Monday, September 25, 2023

उपन्यास - भगवती (5)

 

राकेश के घर में आज खुशी का माहौल था | घर में राकेश के परिवार के सदस्यों के साथ राकेश का दामाद और राकेश की लड़की भी मौजूद थी | थोड़ी देर पहले ही वे प्रभात का रिश्ता पक्का करके लौटे थे | बैठते ही लड़की किस को कैसी लगी तथा आगे के क्या कार्यक्रम होगें पर वार्तालाप शुरू हो गया |

संतोष:-लड़की तो सुन्दर है |

प्रतिभा:-हाँ नयन नक्श के साथ रंग भी गोरा है |

मुकेश:-प्रभात के हिसाब से पढ़ी लिखी भी ठीक ही है |

राकेश ने अपना मत प्रकट किया, “वैसे तो आप लोगों की बातें सही हैं परन्तु लड़की की चाल एवं बोल पर भी किसी ने ध्यान दिया या नहीं ?”

संतोष:-चाल ढाल और बोली में अगर कुछ फर्क है भी तो वह हमारे यहाँ रहने से अपने आप सुधर जाएगा |

मुकेश ने इस बार कटाक्ष करते हुए पूछा, “पापा जी दस में से आप कितने नंबर देते हो ?”

राकेश मुकेश जी के कटाक्ष को समझ कर हँसे बिना न रह सका | राकेश की इस हंसी में मुकेश को तो सम्मिलित होना ही था परन्तु और सब हमें हंसते देख भौचक्के से रह गए | शायद वे मुकेश जी के इस कटाक्ष के कारण से अनजान थे | हुआ यूं था कि राकेश की लड़की प्रतिभा की देखा दिखाई में उनकी ना-नुक्कड़ को भांपकर राकेश के बड़े भाई साहब जी ने भी मुकेश जी से यही प्रश्न पूछकर उन्हे निरूत्तर कर दिया था | फिर भी राकेश ने जवाब दिया, “मुकेश जी आपने यह प्रश्न पूछने में बहुत देरी कर दी |”

मुकेश जी राकेश की पत्नी संतोष की तरफ देखकर बोले, “अब तो हाँ हो ही गई है | अब आगे का सोचो की शादी कब की रखनी है |”

संतोष राकेश की और निहार कर बोली, “इसके बारे में तो ये ही जानें |”

मुकेश:-पिताजी शादी के लिए पंडित जी से दो तीन तिथियाँ निकलवा लेना | उनमें से जो हमें ठीक रहेगी उसे पक्का कर लेंगे |”

राकेश ने सोच विचार कर पूछा, “तारीखें तो निकलवा लूंगा परन्तु पहले इस बात का फैसला तो कर लो कि बिरादरी के लोगों को लग्न पर दावत देनी है या रिस्पशन का प्रोग्राम रखना है |”

“बिलकुल यह तो पहले तय करना पडेगा,”प्रतिभा ने अपनी राय दी |

पंकज:-रिस्पशन का प्रोग्राम तो बहुत बेकार तथा उबाऊ लगता है | क्योकि दुल्हा दुल्हन को घंटो मूर्ति बनकर बैठना पड़ता है ऊपर से उठक बैठक अलग करनी पड़ती है |

संतोष ने चुटकी ली, “बेबी (प्रतिभा) जब पंकज की शादी हो तो इस बात को ध्यान में रखना कि इसकी शादी होने पर लग्न पर ही दावत देनी है |”

“मम्मी जी आपने बिलकुल ठीक फरमाया है | पंकज ने अपनी इच्छा पहले ही जाहिर कर दी है | इसकी शादी पर हमें ध्यान रखना होगा कि लग्न ही हो रिस्पशन नहीं |”

सब जोर से ठहाका लगाकर हंसते हैं और पंकज कुछ झेंप जाता है | इसके बाद मुकेश जी ने कहा, “पिता जी, अब हमारे पास समय कम है और काम ज्यादा | क्योंकि शादी के साए केवल २९ फरवरी तक ही हैं | अत: जितना जल्दी हो सके आप पंडित जी से शादी की तिथियाँ सुजवा लाओ | जिससे हम आगे के प्रोग्राम बना सकें |”

राकेश घड़ी देखकर बोला, “ठीक है अब तो देर हो गई हैराकेश सुबह ही पंडित जी से मिल लूंगा |”

संतोष:-पहले सामने वाले इस मौहल्ले के मंदिर के पंडित जी से सुजवा लेना |”

“राकेश सामने वाले मंदिर तथा बुधराम पंडित जी से पूछ आऊँगा तुम(संतोष) कृष्ण मंदिर में पूछ आना |”

संतोष:-ठीक है |

मुकेश:-सभी काम फ़टाफ़ट करने होंगे क्योंकि समय कम है | चीज-बस्त, कपड़े-लत्ते, कार्ड, खाना-पीना, बैंड-बाजा  इत्यादि बहुत सी वस्तुओं का इंतजाम करने में दिन यूं ही निकल जाएंगे पता भी नहीं चलेगा कि कब तय तिथि आ धमकी |

राकेश ने याद कराया, “हाँ कार्ड का मजबून भी तो बनाना होगा |

मुकेश:-कार्ड के तीन चार मजबून बनाकरराकेश आपको दिखा दूंगा | जो सभी को पसंद आएगा वह छपवा लेंगे |

राकेश ने हामी भरते बातों को विराम देने के लिए कहा, “अब रात काफी हो गई है | सब सो जाओ | बाकी बातें सुबह करेंगे |

मुकेश:-पिता जी अब सोने से काम नहीं चलेगा | अब तो हमारे पास केवल्र रात ही है विचार विमर्श करने के लिए क्योंकि दिन में तो हमें बाजार का काम निपटाने से ही फुर्सत नहीं मिलेगी |

राकेश ने अपना पक्ष रखा, “देखो जी ‘साफ़ कहना सुखी रहना’ आप लोग जो ठीक समझो उतनी देर तक जागो | मुझे तो सुबह बता दिया करना कि दिन भर का क्या प्रोग्राम बनाया हैराकेश उसी अनुसार चला करूँगा | परन्तु मैं  समय पर सो जाना चाहता हूँ |”

 

 

Saturday, September 23, 2023

उपन्यास - भगवती (4)

 

1990 के दशक की बात है | राकेश के बड़े लड़के प्रभात के रिश्ते आने शुरू हो गए थे |  समय लोगों की जीवन शैली में बड़ी तेजी से परिवर्तन ला रहा था | बेरोजगारी चरम सीमा पर थी | पढ़े लिखे नौजवान हाथों में डिग्रियां लिए नौकरी की तलाश में इधर उधर भटकते रहने पर मजबूर थे | प्राईवेट नौकरियों न तो थी और अगर थी भी तो उसे कोइ करना नहीं चाहता था | सरकारी नौकरी थी नहीं और अगर थोड़ी बहुत होती भी थी तो अपनी किस्मत आजमाने उसके लिए लाखों की तादाद में लोग आ जाते थे | ऐसे में प्रभात को जिसने अभी अभी बी.कोम पास किया था भाग्यवश सरकारी नौकरी पा गया | इसकी गूँज हवा की तरह हमारे सभी रिश्तेदारों में फ़ैल गयी | यही कारण था की उसके रिश्तों की एकदम बाढ़ सी आ गई | राकेश की पत्नी संतोष वैसे तो किसी भी बातचीत में सामने नहीं आती थी परन्तु छिपकर रिश्ता लेकर आने वालों की हर गतिविधि पर नजर रखती थी | जब कई आने वाले एक दो बार आ चुके तो संतोष ने अपने मन की इच्छा जाहिर करते हुए कहा, "देखो जी रिश्ता ऐसा लेना जिसका व्यवहार शराफत से भरा हो |"

"शराफत से भरे से तुम्हारा क्या मतलब है ?"

"यही कि भोला भाला हो |"

अपने चहरे पर मुस्कान बखेरते हुए राकेश ने पूछा, "मेरे जैसा भोला ?"

संतोष तुनक कर, "अजी हाँ राम भजो, आप अपने को शरीफ समझते हो ?"

"तो क्या नहीं हूँ ?"

संतोष राकेश से थोड़ा दूर हटकर, "आप तो एक नम्बर के छटे........|" और वह खिलखिलाकर हंस पड़ी |

"रूक क्यों गई पूरा कह दो |"

"जब आप समझ ही गए हो तो पूरा कहना न कहना एक ही बराबर है |" खैर, संतोष ने मुस्कराते हुए कहा, "अब तक तो आपने अंदाजा लगा ही लिया होगा कि किससे बात आगे बढानी है |"

"तुम्हारा क्या विचार है ?"

"मुझे तो वह, जो नजफ़गढ़ से आए थे काफी भोले भाले और शरीफ नजर आ रहे थे |"

"नजफ़गढ़ से तो दो तीन आ चुके हैं |"

"वही जो अपने को जीजा जी श्याम कुमार जी का भाई बता रहे थे |"

राकेश ने अपनी दुविधा बताई," वे भोले एवं शरीफ तो लग रहे थे परन्तु महा कंजूस और छिपे रूस्तम भी जान पड़ रहे थे |"

“वे तो छिपे रूस्तम होंगे परन्तु आप से नीचे नीचे |”

“अच्छा जी |”

संतोष हंसकर, "और क्या | वैसे यह बताओ कि आप ने कैसे जान लिया कि वे कंजूस हैं ?"

"उनके पहनावे से |"

"ऐसा आपने उनके पहनावे में क्या देख लिया ?"

"उनके कपडे तो साफ़ सुथरे थे परन्तु फटी हालत में थे | उनकी पहनी हुई जुराबें भी नीचे से फटी हुई थी |"

"हमें उनकी कंजूसी से क्या लेना देना हमें तो बस लड़की अच्छी मिलनी चाहिए |"

"मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ परन्तु दूसरे के यहाँ जाते समय कुछ तो मर्यादा रखनी चाहिए |"

"पुराने जमाने के लोग ऐसे ही हुआ करते हैं | देखना इनके बच्चों में आपको यह कमी नजर नहीं आएगी |"

"मैं भी तो इनके जमाने का हूँ |"

"हम तो हमेशा बाहर रहे हैं तथा देखा है कि थोड़े में भी सुखमय जीवन कैसे जीते हैं | ये तो बेचारे हमेशा उसी नून तेल लकड़ी में ही लगे रहे |"

"साफ़ क्यों नहीं कहती कि बेचारे शरीफ समधी पसंद आ गए हैं |"

संतोष एकदम हाथ नचाकर बोली, "नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है | मैं कुछ नहीं जानती | मैंने तो बस अपनी राय बताई है | पक्की तो आप अपनी समझ से करोगे |"

नवरात्रों के शुभ दिन थे | आनन फानन में अच्छा दिन देखकर लड़के लड़की की देखा दिखाई का समय और  स्थान निश्चित कर लिया गया  | संवाद शुरू करते हुए राकेश की लड़की ने अपनी होने वाली भाभी  से पूछा, “आपका नाम क्या है ?”

छोटा सा जवाब तथा बड़ी महीन आवाज उभरी, “चाँदनी|”

“कितनी पढ़ी हो ?”

“बारहवीं |”

“पास या फेल ?”

इस बार वार्तालाप कर रहे दोनों सदस्यों के चेहरों पर मुस्कान फ़ैल गई और जवाब मिला, “पास |”

चाँदनी कद  काठी, लम्बाई, स्वास्थ, रंग, रूप, बोलचाल तथा उठने, बैठने तथा चलने में बिल्कुल ठीक थी | राकेश की लड़की प्रतिभा को चाँदनी अपने भाई के लिए हर मायने में अनुकूल लगी तो उसने  अपनी मम्मी की तरफ मुखातिब होकर अपना निर्णय सुनाया, “मम्मी जी, मेरे विचार से चाँदनी पास है |” 

प्रतिभा की बात सुनकर चाँदनी के पक्ष वालों के चेहरे गुलाब की तरह एक दम खिल उठे | परन्तु वर् पक्ष की तरफ से पक्की हाँ होने के इंतज़ार से उनके चेहरों पर असमंजसता की लकीरें साफ़ दिखाई दे रही थी | इस बीच श्याम कुमार ने अपना मत रखा, “एक बार लड़के लड़की से भी तो पूछ लो कि उनको यह आपसी रिस्ता पसंद है ?”

उन दोनों को भेजने से पहले राकेश ने जब संतोष की तरफ उसकी मर्जी जानने के लिए देखा तो जवाब मिला, “शुभ दिन  हैं | नवरात्रों में भगवती का घर में आगमन हो रहा है और इससे अच्छा क्या होगा ?”

उनकी बात मानते हुए प्रभा के साथ दोनों को आपसी सहमती के लिए पार्क में टहलने के लिए भेज दिया गया | उनकी रजामंदी के बाद  घर के सभी सदस्यों ने एकमत होकर  रिस्ता पक्का कर दिया  |