ वही कर दिया जो आप उसके साथ करती आई थी |“

“भाई साहब मैं तो उसे सही रास्ते पर लाने का प्रयास कर रही थी |”

“यह प्रयास निर्मलता और अहिंसा से भी किया जा सकता था ?”

पुष्पांजलि ने अपना पक्ष रखा, “क्या आप सोचते हैं कि मैनें ऐसा नहीं किया होगा ?”

“किया होगा परन्तु इसमे आपके अहम् ने हमेशा आपका साथ दिया होगाऔर मन का अहम् केवल अपनी बात ही सही मानता है |”

“भाई साहब आपका कहने का क्या मतलब है ?”

“मैं यह तो नहीं कह सकता कि किस कारण परन्तु इतना जरूर रहा होगा कि ऐसा अनुचित व्यवहार करने के लिए आपके ओहदे ने आपको अवश्य उकसाया होगा |”

अग्रवाल की बात सुनकर पुष्पांजलि चुप हो गई | शायद वह सोचने लगी थी कि वास्तव में ही अग्रवाल की बात सही थी | जैसे लोहे को ढालने के लिए सही समय पर चोट की जाती है ऐसा ही समझ अग्रवाल ने कहा, “देखो पुष्पांजलि गलती तो दोनों तरफ से हुई है और उसकी सूत्रधार आप हो |”

पुष्पांजलि टुकुर टुकुर अग्रवाल की तरफ देखने लगी | अभी तक वह अपने व्यवहार को सही समझ रही थी परन्तु आज पासा पलटता नजर आ रहा था | उसकी गर्दन ह्जुक गई तथा ऐसा महसूस हुआ जैसे वह जमीन में धंसती जा रही है | उसे निश्छल बैठे देख अग्रवाल ने सलाह दी, “अगर आप चाहो तो अभी भी स्थिति को सम्भाला जा सकता है |”

अग्रवाल की बात सुनकर कुछ देर के लिए सूखते पेड़ों पर वर्षा का पानी पड़ने के बाद जैसी बहार पुष्पांजलि के चेहरे पर दिखाई दी | फिर उत्सुकतावश उसने पूछा, “वह कैसे भाई साहब, मैं तो अब किसी कीमत पर उसे अपने साथ रखूँगी नहीं ?”

अग्रवाल ने तपाक से कहा, “बिल्कुल यह अनहोनी तभी होनी संभव होगी जब रजनी फिलहाल आपसे अलग रहेगी  |”  

पुष्पांजलि ने तमक कर पूछा, “फिलहाल से आपका मतलब क्या है ?”

अग्रवाल ने फ़िलहाल, फिलहाल का मतलब न बताकर कहा, “पुष्पांजलि, समय बड़ा बलवान होता है, भविष्य कौन जानता है | दोस्त दुश्मन बन जाते हैं और जिसे आप दुश्मन समझते हैं समय पर जान लेने की बजाय जान बचा देता है |”

अग्रवाल की बात का मतलब समझ पुष्पांजलि ने बेबाक शब्दों में कहा, “ भाई साहब चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए मै अब अपने दुश्मन को दोस्त कभी नहीं बनाऊँगी |”

“मैंने ऐसा करने को कब कहा है ?”

पुष्पांजलि ने थोड़ी देर के लिए असमंजसता की स्थिति में रहकर पूछा, “भाई साहब वैसे आपकी मंशा क्या है ?”

“मेरी मंशा है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे |”

“आपका मतलब मेरी समझ से बाहर है |”

“मेरा तात्पर्य है कि तलाक की बजाय विनीत की गृहस्थी बस जाए |” 

“भाई साहब यह कैसे संभव है ?”

“आपका असम्भव संभव हो सकता है अगर आप दोनों से हुई गलतियों का प्रायश्चित दोनों अपने अपने तरीके से करने को तैयार हो जाएँ ?” 

पुष्पांजलि आश्चर्य से, “वह कैसे ?”   

“पुष्पांजलि आपको यह त्याग करना पड़ेगा कि आप रजनी और विनीत को अपने से अलग रहने पर सहमत हों |”

पहले तप अग्रवाल का सुझाव सुनकर पुष्पांजलि विचलित सी दिखाई दी फिर साहस करके पूछा, “क्या इसके लिए विनीत मान जाएगा ?”

पुष्पांजलि को समझाते हुए अग्रवाल ने कहा, “हालाँकि विनीत तो आपके लिए हमेशा बच्चा ही रहेगा परन्तु यह भी सत्य है कि वह बड़ा हो गया है, वह भी अपनी गृहस्थी संभालने में समर्थ है |”

फिर अग्रवाल ने चिड़िया के बारे में अपने विचार पुष्पांजलि को सुनाते हुए कहा, “ एक चिडिया की तरह आप का कुछ दिनों के लिए अपनी मोह ममता का त्याग करना ही आपका प्रायश्चित तथा परिवार के लिए हितकर होगा |”

पुष्पांजलि मायूस होकर तथा आँखों में आंसू लाकर बोली, “भाई साहब आप ये कैसी बातें कर रहे हो | मैं विनीत को देखे बिना कैसे जीवित रह पाऊँगी ?”

पुष्पांजलि के ऐसे विचारों ने इतना तो जता दिया था कि वह अपने पुत्र के गृहस्थ जीवन को सुखमय तो देखना चाहती थी परन्तु रजनी को देखना पसंद नहीं करती थी | यही सोच, अग्रवाल ने उसे भरोसा दिलाया, “विनीत को आपके पास आने की कोई पाबंदी नहीं होगी और मैं यह सुनिश्चित करूँगा कि विनीत अलग रहते हुए भी आपसे मिलने रोज जरूर आएगा |” अग्रवाल के कथन ने पुष्पांजलि के मन को बहुत सांत्वना दी | उसने थोड़ी देर सोचा और ऐसा महसूस हुआ जैसे उसने अपने दिल पर पत्थर रखकर कहा हो, “भाई साहब मुझे कोई एतराज नहीं है अगर विनीत इस बात पर राजी हो जाता है |” 

राम सेवक तो पत्नी भक्त था ही अत: अग्रवाल को उसकी हामी की कोई चिंता नहीं थी | अब उसे रजनी तथा उसके घर वालों का विचार जानना था | इसके लिए अग्रवाल ने विनीत से रजनी का फेसबुक कोड लेकर उसके पिता जी को सन्देश भेजा, “नमस्कार, मुझे तो आप जानते ही हैं | मुझे विनीत और रजनी के गृहस्थ जीवन के अवरोध का पता चला | तलाक तो आख़िरी समाधान होता है | अगर आपको मुझ पर विश्वास हो तो क्या मैं रजनी से इस बारे में कुछ बात करके उनके मधुर मिलन का साक्षी बनने की कोशिश कर सकता हूँ ?”

रजनी ने अपने पिता से सलाह मशवरा करके अपने विचार प्रकट किए, “ताऊ जी चरण वन्दना | मैंने आपको वहाँ रहते हुए भी बताया था कि उस घर में मेरे साथ कैसा व्यवहार किया जाता है इसलिए अब मैं उस घर में वापिस नहीं आऊँगी |”

“रजनी मैं आपको उस घर में आने की कतई नहीं कहूँगा परन्तु आप अपने पति के घर में तो आने को राजी हो ?”

रजनी अग्रवाल के समाधान से नावाकिफ, “क्या मतलब , ताऊ जी ?”

“मतलब यह कि आप और विनीत उस घर से दूर अपनी गृहस्थी अलग बसाओगे |”

रजनी के घर वालों ने दो तीन दिनों का समय मांगकर जवाब दिया, “आपके भरोसे पर हम अपना केस वापिस ले रहे हैं | आप विनीत को रजनी को लिवा ले जाने के लिए कभी भी भेज सकते हैं |”

रजनी के घर वालों का जवाब पाकर अग्रवाल को बहुत शकुन मिला | उसने आनन् फानन में विनीत के लिए एक मकान किराए पर लिवा दिया | उसमें चूल्हे चौके का हर सामान रखवा दिया | विनीत रजनी को लिवा लाया | उनकी गृहस्थी का नया सत्र शुरू हो गया | अभी विनीत के घर में खाने पीने के राशन के अलावा सुख सुविधा का कोई सामान नहीं था | मसलन सोने के लिए पलंग न होकर कमरे के एक कौने में जमीन पर ही एक गद्दा बिछा था, ए.सी.की तो बात दूर कूलर भी नहीं था, ठन्डे पाने के लिए फ्रिज न होकर मिट्टी के घड़े का सहारा था, टी.वी. की पूर्ति मोबाईल फोन से हो रही थी इत्यादि | अभी विनीत कर भी क्या सकता था |उसके पिता रिटायर हो चुके थे तथा उनको पेंशन न के बराबर मिलती थी, माँ बीमार रहती थी तथा उसकी बीमारी पर काफी खर्चा झेलना पड़ता था, छोटी बहन शादी के लिए तैयार बैठी थी, मकान बनवाने के लिए कर्ज की किश्त का भुगतान और अब दो जगह की गृहस्थी चलाने के बाद भविष्य के लिए वह कुछ बचा नहीं पाता था | ऐसी स्थिति में वह अपने नए घर में सुख सुविधा के सामान के बारे में सोच भी नहीं सकता था |


Thursday, October 8, 2020

उपन्यास 'अहंकार' (पशचाताप )

      

पशचाताप   

आफिस से वापिस आने पर अपनी पत्नी के साथ अपने ड्राईंग रूम में बैठी औरत को देखकर अग्रवाल  दंग रह गया था | विश्वास नहीं हो पा रहा था कि जिस औरत को वह पिछले बीस सालों से जानता था, वह वही थी | बीस साल क्या अभी तीन महीने पहले की ही तो बात है | पुष्पांजली  जिसके चेहरे की मंद मंद मुस्कान, बात बात पर खिलखिला कर उन्मुक्त हंसी हंसना तथा जिसकी बोली का मिठास बरबस सामने वाले को, उसके दिल में कि काश मैं भी पुष्पांजली  जैसी होती, जलन महसूस करने पर मजबूर कर देती थी |

जैसे बगीचे में फूलों की खुशबू से सारा चमन महकता रहता है तथा भ्रमण करने वाले हर व्यक्ति का मन प्रफुल्लित हो जाता है उसी प्रकार पुष्पांजली  भी जहां बैठ जाती थी अपने आसपास बैठने वाले का मन मोह लेती थी | वास्तव में ही वह अपने नाम को सार्थक कर रही थी | परन्तु आज वह निशचल, उदास, गंभीर, गहन सोच मुद्रा एवं आँखों में आंसू लिए बैठी थी | वह मात्र एक जीता जागता कंकाल लग रही थी | 

किसी के अंदर दाखिल होने की आहट पाकर पुष्पांजली  की तंद्रा भंग हुई | वह खड़ी हो गयी तथा अग्रवाल  को देखकर दोनों हाथ जोडकर अपने चिर परिचित अंदाज में बोली, “भाई साहब नमस्ते |” 

पुष्पांजली अग्रवाल  की पत्नी की पक्की सहेली थी |अग्रवाल  उससे ज्यादा नहीं बोलता था | इसलिए छोटा सा उत्तर दिया, “नमस्ते |” और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया |

अचानक, “अजी सुनते हो |” के शब्द सुनकर अग्रवाल  के बढ़ते कदम रुक गए | उसने पीछे मुडकर देखा | उसकी पत्नी कह रही थी, “ज़रा पुष्पांजली  के दिल की बात सुना लो |”

अजय वापिस मुडकर ड्राईंग रूम के दरवाजे पर आकर खडा हो गया तथा पुष्पांजली  की तरफ देखकर अनायास ही उसके मुख से निकला, “आपको क्या हो गया जो तीन महीने में ही इतनी कमजोर हो गयी हो आप तो ठीक से पहचानी भी नही जा रही ?”

पुष्पांजली  ने नीरसता से जवाब दिया, “भाई साहब सब भाग्य के ही खेल हैं |”

“अभी तीन महीने पहले तो आप अपने बेटे के विवाह में खुद एक दुल्हन जैसी दिख रही थी फिर अचानक.....?”

क्षण मात्र के लिए पुष्पांजली  के चेहरे पर लालिमा दिखाई दी फिर उसने एक लंबी सांस लेकरअग्रवाल  को बीच में ही टोककर कहा, “भाई साहब न जाने हमारे घर पर किस का ग्रहण लगा है कि शादी के बाद कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है |”

“शादी के बाद ! बहू का व्यवहार तो ठीक है न ?”,अग्रवाल  ने अपने मन में उपजी शंका का निवारण करने हेतू पूछा |

पुष्पांजली  के ‘भाई साहब मेरी और जीजी की किस्मत एक जैसी है’ कहने मात्र से ही अग्रवाल  उसके मन में पनप रही नीरसता की भावना का आशय समझ गया था | यह सोच कि उस स्थिति का असर पुष्पांजली  के परिवार के और सदस्यों पर भी पड़ा होगा अग्रवाल  ने जानना चाहा, “राम सेवक जी तो स्वस्थ हैं ?”

“भाई साहब दुःख दर्द का उन पर तो मेरे से पहले असर हो जाता है | वे दो महीने से बीमार चल रहे हैं |नौकरी भी ठीक से नहीं निभा पा रहे हैं |” 

“अरे इतना सब कुछ हो रहा है और आपने जिक्र भी नहीं किया ?”

“राम सेवक   जी ने तो बहुत बार पूछा कि न जाने भाई साहब ने क्यों अचानक यहाँ आना ही छोड़ दिया है ?”

“मैं तो यही सोचे बैठा था कि सब कुछ कुशल मंगल से चल रहा होगा | अगर ऐसा नहीं था तो कम से कम अंदाजा तो दे देना था |”   

“भाई साहब आपने पहले ही हम पर इतने एहसान किए हैं फिर आपकी अपनी सेहत भी कोई खास ठीक नहीं रहती | इसलिए आपको और चिंता में डालना नहीं चाहती थी |”

“देखो एहसान की बात मत किया करो | जब अपना मान ही लिया है तो यह एहसान शब्द बीच में नहीं आना चाहिए |”

पुष्पांजली  हाथ जोड़कर, “गलती हो गई, भाई साहब आज के बाद ऐसा नहीं कहूंगी |”

अजय पुष्पांजली  की उसके कहने ‘भाई साहब मेरी और जीजी की किस्मत एक सी है’ से ही समझ गया था कि समस्या क्या है | और यह आभाष अग्रवाल  को उसकी पुत्र बधू को पहली नजर में देखने पर हो गया था कि भविष्य में क्या गुल खिलने वाले हैं | परन्तु उसने उस समय अधिक विस्तार से न कहकर केवल इतना कहा था, “पुष्पांजलि आपने अपना जीवन जहां से शुरू किया था विनीत  को आपने वहीं से शुरू करने पर मजबूर कर दिया है |”

अग्रवाल  की बात सुनकर पुष्पांजली  ने कोई जवाब नहीं दिया, वह चुप रही |

अग्रवाल  ने सीधा प्रशन किया, “वैसे समस्या क्या है ?”  

धीरे धीरे पुष्पांजली  ने अपने दिल में बसी चुभने वाली सारी बातें उड़ेलनी शुरू कर दी | अंत में उसने एक ठंडी व लंबी सांस भरी तथा शांत हो गयी | ऐसा लगा जैसे बहुत दिनों से उसके मन में जो गुब्बार भरा था वह निकलने से उसने बहुत हल्कापन महसूस किया था तभी तो वह एक ठंडी व लंबी सांस लेकर थोड़ी देर के लिए शांत हो गयी थी जैसे उसे बहुत भारी चैन का अनुभव हुआ था |

आशवस्त होने पर उसने फिर कहना शुरू किया | भाई साहब शायद आपको नहीं पता परन्तु मैं जानती हूँ कि आप  पिछले २० साल से मुझे निस्वार्थ सहयोग करते आ रहे हैं | अब आपके कारण ही मैं अपने मकान में रह रही हूँ | आपके कारण ही मैं अपने लडके की शादी करने में समर्थ हो पाई हूँ | शायद यह मेरे पिछले जन्म के ही पुन्य होंगे जो मुझे आपका सहारा मिला | जैसे अब तक आपने मेरी नैया के खीवईया बन कर मेरी नैया को पार लगा दिया है अब एक और एह....नहीं नहीं एक और समस्या के तारणहार बन जाओ |

अग्रवाल पुष्पांजली  के क्या किसी के भी पारिवारिक मामले में उलझना नहीं चाहता था | उसे पुष्पांजली  के परिवार की आर्थिक स्थिति के बारे में पूरा अंदाजा था इसलिए उसने पुष्पांजली  का मकान बनवाने के लिए उनकी आर्थिक सहायता करवा दी थी परन्तु उनके अंदरूनी मामले से वह दूर ही रहना चाहता था | इसलिए पूछा, “क्या मतलब ?”

पुष्पांजली  अपने स्थान से उठी तथा अग्रवाल  के पास आकर नीचे झुकते हुए बोली, “कृप्या मेरी इस समस्या का निदान और कर दो जिससे हमारा परिवार बाकी का जीवन सुख चैन से बिता सके |”

अग्रवाल  अपने स्थान से पीछे हटते हुए बोला, “देखो ऐसा मत करो | दया तथा कृप्या तो ऊपर वाला ही करता है | हम तो कोशिश ही कर सकते हैं | वैसे आप अपने लडके को भेजना | पहले मैं उससे सलाह करूँगा कि क्या करना उचित रहेगा |”

अग्रवाल के उसकी गूढ़ समस्या को हल करने के प्रयास के हाँ कहने मात्र से ही पुष्पांजली  के चेहरे पर सन्तुष्टता के भाव उभर आए | जाते जाते पुष्पांजली  का मुख मंडल पहले की तरह ताजा पुष्प के माफिक तो नहीं फिर भी कुम्लाहे सुमन पर ठंडा पानी छिडकने से जैसी रौनक उभर आती है वैसी रौनक उभर आई थी | 

विनीत  की हालत भी अपनी मम्मी से बेहतर नहीं थी | पता चला कि वह रात के समय एकांत के समय में इन्हीं तनाव के सागर में गोते लगाता रहता था | सोचने में वह इतना तल्लीन हो जाता था कि किसी तरह की कोई खबर ही न रहती कि उसके आसपास क्या हो रहा है | उसकी रात की नींद तथा दिन का चैन छीन गया था | लगा वह तन मन से थक गया था | यह भी बात सामने आई कि हमेशा इसी सोच में डूबे रहने के कारण वह आफिस में काम करते समय भी तनावग्रस्त रहने लगा था तथा गलतियां करने लगा था | साफ़ पता चल रहा था कि उसकी सेहत दिन प्रतिदिन बद से बदतर होती जा रही थी |

विनीत को देखकर अग्रवाल ने पूछा, “क्या बात है मुरझाए से लग रहे हो ?”

विनीत ने एक ठंडी सांस ली और थका सा सोफे पर बैठकर कहा, “ताऊ जी घर में कलह की वजह से परेशान हूँ |”

“घर में कलह का कारण क्या है ?”

“सास बहू की आपसी नोक झोंक जिसका कोई अंत नहीं होता |”

“कुछ तो कारण होता होगा ?”

“घर के काम को लेकर |”

“क्यों रजनी ठीक से काम नहीं करती क्या ?”

“मेरे हिसाब से तो ठीक करती है परन्तु मेरी मम्मी जी................|’

विनीत कहता कहता बीच में ही रुक गया | शायद उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि अपनी मम्मी जी को गलत ठहरा सके | उसे चुप देख अग्रवाल ने पूछा, “अब रजनी कहाँ है ?”

“वह तो छः महीने से अपने पीहर है |”

अग्रवाल अश्मंजस से, “छः महीने से ?”  

अग्रवाल  ने उसे सान्तवना देकर कहा, “देखो चिंता चिता का रास्ता बन जाता है अगर उसे समाप्त न किया जाए | मायूस होकर बैठने से समाधान नहीं मिलता उसके लिए जुगाड करना पडता है जैसे मजिंल पर पहुचने के लिए चलना पडता है | ” और अग्रवाल  ने विनीत  को एक रास्ता सुझाया | विनीत ने जल्दी ही उस पर अमल भी करना शुरू कर दिया |

रजनी को अपनी ससुराल छोड़े लगभग छ: महीने व्यतीत हो गए थे | इस दौरान न तो विनीत  का कोई फोन ही आया तथा न ही कोई चिट्ठी आई | रजनी प्रत्येक दिन कमप्यूटर पर अपने पति विनीत  की मेल, इस आशा में कि हो सकता है वे उसे याद करने का यही मार्ग अपना लें, खोलकर भी देख लेती थी | परन्तु अभी तक उसे निराशा ही हाथ  लगी थी | जैसे जैसे समय बितता जा रहा था रजनी के साथ साथ उसके माता पिता का तनाव भी बढता जा रहा था | 

रजनी को याद आने लगा उसके प्रति विनीत  का प्यार, उसकी जिद के आगे झुकना, उसे खुश रखने का हर प्रयास करना परन्तु उसने अपने अहंम तथा अपनी सास के अहंकार को खत्म करने के खातिर अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली | उसे ससुराल में रहकर ही अपने पति की सहायता से समस्या को सुलझा लेना चाहिए था | अब वह क्या करे यही सोच कर उसकी कंपकपी छूट गयी और वह फूट फूट कर रोने लगी |

आज उसने ज्यों ही कम्प्युटर पर अपने पति की मेल देखी तो उसकी खुशी का पारावार नहीं रहा | उसे जैसे अमृत मिल गया हो | उसने बिना देर लगाए उस पर अपनी नजरें गड़ा दी और पढने लगी | ज्यों ज्यों वह पढती जा रही  थी उसका दिल बैठे जा रहा था | ऐसा महसूस हो रहा था जैसे जिस प्याले को उसने अमृत समझ कर पीना शुरू किया था वास्तव में वह जहर का प्याला निकला | लिखा था, “एक सुन्दर, स्वस्थ, सुशील, एम्.बी.ए. नौकरीपेशा परन्तु तलाक शुदा ब्राम्हण परिवार के लड़के के लिए आवशयकता है एक सुन्दर, सुशील, गृहकार्य में दक्ष, मिलन सार एवं पढ़ी लिखी लडकी की | बेहतर होगा कि वह वर पक्ष के परिवार के सदस्यों की भावनाओं व् संवेदनाओं को भांपते हुए तथा उदार दर्ष्टिकोण अपनाते हुए घुलमिल कर रह सके |”

पढते पढते रजनी के हाथ पाँव कांपने लगे | वह पसीने से लथपथ हो गई | एक बात से रजनी के चोर मन को सान्तवना मिली जब उसने बीच में रुक कर सोचा कि यह इशतहार विनीत  का नहीं हो सकता क्योंकि वह तलाकशुदा नहीं है | उसने अपने को आशवस्त करने के लिए एक बार और उसे दोहराया परन्तु उसकी यह धारणा धराशाही हो गई जब रजनी ने नीचे लिखा पता देखा :

भेजने वाला : विनीत  

म.न. ६५3 हुड्डा 

टे.9313984463                 

एकबार उसकी चीख निकल गई | नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता | विनीत  मुझे तलाक नहीं दे सकता | उसकी चीख सुनकर उसके माता पिता दौड़े हुए आए और अपनी लडकी की हालत देख कर दंग रह गए | वह अपने होश खोकर निढाल सी होती जा रही थी | पिता ने उसे सहारा देकर पूछा, “क्या बात है बेटी इतनी परेशान क्यों है ?”

रजनी ने बिना कुछ कहे बड़े ही नीरस नज़रों से कम्प्युटर के परदे की तरफ इशारा किया और टुकुर टुकुर देखने लगी | जब उसके माता पिता कम्प्युटर के परदे पर लिखे को पढने लगे तो रजनी अपने ही ख्यालों में खो गई | उसके कृत्य जो उसने विनीत  और उसके परिवार के साथ किए थे उसके जहन में चलचित्र की भाँति एक एक करके आंखों के सामने आने लगे | 

शादी के बाद दो तीन महीने ही बीते होंगे कि एक रात को रजनी ने अचानक विनीत  से कहा, “विनीत  इस घर के माहौल में मेरा दम घुटता है | मैं अलग रहना चाहती हूँ |”

रजनी की बात सुनकर विनीत  थोड़ी देर के लिए अवाक खडा अपनी पत्नी को देखता रह गया | उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि रजनी कभी ऐसा निर्णय भी ले सकती है | उसने संयम बरतते हुए पूछा, “इतनी जल्दी ऐसा क्या हो गया जो तुम ऐसी बात कर रही हो ?”

“इस घर में मुझे सभी ढोंगी तथा ड्रामें बाज समझते हैं |”

“तुम घर का काम तो करती हो परन्तु ऊपरी मन से गिरते पड़ते जिससे वह  ड्रामा ही लगता है |”

 रजनी आवेश में बोली, “अच्छा तुम भी, तो ठीक है, मुझे अपने ढंग से जीने की आजादी चाहिए ?”

“तुम्हारा इस आजादी का मतलब क्या है ?”

“मेरा मतलब साफ़ है | मैं कुछ भी पहनूं, कुछ भी खाऊँ, कुछ भी करूँ उसमें मुझे किसी की भी, किसी प्रकार की भी टोका टाकी पसंद नहीं है |”

“अब भी तो तुम ऐसा ही कर रही हो | सभी के कहने के बावजूद तुम सुबह साढ़े आठ बजे से पहले बिस्तर नहीं छोडती | जबकि तुम्हें पता है कि मेरी माँ रोज सुबह साढ़े पांच बजे उठकर मेरे पापा जी के लिए खाना तैयार करती हैं |”

रजनी गुर्राई, “सुबह उठती नहीं तो क्या, इस घर में मुझे चैन से सोने ही कौन देता है ?”

विनीत  कुछ झल्लाकर बोला, “बिस्तर छोडती भी नहीं, सोती भी नहीं तो फिर क्या करती हो ?”

रजनी ने तपाक से जवाब दिया, “करवटें बदलती रहती हूँ |”

“क्यों भला ! वैसे तुम्हें पता है कि तुम कह क्या रही हो ?”

रजनी ने दृड़ता  से जवाब दिया, “मैं ठीक कह रही हूँ | रात को आप डयूटी निभाते हो | सुबह तीन बजे आते हो जिससे मेरी नींद उचट जाती है | सुबह सवेरे माताजी की खटपट शुरू हो जाती है क्योंकि उन्हें पापा जी का टिफिन तैयार करना पडता है | इसके बाद तुम्हारी लाडली बहन का मेरे कमरे में चक्कर काटना शुरू हो जाता है क्योंकि उसे आफिस में दिखाने  के लिए श्रंगार करने को ड्रेसिंग टेबल की जरूरत पडती है | अब आप ही बताओ मेरी आठ घंटे की नींद कहाँ पूरी हो पाती है ?”  

विनीत ने रजनी को आराम से समझाना चाहा, “तुम तो दोपहर में भी आराम कर लेती हो | कभी हमारे परिवार वालों की तरफ भी ध्यान दिया है | इतनी उम्र में भी मम्मी जी सुबह से काम में लग जाती हैं | वे पापा जी का, गुडिया का तथा मेरा टिफिन तैयार करती हैं | यह सोचकर कि तुम्हारे आराम में खलल पडेगा वे तुम्हें आवाज भी नहीं लगाती और तुम अपने आप उनकी सहायता को उठती नहीं |”

रजनी जलभुन कर बोली, “रहने दो रहने दो, अपनी मम्मी की तारीफ़ के ज्यादा पुल मत बाँधो | पापा जी अपनी तनखा भी तो लाकर उनके हाथ पर रख देते हैं | और एक मै हूँ जिसको एक एक पैसे के लिए मोहताज की तरह दूसरों का मुहं ताकना पडता है |”  

“मैं मम्मी जी की तारीफ़ बेकार में नहीं कर रहा हूँ | वे तुम्हें बना ठना हमेशा नई नवेली दुल्हन की तरह देखना चाहती हैं |हालाँकि वे तुम्हें खाना बनाना सिखाना चाहती हैं परन्तु इंतज़ार कर रही हैं कि कब तुम्हारे अंदर ऐसा करने की जागृति पैदा हो | गुडिया तो फिर भी मम्मी जी के काम में हाथ बंटा देती है परन्तु तुम......|”

जैसे पुलिस वाला चौराहे पर खडा चलती ट्रैफिक को रोकने के लिए अपना हाथ उठाकर इशारा करता है उसी प्रकार रजनी ने अपने हाथ के इशारे से विनीत  की बोलती बंद करते हुए कहा, “बस बस बंद करो | अब अपनी मम्मी के साथ साथ अपनी बहन की तारीफ़ के कसीदे भी काढने लगे |”  

“क्यों तारीफ़ लायक काम करने वालों की तारीफ करने में क्या बुराई है ?”

विनीत  की बात सुनकर रजनी बिफर पड़ी, “हाँ हाँ मैं तो निक्कम्मी हूँ, जाहिल हूँ, गंवार हूँ, हर समय शीशे के सामने खड़ी श्रृंगार करने के अलावा घर का कुछ काम नहीं करती |”

विनीत  ने सफाई दी, “देखो रजनी, खाना माँ तथा गुडिया मिलकर बनाती हैं, झाड़ू, पोछा तथा बर्तन मांजने वाली बाई लगी ही हैं |घर में कपडे धोने का काम और रह जाता है परन्तु उसमें भी तुम अपने अपने कपड़े धोकर हाथ साफ़ कर लेती हो | फिर बताओ तुम किस काम में सहायता करती हो ?”

विनीत  की बात सुनकर रजनी बिफर पड़ी, “आपको तो पत्नी क्या होती है इसका ज्ञान भी नहीं है | इस घर में मैं क्या काम करती हूँ, कैसे रहती हूँ, मै कौन हूँ आपको कुछ पता नहीं | मैं आपको बताती हूँ | सुबह पापा जी तथा विजया का खाना मैं बनाती हूँ | जब से मैं आई हूँ झाडू, पौचा, बर्तन तथा कपड़े मैं ही धोती हूँ क्योंकि बाईयों की छुट्टी कर दी गई है | आप रात को चले जाते हैं, दिन में सोते हैं आपको अपनी पत्नी के लिए समय ही कहाँ है | खैर  जब मैं कुछ करती ही नहीं तो आप लोगों पर खाने का बोझ भी क्यों बनूँ | मैं अपने मायके जाकर ही रह लूंगी |” और वह अपना सामान बांधने लगी | 

रजनी अपना सामान बांधने में मशगूल थी | विनीत  ने उसे समझाने की कोशिश जारी रखी, “रजनी तुम तो जानती हो कि मैं अपने माँ बाप का इकलौता लड़का हूँ | दोनों की सेहत भी खास ठीक नहीं रहती | अपनी छोटी बहन की जिम्मेदारी भी मुझे निभानी है | ऐसे में मैं अलग घर बसाने की कैसे सोच सकता हूँ ?”

रजनी तुनक कर तथा हाथ घुमाकर चिल्लाई, “हाँ हाँ तुम्हारी जिम्मेदारी तो तुम्हारे अपने परिवार तक ही सीमित है | क्या मेरे प्रति तुम्हारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती ?”

अपने ऊपर बेबुनियाद आरोप लगते देख विनीत  थोड़ा आवेश में बोला, “तुम्हारे प्रति मैं कौन सी जिम्मेदारी नहीं निभा रहा ? तुम्हारी हर उल्टी सीधी फरमाईस के सामने झुक जाता हूँ तथा उसे पूरा करने का हर संभव प्रयास करता हूँ | परन्तु जो करना संभव ही नहीं है वह मैं कैसे मान सकता हूँ ?”

रजनी ने, जो शायद कुछ समझना ही नहीं चाहती थी, पलटवार किया, “तुम भी अपने माँ बाप की तरह वही पुराने ख्यालों की दुनिया में जी रहे हो जिन्हें घर, परिवार और बच्चों के अलावा कुछ नहीं सुझता | दुनिया की रफ़्तार से न तुम्हें तथा उन्हें कोई वास्ता नहीं | लगता है तुम सब एक कुँए के मेंढक बनकर रहने में ही खुश हो |”

विनीत  को रजनी के ऐसे कटाक्ष की उम्मीद न थी | वह बाहर से अंदर तक जल भुन गया तथा अपना आपा खोते हुए गुस्से में बोला, “रजनी अपनी जबान पर लगाम दो | तुम अपनी हद से बहुत आगे बढ़ रही हो |”

विनीत  का हाथ ऊपर उठा देख रजनी भी आग बबूला हो गई, “हाँ हाँ मारो | यही रह गया था | मैं अब साफ़ कहे देती हूँ कि मुझे यह रोज रोज की झिक झिक पसंद नहीं | अब मुझे तुम्हारे परिवार के साथ एक पल भी नहीं रहना | और अगर तुम मेरा साथ नहीं निभा सकते तो मुझ से अलग हो जाओ | मुझे तलाक दे दो |”

रजनी के आख़िरी शब्दों ने थोड़ी देर के लिए विनीत  को किंकर्तव्यमूढ़ कर दिया | उसके पैरों के तले की जमीन खिसकती दिखाई दी | उसकी आँखों के सामने अन्धेरा छा गया | उसे गुमान भी नहीं था कि वह इतनी बड़ी बात कह देगी | विनीत  ने संभलकर पूछा, “क्या कह रही हो, तुम्हें तलाक चाहिए ?”

“हाँ हाँ मैनें वही कहा है जो तुमने सुना है | मैं अपने माँ-बाप के घर जा रही हूँ जहां मुझे किसी बात के लिए नहीं टोका जाता | मुझे देखकर वहाँ कोई मुहँ नहीं बनाता बल्कि उन्हें खुशी होती है | तलाक नामा भेज देना मैं दस्तखत कर दूंगी”, कहकर रजनी निश्चल विनीत  को खड़ा छोड़ अपना सामान लेकर बाहर निकलने लगी | 

पुष्पांजली  ने अपने मन की पूर्ति होते देख अपनी बहु को स्वंय ही उसके पीहर छोड़ आने का फैसला कर लिया | विनीत  भी हर द्रष्टिकोण से नाप तौलकर इस निष्कर्ष पहुँचा कि आपस में प्रेमभाव, विश्वास, एक दूसरे को समझने की कोशिश तथा सामंजस्य रखने की भावना न हो तो सम्बंधों को चिरायु नहीं रखा जा सकता | अत: अपने माता पिता के फैसले पर विनीत  ने कोई आपत्ति नहीं उठाई | 

समय के साथ रजनी को लगने लगा कि वह अब विनीत  से अलग नहीं रह पाएगी | परन्तु अभी भी उसके मन के किसी कोने में छिपकर बैठा उसका अहम तथा सास की दोगले व्यबहार का ख्याल उसे पीछे धकेल रहा था |

विनीत  की भेजी हुई मेल को क्लिक करके पढने के बाद तो रजनी कि होश ही फाख्ता हो गए थे | उसका दिन का चैन तथा रातों की नींद गायब हो गई थी | जैसे बंद पिंजरे में एक शेर, यह सोचकर कि शायद उसे बाहर निकलने के लिए कोई रास्ता मिल जाए, पिंजरे के अंदर ही इधर से उधर चक्कर काटने लगता है | उसी प्रकार रजनी अपने विचारों में खोई, कि इस समस्या का हल क्या होगा, अपने घर में पागलों की तरह एक कौने से दूसरे कौने के चक्कर लगाने लगी | उसकी समझ नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे | आखिर उसने अपने अंदर छिपे दंभ को बाहर निकालने में ही अपनी भलाई समझी | अपने मन पर विजय  पाने के पश्चात रजनी ने अपने निर्णय अनुसार मेल भेजा, “मैं बिना शर्त वापिस आ रही हूँ |”

मेल भेजने के बाद रजनी विनीत  के जवाब के लिए ऐसे इंतज़ार करने लगी जैसे एक स्वाती पक्षी, अपनी प्यास बुझाने के लिए, घुमडते मेघों से पानी गिरने का इंतज़ार करता रहता है |”

विनीत  की मेल आई | रजनी ने क्लिक किया | छोटा सा जवाब लिखा था, “नहीं तुम मत आना |”

विनीत  का जवाब पढकर रजनी की रूह काँप गई | उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि कभी मेरे सामने हाथ जोडकर हाड़े खाने वाला व्यक्ति इतना कठोर बन सकता है कि सारे रिश्ते नाते ही भुला दे | रजनी ने अपने आप से कहा कि परिस्थितियाँ मेरी तरह, व्यक्ति को ऐसा कदम उठाने पर मजबूर कर देती हैं और वह फफक फफक कर रो पड़ी 

रजनी को याद आने लगे विनीत  के वे शब्द, जब उसने (रजनी) झूठे ही बताया था, “मैं माँ बनने की राह पर अग्रसर हो चली हूँ |”                                      

विनीत  मेरी सुनकर भाव विभोर हो उठा था तथा बोला था, “बहुत खुशी की बात है कि तुम्हें एक माँ का गौरवशाली तथा ममता से भरपूर रूप प्राप्त होने वाला है | साथ ही मैं तुम्हारा आभारी हूँ कि तुम्हारे कारण मुझे भी एक पिता कहलाने का सौभाग्य मिलेगा |” 

मैं उन्हें कैसे विशवास दिलाऊँ कि रजनी के दिल में व्याप्त रजनी का अन्धेरा अब छंट चुका है तथा उसका स्थान रजनी के बाद आने वाले प्रकाश से सराबोर उन किरणों ने ले लिया है जो संसार के प्राणियों के जीवन में प्रतिदिन एक नए साहस का संचार करती हैं | रजनी ने अपने कृत्यों का प्रायश्चित करने का दृड़ निशचय कर लिया था | उसने अपने मनोभावों से अवगत कराने के लिए विनीत  को फोन मिलाया,”विनीत  मैं तुम्हारे पास आ रही हूँ सदा......?”

विनीत  ने रजनी की पूरी बात सुने बिना ही फोन फोन काटते हुए केवल एक शब्द कहा, “नहीं |”  

इस एक नहीं शब्द ने रजनी के मन में इतना अन्धेरा भर दिया जैसे आज की रजनी के बाद सुबह का प्रकाश कभी दिखाई ही नहीं देगा | वह सारी रात रोती  रही तथा सोचती रही कि अब वह क्या करे | वह किसका सहारा ले | दूसरी तरफ विनीत  की माँ ने अपने बेटे को गुस्से में ‘नहीं’ कहकर फोन पटकते हुए देख लिया था | उसने विनीत पर अपनी झूठी भावनाओं का विश्वास जमाने हेतू समझाया, “बेटा अब तू बे-रूखी से पेश मत आ | स्त्री होने के नाते मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि रजनी के मन में अब हमारे प्रति अनादर एवं नफ़रत की भावना समाप्त हो चुकी है | अब वह अपने कृत्यों का प्रायश्चित करना चाहती है तथा उसके दिल में प्यार, आदर, स्नेह तथा हमारे प्रति इज्जत की भावना लौट आई है |”

“पर माँ.... ?”

“अब आगे कोई आनाकानी नहीं | उसे सूचना भेज दे कि तुम उसे लेने आ रहे हैं |” 

अपनी माँ के मन में रजनी के प्रति किसी प्रकार के कोई रोष को न भांप विनीत  सकते में आ गया | उसके विचारों के अनुसार जिस औरत ने उसके पूरे परिवार की नाक में दम कर रखा था माँ ने उसे कितनी आसानी से क्षमा दान दे दिया था | विनीत  अपनी माँ के सीने से लग कर फफक फफक कर रो पड़ा | माँ की अंदरूनी भावनाओं से अनभिग्य उसके मुहं से निकला, “माँ तुम माँ हो, तुम  धन्य हो |” 

विनीत माँ के सीने से लगा उसके ऊपरी आडम्बर को तो देख सकता था परन्तु अपनी माँ के सीने में दफ़न उस घर्णित चाल की भनक भी महसूस न कर सका जो सोच रही थी, “आने दे रजनी को उसकी नाक में नकेल डालकर कोल्हू के बैल की तरह न पेला तो मेरा नाम भी पुष्पांजलि नहीं |”        

रजनी के माता पिता ने सुबह जब उसका चेहरा देखा तो देखते ही रह गए | सूजी हुई आँखें, पीला चेहरा जैसे शरीर में खून का एक भी कतरा न रह गया हो | उन्हें देखकर रजनी ने उठने की कोशिश की परन्तु अपने को असमर्थ पा बैठी की बैठी रह गई | अपनी लाडली की ऐसी हालत देख कर उसकी माँ ने भयभीत ह्योकर पूछा, “क्या बात है रजनी, कल शाम तक तो तुम ठीक थी | अचानक तुम्हें यह क्या हो गया है ?”

अपनी माँ को सामने देख कर एक बार फिर रजनी की रूलाई फूट पड़ी | वह किसी तरह उठी और अपनी माँ के गले लगकर रोते रोते बोली, “माँ...उन्हों..ने,...उन्हों..ने,...वे...मुझे....त..ला..क..दे.. र..हे..हैं |”

रजनी के शब्दों को सुनकर उसके माँ बाप के होश उड़ गए | उनको अचानक अपनी गलतियों का आभाष हुआ कि विनीत  के माता पिता की शिकायत के बावजूद उन्होंने अपनी लडकी का पक्ष लिया था | यही नहीं उन्होंने समस्या को सुलझाने का रास्ता अख्तियार करने की बजाय रजनी को अपने पास रखने की भूल की थी | कुछ आश्वस्त होने पर रजनी की माँ ने सवाल  किया, “तुम्हें कैसे पता चला ?”

...........................रजनी कुछ न बोली | वह शून्य को निहारती रही |

पिता ने रजनी को झंकझोड़ कर पूछा, “बोलती क्यों नहीं ?”

इस बार रजनी ने मेज पर रखे कम्पूटर की तरफ इशारा किया, “उस पर उनकी मेल पढ़ी थी |”

दोनों उतावलापन दिखाकर, “ज़रा दिखाना क्या लिखा है ?”

रजनी विनीत  की मेल को क्लिक करके एक तरफ हटकर सुबकने लगी | पिता ने पढ़ना शुरू किया | लिखा था, “माँ के अनुसार एक दुल्हा ही अपनी दुल्हन को अपनी ससुराल से उसकी ससुराल लिवा कर ले जाता है | अत: तुम्हें आने की जरूरत नहीं है | प्रथा को निभाने मैं तो नहीं आ सकता परन्तु मेरी मम्मी जी आ रही हैं  |”

मेल पढकर रजनी के पिता जी ने ऐसा जोर का ठहाका लगाया जैसे बात के असर से वे पागल हो गए हों | वे पास रखी कुर्सी पर बैठकर हंसते हुए कम्प्युटर की तरफ इशारा करने लगे | वे तो अपने मन का बोझ जो उनकी लडकी के पीहर रहने से दिन प्रतिदिन बढता जा रहा था हटने के कारण हंसते ही जा रहे थे परन्तु रजनी और उसकी माँ उनकी मुद्रा देखकर हतभ्रत एवं बेचैन हो गई | रजनी भी अपना दुख भूलकर अपने पिता के व्यवहार को लेकर चिंतित दिखाई देने लगी | अचानक रजनी की निगाह जब कम्प्यूटर के परदे पर पड़ी तो वह अचम्भित होकर उसे देखती रह गई | एक झटके में ही उसका सारा तनाव, तड़प, गीले-शिकवे, रोना एवं दुःख दर्द एवं पिता जी की तरफ से उपजी चिंता सब समाप्त हो गए थे |

ससुराल पहुँच कर जब रजनी अपनी सास के चरण छूने लगी तो सास ने एक झटके में उसे बाहों से पकड़ कर अपने गले लगा लिया और बोली, “ना ना रजनी अपनी बेटियों से पैर नहीं छुआए जाते |”

रजनी गदगद हो उठी | रात को अपने मन का संशय मिटाने के लिए रजनी ने विनीत  से जानना चाहा, “क्या वास्तव में ही विनीत  तलाक लेना चाहता था ?”

विनीत  ने रजनी को अपनी बाहों में भर अपने सीने से लगाकर मुस्कराकर बताया, “यह तो तुम्हें राह पर लाने के लिए, मेरे ताऊ जी द्वारा सुझाया, धीरे से एक जोर का झटका भर था | भला प्राणों को भी जिस्म से कभी अलग किया जा सकता है |” 

रजनी कुछ न बोली | पहले से ही विनीत  के स्पर्श से उसे जीवन के परम सुख का आभाष हो रहा था | विनीत  के विचार सुनकर वह उसके सीने से और जोर से चिपक गई जैसे सचमुच ही वह विनीत  के शरीर में घुसकर उसके प्राण बन जाना चाहती हो |         

अग्रवाल के सुझाव से रजनी अपनी ससुराल लौट तो आई थी परन्तु अपने अनुभव से वह शंकित था कि पुष्पांजलि उसे अधिक दिन टिकने नहीं देगी | इसलिए उसने विनीत को आगाह करने तथा समझाने का फैसला किया | उसने बिना किसी को नामजद किए विनीत को कहा, “देखो इस संसार में यह पहचानना मुश्किल है कि कौन अपना है और कौन पराया | अधिकाँश लोग जीवन भर इस अंतर को न पहचानने के कारण परेशानी में पड़े रहते हैं | मित्र और शत्रु की पहचान तो हो जाती है परन्तु जो अपना या मित्र बनकर शत्रु बना रहता है उनकी पहचान अनुभवी या विवेकशील व्यक्ति ही कर सकता है | अनुभवी लोग व्यक्ति के हावभाव तथा आखें देखकर ही पहचान लेते हैं कि सामने वाला व्यक्ति कैसा है | इसीलिए बुजुर्गों और युवा पीढ़ी में अंतर होता है | युवा के पास जोश होता है परन्तु होश नहीं होता इसके विपिरीत बुजुर्गों के पास होश होता है जोश नहीं होता | इसीलिए युवा अज्ञानतावश अपनेपन का नाटक करने वाले किसी छली, फरेबी, कपटी या स्वार्थी व्यक्ति के चंगुल में फंस कर अपना विनाश कर लेते हैं | कभी कभी स्वभावत: हमारे अपने भी इसमें लिप्त पाए गए हैं | अत: अपनी गृहस्थी सुचारू रूप से निर्वाह करने के लिए बहुत सावधान रहने की जरूरत है |”

अग्रवाल ने अपने मन का अंदेशा विनीत को जता तो दिया था परन्तु वह अपनी आखों से अपनी माँ की ममता की पट्टी को   उतारने में असमर्थ रहा और एक दिन रोता बिलखता विनीत फिर अग्रवाल के पास जा पहुंचा | वह बहुत घबराया हुआ था | चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थी | उसकी हालत देख अग्रवाल सकते में आ गया | विनीत को थोड़ा ढांढस देकर अग्रवाल ने पूछा, “क्या हुआ इतना घबरा क्यों रहे हो ?”

विनीत रोकर बोला, “ताऊ जी सब कुछ बर्बाद हो गया |”

“क्या बर्बाद हो गया कुछ बताओगे भी ?”

“ताऊ जी वह रजनी........|”

“रजनी क्या ?”

“र...ज...नी..भाग गई |”

“भाग गई | कहाँ भाग गई ?”

“ताऊ जी वह घर पर नहीं है |”

“क्या घर पर कोई नहीं था जब वह बाहर गई थी ?”

“मम्मी जी थी |”

“फिर वह कैसे चली गई ?”

इस बार विनीत की जुबान उसका साथ देने में असमर्थ जान पड़ रही थी वह हकलाया, “ता...ऊ.. जी.., उसने म..म्मी जी के गा..ल..प.र  दो  थ..प्प..ड़ मारे और बा..ह..र निकल गई |”

“पुष्पांजलि को थप्पड़ मारे !”

“हाँ ताऊ जी मम्मी जी तो यही कह रही हैं |”

“क्या घर में कलह चल रही थी ?”

“वह तो रजनी के आने के दस बारह दिनों बाद ही शुरू हो गई थी |”

“मैनें जो तुम्हें शिक्षा दी थी शायद उस पर तुमने अमल नहीं किया ?”

“ताऊ जी उसके बारे में तो मैं तब सोचता जब कोई बाहर का व्यक्ति हमारे घर होता |”

“तो उसने तुम्हारी मम्मी जी को ही थप्पड़ क्यों मारा ?”

विनीत निरूत्तर अपने ताऊ जी का चेहरा निहारने लगा और गहन सोच में डूब गया | इधर अग्रवाल ने सोचा कि अहंकार क्रोध को जन्म देता है और क्रोध का उद्देश्य सामने वाले को डराना होता है | क्रोध के समय जिस पर अपने रोद्र रूप की छाप छोड़कर उससे समर्पण कराने की कोशिश की जाती है उसके स्वाभिमान को चोट पहुँचती है जिससे क्षुब्ध होकर सामने वाला प्रतिशोध लेने की सोचने लगता है | ऐसा ही पुष्पांजलि और रजनी के बीच हुआ होगा | 

विनीत अपने ताऊ जी की दी शिक्षा के आधार पर अतीत के पन्नों को जोडने लगा |     

“रजनी मेरे पास आने के बाद मुझ से ऐसे लिपट गई थी जैसे अब वह कभी मुझे नहीं छोडेगी |”

“माँ के बीमार रहने के कारण वह घर के सारे काम खुद ही निपटा देती थी |”

“अचानक उसे ख्याल आया कि एक हफ्ता पहले वह अपने पिता जी से बात करने की बात कह रही थी | परन्तु मैनें जब कहा कि पूछ क्या रही हो करलो तो उसने कहा था कि उसके पास फोन नहीं है |”

“इसी समय मम्मी जी ने मुझे किसी काम के लिए आवाज दी थी और मैं रजनी की बात को भूल गया था |”

“उसका फोन कहाँ था ?”

यह सोचने के बाद वह उठा और बाहर जाते हुए बोला, “ताऊ जी मुझे कुछ जरूरी काम याद आ गया है मैं आपसे फिर मिलूँगा |” 

विनीत ने अपने घर जाकर अपनी मम्मी जी से जानना चाहा कि रजनी के पास जो फोन था वह कहाँ है ? उसका अचानक यह प्रशन करना पुष्पांजलि को अचंभित कर गया | वह सोचने लगी कि आज यह अपने ताऊ जी के पास से इतनी जल्दी कैसे वापिस लौट आया | आज उसके चेहरे पर वह आभा भी नजर नहीं आ रही जो अक्सर जब वह वहाँ से लौटता था तो महसूस होती थी | पुष्पांजलि ने पूछा, “क्यों क्या बात हो गई ?”

विनीत ने आज पहली बार अपनी मम्मी जी के सामने रूखे स्वर में पूछा, “उसके पास अपना फोन था न ?”

“हाँ था |”

“फिर एक दिन उसने मेरे से क्यों कहा था कि उसके पास फोन नहीं है ?”

पुष्पांजलि अपने मन में इस बात पर माँ बेटे के बीच दीवार बन जाने की सोच से सिहर उठी | फिर भी साहस करके बताया, “वो वो वह हमेशा फोन पर ही चिपकी रहती थी इसलिए मैनें लेकर रख लिया था |”

“मम्मी जी क्या उसे अपने घर वालों से बात करने की भी मनाही थी ?”

अपने बेटे की बात सुनकर पुष्पांजलि को आज पहली बार अपने आज्ञाकारी बेटे के तेवर देख कर डर सा लगने लगा था | वह उठकर खड़ी हो गई और विनीत को बाहों से पकड़ कर अपने पास बैठाकर बड़े प्यार से बोली, “बेटा ऐसी बात नहीं है | तू तो जानता ही है कि वह कितनी कामचोर थी | वह काम कम और बात ज्यादा करती थी बस इसलिए काम के समय उसका फोन ले लेती थी |”

“उसका फोन है कहाँ ?”

“उसके कमरे में ही होगा ?”

विनीत झट से उठा और कमरे में रजनी का फोन रखा देख अभी कुछ संतुष्ट हुआ ही था कि उसके फोन की घंटी बज उठी | उसने फोन उठाकर पूछा, “हैलो कौन है ?”

“मैं रजनी का पापा |”

“क्या रजनी घर सकुशल पहुँच गई है ?”

“तुम तो ऐसे पूछ रहे हो जैसे तुम्हें रजनी की बहुत चिंता है |”

“हमें तो उसकी बहुत चिंता है परन्तु उसने अच्छा नहीं किया |”

“हमें का मतलब ?”

“मतलब घर के सभी सदस्यों को |”

“तुम सब ने मिलकर मेरी लड़की पर जुल्म के अलावा कुछ नहीं किया |”

“ये सब बेकार की बाते हैं |”

“तुम्हें पता भी है कि पति पत्नी का रिस्ता क्या हो़ता है ?”

“आप कैसी बातें कर रहे हैं ?”

“मैं ठीक कह रहा हूँ | रजनी को तुम लोगों ने महज एक नौकरानी समझा, हमेशा जेल में रहने वाले एक मुजरिम का दर्जा दिया जिसको बाहर के किसी भी व्यक्ति से मिलने की इजाजत नहीं होती | उसका फोन भी छीनकर रख लिया जाता है | जानते हो रजनी की यह दयनीय हालत हमें उसके फोन से पता चली जो चोरी छुपे उसने पब्लिक बूथ से किया था |”

“क्या ! पब्लिक बूथ से किया था ?”

“हाँ जी |”

“ऐसा नहीं हो सकता |”

“तुम्हारी आँखों पर ममता की पट्टी बंधी हुई है | तुम्हें अपनी माँ के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता |”   

“मैं तो रजनी से हमेशा पूछता रहता था कि कहीं उसे किसी प्रकार की तकलीफ तो नहीं है परन्तु उसने कभी कुछ बताया ही नहीं |”

“बताने से क्या फ़ायदा था क्योंकि उसकी बातों को कभी किसी ने कोई तवज्जो ही नहीं दी | बल्कि तुम सबने मिलकर हमेशा उसी की गल्ती निकाली | आदमी कितना झुक सकता है | कितना सह सकता है | जब पानी सिर से गुजरने लगता है तो हाथ पैर मारने ही पड़ते हैं | वही रजनी ने किया और इसमें कोई गल्ती नहीं है |”

“अपनी सास को चांटा मारने को आप गल्ती नहीं मानते ?”

“मानता था परन्तु अब नहीं क्योंकि ऐसे परिवेश में रजनी ने सही किया है |”

“कैसा परिवेश ?”

“ज्यादा भोले मत बनो | तुम्हारी मम्मी जी ने रजनी को कभी अपनी बहू समझा ही नहीं | वह तो उसके साथ नौकरानी जैसा व्यवहार करती थी | क्या तुम्हें पता है कि गाली गलौच करना, ताने देना, यहाँ तक की बिना कसूर के झापट रसीद करना उनकी आ़दत बन गई थी |”

विनीत आश्चर्य से जैसे सोकर उठा हो, “आप यह कैसे कैसे इलजाम लगा रहे हो ?”

“मैं इल्जाम नहीं हकीकत बयाँ कर रहा हूँ |”

विनीत अपना सिर पकड़ कर बैठ गया | उसे यह तो आभाष था कि घर का वातावरण कुछ सौहार्द पूर्ण नहीं रहता परन्तु उसने कभी सोचा भी न था कि उसके चार प्राणियों के घर में ऐसी कटुता पूर्ण माहौल बन गया था | उसकी तंद्रा रजनी के पिता जी की आवाज ने तोड़ी, “अब मेरी बेटी वहाँ नहीं आएगी | वह तुम्हारे सभी के ऊपर एक केस दायर करने जा रही है | अब अपनी करनी का फल भुगतना |” इतना कहकर फोन कट गया |

विनीत थोड़ी देर किंकर्तव्यमूढ़ बैठा रहा फिर एक झटके से अपनी मम्मी के सामने खड़ा होकर उसे घूरने लगा | आज पहली बार अपने बेटे की गुस्से से भरी लाल आँखों को देखकर किसी अनहोनी ने उसे कंपा दिया | थोड़ी देर माँ बेटे के बीच घूरना और असमंजसता से देखना जारी रहा | दोनों के मुहँ पर जैसे ताला लग गया था | शायद दोनों सोच रहे थे कि सामने वाला पहले अपना ताला खोले | आखिर विनीत के सब्र का बाँध समाप्त हो गया और उसने अपना मुहँ खोला, “मम्मी जी क्या यह सही है कि आपने रजनी को थप्पड़ मारा था ?”

विनीत के अचानक किए गए प्रशन से पुष्पांजलि का पूरा शरीर काँप गया और उसके चेहरे पर पसीने की बूंदे उभर आई | वह मिमयायी, “बेटा वो.. वो मेरी कुछ सुनती ही नहीं थी | एक दिन गुस्से में मेरा हाथ उठ गया था |”

अपनी मम्मी की बात सुनकर विनीत बेचैन हो उठा | वह बेबस शेर की तरह इधर उधर चक्कर काटने लगा | उसकी समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे | वह बुदबुदाया, “ताऊ जी ने ठीक ही कहा था |”

उसका बुदबुदाना सुनकर पुष्पांजलि ने पूछा, “तेरे ताऊ जी क्या कह रहे थे ?”

यही कि, “अनुभवी लोग व्यक्ति के हावभाव तथा आखें देखकर ही पहचान लेते हैं कि सामने वाला व्यक्ति कैसा है | इसीलिए बुजुर्गों और युवा पीढ़ी में अंतर होता है | युवा के पास जोश होता है परन्तु होश नहीं होता इसके विपिरीत बुजुर्गों के पास होश होता है जोश नहीं होता | इसीलिए युवा अज्ञानतावश अपनेपन का नाटक करने वाले किसी छली, फरेबी, कपटी या स्वार्थी व्यक्ति के चंगुल में फंस कर अपना विनाश कर लेते हैं | कभी कभी स्वभावत: हमारे अपने भी इसमें लिप्त पाए गए हैं | अत: अपनी गृहस्थी सुचारू रूप से निर्वाह करने के लिए बहुत सावधान रहने की जरूरत है |”

यह सुनकर पुष्पांजलि रोते हुए उठी और विनीत से बोली, “बेटा मैंने ऐसा कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा हो जाएगा |”

“परन्तु मम्मी जी अब ऐसा हो गया है | आपके अहंकार तथा गुस्से ने समाज में आपके साथ हमारी मान, मर्यादा, आदर, सत्कार को समाप्त करने का काम किया है |” और वह फफक फफक कर रो उठा | 

पुष्पांजलि भी विनीत से पीछे न रही | वह भी विलाप करते हुए कहने लगी, “भाई साहब अग्रवाल की नसीहत न मानने का दूसरा फल आज मुझे मिल गया है |”

विनीत आश्चर्य से, “क्या ! ताऊ जी ने आपको भी आगाह किया था ?”

“हाँ बेटा जब मैनें उनका कहा न मान कर अपना मकान दोमंजिला बनवाना शुरू कर दिया था तो उन्होंने मुझ से कहा था कि जब मेरी सामर्थ्य हो तभी बनवा लेना | इसके बाद रजनी के साथ मेरी खटपट के मद्देनजर भी समझाया था कि अपनी इज्जत अपने हाथ होती है | इसको पाने के लिए दबाव या कोशिश करना काम नहीं आती | यह तो सामने वाले के दिल में आपके प्रति खुद उपजनी चाहिए | अपने अहंकार वश मैनें उनकी इस राय पर भी कोई ध्यान नहीं दिया इसलिए मुझे यह दिन देखना पड़ रहा है | और अब जब रजनी के पिता जी ने धमकी दी है तो ऐसा लगता है कि अग्रवाल जी की तीसरी भविष्य वाणी भी कारगर सिद्ध हो जाएगी |”

विनीत जो अपनी मम्मी की बातें ध्यान से सुन रहा था ने पूछा, “आप किस भविष्य वाणी की बात कर रही हो ?”

मैनें ॠण लेकर जब मकान दोमंजिला करना शुरू किया था तो मेरा रवैया तथा हावभाव देखकर उन्होंने चेतावनी सी देते हुए कहा था, “पुष्पांजलि कोई भी कर्म करने से पहले इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि ‘अहंकार में तीन गए धन, वैभव और वंश’| आज मैं धन और वैभव मतलब आदर सत्कार तो गवां चुकी हूँ तथा वंश मिटने के कगार पर है | वास्तव में ही अहंकार मनुष्य को विनाश के रास्ते पर अग्रसर कर देता है |”

इसके बाद माँ-बेटा आपस में गले लग कर न जाने कितनी देर तक मातम मनाते रहे | थोड़े दिनों बाद कोर्ट से आए नोटिस ने यह बात साफ़ कर दी कि विनीत जीवन भर एक बाप बनने से वचिंत रह जाएगा अर्थात पुष्पांजलि के वंश का अंत क्योंकि रजनी के अनुसार लिखा था कि न तो वह तलाक लेगी तथा न ही अपने ससुराल आएगी परन्तु वह विनीत से जीवन भर केवल अपने भरण पोषण का खर्चा लेगी |