Wednesday, June 11, 2025

मस्तानी -28

 

धैर्य परिक्षा

मदन के चाचा, अर्जुन के यहाँ से वापिस आकर अपने को बातचीत में व्यवधान डालने का कसूरवार मानते हुए नाना जी ने सभी के सामने कहा, “शायद मेरी वजह से आपसी मनमुटाव सुलझ न सका |”

पूजा:- पापा जी आप ऐसा क्यों सोच रहे हो | आपने, क्या हम में से किसी ने भी कोई गलत बात नहीं कही | वे तो अपने झूठे फैलाए जाल में खुद ही फंसते चले गए |

मोहन:- पापा जी आप अपने मन में किसी प्रकार की कोई गिलानी महसूस न करें | आप ने जिस प्रकार गर्मी दिखाकर मदन की चाची का मुंह बंद करने का प्रयास किया था वह बहुत जरूरी था |

मस्तानी:- ‘सांच को आंच नहीं’ जब चाची के नापाक इरादे धूल फांकने लगे तो वह तिलमिला गई | आपने बिलकुल सही किया अन्यथा वह तो सिर पर चढ़ जाती |

मोहन :- पापा जी अब उनको पता चल गया है कि हम उनकी बन्दर की सी घुड़कियों से डरने वाले नहीं है | आप देखना, अब उनकी तरफ से ही सुलह मशवरा का प्रस्ताव आएगा |

पूजा, मस्तानी तथा मोहन जी के आश्वासन से नाना जी को बहुत राहत मिली परन्तु फिर भी उनके दिल के एक कौने में मस्तानी के भविष्य को लेकर चिंता ने घर बना ही लिया था |

पता चला कि मदन की नानी जी बहुत बीमार हैं तो नाना जी ने वहां  के हालात जानने तथा चतर के यहाँ मीटिंग का हाल बताने हेतु मदन के मामा जी को फोन मिलाया, “नमस्ते जी | आपको सूचना मिल गयी होगी कि हम अर्जुन जी के यहाँ हो आए थे |”

हाँ जी, हाँ जी |

हमने आपको बुलाने की भी कही थी परन्तु न वहां आप थे न मदन जी की मम्मीजी |

फिर कौन -कौन थे ?

मदन के पापा जी, फूफा जी, मौसा जी, चतर जी, उनकी पत्नी त्तथा मदन जी |

मामा असमंजस से,”मदन के मौसा जी?” ठहरो मैं अभी आपको फोन करता हूँ |

थोड़ी देर बाद मामा जी बताते हैं कि मदन के मौसा जी तो थे नहीं |

हमें तो यही बताया गया था | खैर छोडो, आपकी मम्मी जी का स्वास्थ्य कैसा है ?

मामा जी ने अपनी मम्मी जी के बारे में बताने की बजाय केवल इतना ही कहा कि मैं आपको बाद में फोन करता हूँ और सम्बन्ध विच्छेद कर दिया |

उनके व्यवहार से नाना जी ने समझ लिया कि दाल में जरूर कुछ काला है  परन्तु क्या वे इस समय कुछ अंदाजा न लगा सके |

तीन –चार दिनों बाद मस्तानी, मदन की नानी जी से मिलने अस्पताल गई तो वहां आए सभी व्यक्तियों ने नानी जी का ख्याल छोड़ मस्तानी पर सवालों की झड़ी लगा दी | इसी तरह जब मस्तानी नानी जी के स्वर्गवास पर उनके घर गयी तब भी वही हाल रहा | सारांश रहा कि सभी के जवाब संतुष्टि के साथ देकर उसने यह दर्शा दिया कि वह मदन की तरह तलाक देने में विश्वास नहीं रखती | इसी दौरान यह भी महसूस किया गया कि मदन के मामा जी भी कान के कच्चे तथा बिना असलियत जाने भांजे की बातों की हिमायत लेने वाले हैं | अर्थात एक ही थैली के चट्टे-बट्टे | क्योंकि शायद अर्जुन के यहां हुई बातचीत उनके  सामने झूठी तथा गलत ढंग से प्रस्तुत की गयी थी | यही कारण रहा होगा कि उन्होंने नानाजी के खिलाफ “टैटू” दबाने जैसे शब्द का प्रयोग कर दिया था | इसी से अंदाजा लगाया गया कि मामा जी ने नाना जी से बात करने में क्यों रूखापन दिखाया था |   

आज की इस भागदौड़ वाले जीवन में हर व्यक्ति जल्दी से जल्दी सफल होना चाहता है आजकल किसी को भी धैर्य नहीं हैं जिस प्रकार कोई बीज सबसे पहले पौधा बनता है उसके कुछ सालों बाद वह फल देने लायक बनता है उसी प्रकार कामयाबी को प्राप्त करने में समय जरूर लगता है। परन्तु हम कई बार सब्र, धैर्य खो देते हैं जिससे फिर कार्य का सफल होना असंभव हो जाता है।

जीवन मे किसी भी क्षेत्र में कामयाबी प्राप्त करने के लिए सब्र, धैर्य का होना बहुत जरूरी है बिना धैर्य वाला व्यक्ति हमेशा कमजोर होता है स्टॉक मार्केट क्रियाशील से सहनशील के पास पैसे स्थानांतरित करने की क्रिया है। अर्थात जो कर्मपथ पर धैर्य से कार्य करते हैं सफलता उनके कदम चूमती है।

मोहन स्टाक मार्केट के पक्के खिलाड़ी हैं | शायद यही कारण रहा होगा की उनमें धैर्य कूट-कूट कर भरा है | मस्तानी की ससुराल वालों से इतनी कहा सुनी हो गई थी परन्तु उनके चहरे पर एक शिकन भी नहीं दिखाई दी | हालांकि उनकी पत्नी पूजा ने तो एक बार पूछा भी कि ‘अब क्या होगा ?’ मोहन जैसे बिलकुल आश्वस्त थे, शांत स्वभाव बोले, “होना क्या है वही होगा जो मंजूरे खुदा होगा |” और जोर से हंस दिए |

धैर्य कड़वा है, लेकिन इसका फल मीठा है। धैर्य प्रतीक्षा करने की क्षमता नहीं है, बल्कि प्रतीक्षा करते समय एक अच्छा रवैया रखने की क्षमता है। जैसे स्वर्ण आग में चमकता है उसी प्रकार धैर्यवान कठिनाई में दमकता है क्योंकि धैर्य, मन की शक्तियों का मूल है।

धीरे- धीरे मोहन ने पूजा तथा मस्तानी को भी अपने रंग में रंग लिया | कहा भी गया है कि भाग्य से ज्यादा और समय से पहले कभी कुछ नहीं मिलता इसलिए सब्र करना सीखिए और बाकी सब वक्त पर छोड़ दीजिए यकीन मानिए वक्त खुद जवाब देगा । कहा भी गया है कि दस वर्ष बाद तो कूडी के दिन भी बदलते हैं |

समय ने करवट ली | मदन के मौसा जी, मौसी जी और मामा जी मस्तानी के मन की बात जानने मोहन के घर आ पहुंचे | सभी बातों की असलियत जानकार वे भी आश्वस्त हो गए कि मस्तानी या उसके परिवार वालों की तरफ से ऐसी कोइ बात नहीं कही गयी जो रिश्ते में कडवाहट पैदा करने का सबब बनती हो | इसलिए सब ठीक ही होगा का आश्वाशन देकर वे विदा हो गए |

कहा नहीं जा सकता कि मौसा जी वगैरह ने मदन या उसके घर वालों से इस बाबत कुछ बातें की या नहीं अगर की भी होंगी तो अहंकार से लबरेज अपने को एक बहुत बड़ा ज्ञानी, रावण के परिवार की तरह , समझने वाले ने उन्हें ग्रहण भी किया होगा यह विशवास भी नहीं किया जा सकता |

समय ने एक बार फिर करवट ली और लगभग दो महीने बाद मदन ने मस्तानी को फोन किया, “मैं मिलना चाहता हूँ |” और दोनों का आपस में फोन पर बातचीत करने तथा मिलने का सिलसिला शुरू हो गया | फिर भी जाट भाषा में उनके लिए यह कहावत सटीक बैठती है कि “जाट मरा तब जानिए जब उसकी कब्र पर घास उग आए “| अर्थात अहंकार का नाश | कहने का तात्पर्य यह है कि मस्तानी को लिवा ले  जाने की बात तो मदन द्वारा कबूल ली गयी है परन्तु छह महीनो से हर बार एक-एक महीना आगे बढाया जा रहा है फिर भी धैर्य के साथ घास उगने का अर्थात अहंकार के दमन का इंतज़ार किया जा रहा है |  

 

Sunday, June 8, 2025

मस्तानी - 27

 

चांडाल चौकड़ी (27)

जैसा कि नाना जी ने अंदाजा लगाया था एक दिन मदन के चाचा अर्जुन का फोन आया, “नमस्ते जी” |

कौन?

मैं मदन का चाचा बोल रहा हूँ |

राम-राम जी, कहिये कैसे याद किया |

बच्चों के बारे में ही बात करनी थी |

बहुत अच्छे तथा शुभ विचार हैं |

मस्तानी को  गए 18 महीने से ज्यादा हो गए है | इस बीच मदन और उसके बीच कोइ बात चीत नहीं हुई |

शायद आपको मालूम  नहीं कि मस्तानी ने हर टेहले यहाँ तक कि जन्म दिन इत्यादि पर भी सन्देश भेजे हैं |

परन्तु उनके घर वालों की तरफ से तो कभी कोइ संदेशा नहीं आया |

इसके लिए भी मैं आपको जता दूं कि जितनी बार भी मेरे से मदन जी की बात हुई है मैंने हर बार उनसे कहा था कि आओ और मस्तानी को लिवा ले जाओ |

जिस घर में मेहमानों की पिटाई हो भला वहां जाने की कौन हिम्मत कर सकता है |

क्या मतलब ?

क्या आपको नहीं पता कि मदन के साथ उसकी ससुराल में क्या सलूक किया गया था | उसकी वहां पिटाई की गई  थी |

आपको किसने कहा ?

खुद मदन ने |

और आपने मान लिया | एक तरफ की बात सुनकर सच्चाई नहीं जानी जा सकती |

मदन एक हीरा लड़का है | उस जैसा लड़का मिलना मुस्किल है |

अर्जुन जी, सभी को अपना बच्चा ऐसे ही दिखाई देता है |

मैं तो मोहन को बहुत अक्लमंद मानता था तथा उनकी बातों से काफी प्रभावित भी था परन्तु अब उनका व्यवहार भी दिखावा सा ही नजर आता है |

अर्जुन जी, आप जो बात कर रहे हैं वह केवल एक तरफ से सुनी बातों से प्रभावित होकर कर रहे हैं |

खैर ?

खैर की कोई बात नहीं है, मैं तो आप से भी कहता हूँ कि मदन जी को भेज दो मस्तानी को लिवा ले जाएंगे |

डेढ़ साल हो गए हैं उसे आना होता तो वह अब तक आ चुकी होती | अब उनके एक साथ रहने का कोइ औचित्य नहीं रह गया है |

माफ़ करना, इस बारे में क्या कभी आप की तरफ से इस दौरान कोई विचार आया | मैनें तो आपके पिता जी का नंबर भी मांगा था परन्तु कह दिया गया कि उनसे कोइ बात नहीं करनी | ऐसा लगता है आपके यहाँ बुजुर्गों को कोइ महत्त्व नहीं दिया जाता |  

अरे आप समझते नहीं | उनकी याददास्त बहुत कमजोर है | कभी कभी तो वे मेरा नाम तक भूल जाते हैं फिर भला उनसे क्या बात करनी |

अर्जुन के बोलने के लहजे से ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि उसे अपने बुजुर्गों का सम्मान करने का कितना कायदा है क्योंकि उसने अभी तक नाना जी को भी मौसा जी शब्द से एक बार भी संबोधित नहीं किया था | यही नहीं अर्जुन ने सम्बोधन करते हुए मोहन के नाम के बाद भी जी नहीं लगाया था | उनके कथन से साफ़ जाहिर हो रहा था कि वे मदन को सुलह करने की बजाय मस्तानी से सम्बन्ध विच्छेद करने को प्रोत्साहन दे रहे होंगे | फिर भी नाना जी ने पूछा, “अब आप क्या चाहते हैं ?

यही कि एक मीटिंग कर ली जाए |

ठीक है बताओ कब करनी है |

बातचीत के बाद तय हुआ कि मीटिंग अर्जुन के घर पर 19 नवम्बर 2021 को शाम दो बजे होगी | मस्तानी अपने माता-पिता, नाना जी, दोनों मामा जी,तथा बड़ी मामी के साथ तय समय पर तय स्थान पर पहुँच गए | मदन की तरफ से उनके पिता जी, एक फूफा, चाचा-चाची तथा एक दूर के मौसा जी ही थे | हमारे कहने के बावजूद मदन ने अपने मामा जी तथा मम्मी जी को नहीं बुलाया था |  

बात शुरू करते हुए करते हुए नाना जी ने कहा, “सभी सज्जन इस बात का ध्यान रखें कि उनकी बात में किसी प्रकार की अपने की हिमायत के सुर नहीं होने चाहिए अर्थात किसी को भी किसी भी सदस्य का बिना सत्य बात जानें पक्ष नहीं लेना होगा “|

मौसा- बिलकुल ठीक कथन है |

नाना जी- मैंने यह इस लिए कहा है क्योंकि मेरी तथा अर्जुन जी की बात के दौरान उन्होंने मदन जी तथा मोहन जी के बारे में कुछ ऐसा ही दर्शाया था | अगर आप उचित समझो तो मैं वह बातें दोहराऊँ ?

मौसा :-नहीं –नहीं कहने वाले को पता है कि उसने क्या कहा था |

मौसा जी के इस कथन से नाना जी को ऐसा लगा जैसे मौसा खुद भी उनके पक्ष में ही हैं | और उनके बात शुरू करने के लहजे से जब उन्होंने कहा, “देखो जी अठारह महीने से मदन तथा मस्तानी अलग रह रहे हैं तथा उनके बीच कोइ बातचीत भी नहीं हुई तो अब उनके साथ रहने का तो कोइ औचित्य नहीं बनता | तो बताओ अब आगे क्या करना है उनके मौसा जी की विचार धारा को साबित कर दिया था |

नाना जी:- आपने तथ्यों को जाने बिना यह कैसे मान लिया कि ये दोनों एक साथ नहीं रहना चाहते ?

मौसा :-मदन तथा इनके घर वालों ने तो यही बयाँ दिया है |

नाना जी:- अगर आप फैसला करने बैठे हैं तो पहले पूरी स्थिति को अच्छी तरह समझिए फिर अपना मत दीजिए | आप बिना कुछ समझे जाने ऐसा कैसे कह सकते हैं कि इनके साथ रहने का कोइ औचित्य नहीं है | आप भी अर्जुन जी की बातों को दोहरा रहे हैं |

मौसा माफी माँगते हुए बोले, ठीक है आप बताईये कि आपको इस बारे में क्या कहना है |

चंडाल चौकड़ी (27)

नाना जी:- मैं मदन जी के संपर्क में हमेशा रहा हूँ | मैंने जब भी उनसे बात की थी, हर बार मैंने उन्हें आकर मस्तानी को लिवा ले जाने की बात दोहराई थी |  

मौसा:-परन्तु मस्तानी के माता पिता या मस्तानी ने कभी संपर्क करने की कोशिश नहीं की ?

मोहन:- संपर्क कहाँ तथा कैसे करते जब इन सभी ने हमें ब्लाक कर रखा था |

मस्तानी : क्या मैं कुछ कह सकती हूँ ?

मौसा : हाँ, हाँ कहो क्या कहना है |

जब से मैं मामा जी के कहने से अपने पीहर गयी हूँ  ऐसा कोइ त्यौहार नहीं गया जब मैनें सभी को शुभ कामनाओं का सन्देश न भेजा हो | यही नहीं घर के सभी सदस्यों के जन्मदिन पर भी मैं सुभकामनाओं का सन्देश भेजना भी नहीं भूली | परन्तु किसी ने कभी भी मुझे उत्तर देने का प्रयास नहीं किया | क्या केवल मेरा ही यह फर्ज बनता है और किसी का नहीं | पापा जी की बीमारी की बात सुनकर मैं अपने पापा जी के साथ अस्पताल में मिलने गई परन्तु वहां हमें कोइ नहीं मिला | फोन किया तो किसी ने उठाया नहीं | अब आप मुझे बताएं कि मेरी कहाँ गलती रही | तथा जैसा आप कह रहे हैं कहाँ रिश्ता तोड़ने की कोशिश की |

मौसा : मुझे ये बातें पता नहीं हैं |  इससे तो मालूम पड़ता है कि आपने निभाने की पूरी कोशिश की |

नाना जी : आपको तो बहुत सी बातें बताई ही नहीं गई होंगी |

मौसा: मसलन?

नाना जी: मस्तानी के पहनावे पर इनकी रूढ़िवादी सोच | जब मदन जी हनीमून पर गए तो मस्तानी को टी-शर्ट तथा शोर्ट पहना दी परन्तु घर पर उसे सलवार जम्फर पहनने पर भी रोक थी |

मदन : मैंने मस्तानी को कहा था कि कुछ दिनो बाद सब चालू हो जाएगा |

नाना जी : मतलब रोक थी | अब आप ही बताओ कि बच्चे का सलवार जम्फर पहनने में किस प्रकार का पारिवारिक उल्लंघन होता है |  यही नहीं घर की बहु को उसकी नन्द की शादी में भी शरीक नहीं किया गया |

मदन: वह तो मस्तानी ने अलग होते समय कहा था कि अब मैं इस घर में कदम नहीं रखूँगी |

मौसा: यह बात  तो कुछ जंची नहीं | चाहे जितना भी मन मुटाव हो  नन्द की शादी पर भाभी का होना तो जरूर बनता है |

अर्जुन : भाभी अगर नन्द को बिना वजह पीट दे तब क्या होना चाहिए ?

नाना जी : ऐसा कोइ पागल ही होगा जो बिना वजह किसी को पीट दे | हाँ अगर किसी के ऐसे कर्म से जिससे परिवार का नाम बदनाम हो तो सबक सिखाने के लिए हाथ उठाना जायज कहलाएगा |

मस्तानी: मैनें नन्द पर हाथ नहीं उठाया था केवल उसकी ठोड़ी पर हाथ लगा कर यह कहा था कि आपने ऐसा क्यों किया | बल्कि एक दिन मैंने देखा था कि इन्होने (मदन)  उसे एक चपत लगाई थी |

फूफा :- मैंने कहा था कि ६ महीने के लिए इन्हें बिलकुल अकेला छोड़ दो | न मदन अपने घर जाए और न मस्तानी अपने पीहर|

दिनेश: मैंने तो अपने दिल पर पत्थर रख कर इनको अलग कर दिया था |

नाना :- दिखावे के लिए दिल पर पत्थर तो रख लिया था परन्तु बेटे को दो-दो दिनों तक गोद में बैठाकर दूध पिलाना नहीं छोड़ा था |

मदन के कथित मौसा जी की भाव भंगिमा से यह साफ़ जाहिर हो रहा था कि जो कहानियां उन्हें मदन के घर वालों द्वारा बताई गयी थी सब उसके विपरीत सामने आ रहा था | वकील होने के नाते शायद उन्हें मस्तानी के घर वालों की कमियाँ जांच कर केस फाईल करने को कहा गया होगा, तभी तो बात शुरू होने पर ही उन्होंने अपना मत रखा था “देखो जी अठारह महीने से अधिक समय हो गया है इन दोनों को अलग हुए अब इनका एक साथ रहने का कोइ औचित्य नहीं रहा” परन्तु सारी कमियाँ तो मदन के घर वालों की निकली |

घर की असली कलई खुलते भांप मदन की चाची अपना आपा खो बिलबिलाती ,चंडी का रूप धरे बाहर आई, “बहुत देर से मैं आप सब की बदतमीजी सुन रहीं हूँ | ये होती कौन है अपनी नन्द को थप्पड़ मारने वाली |’ 

नाना : यह नन्द की बड़ी भाभी है | वैसे तो मस्तानी ने थप्पड़ मारा नहीं है परन्तु अगर कहीं घर की इज्जत का बचाव करने के लिए छोटे पर हाथ उठा दिया जाए तो वह जायज ही कहलाएगा |

जब नाना ने पाया कि चाची बेवजह चीख-चीख कर माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रही है तो उन्होने भी जोर देकर तथा तेज आवाज में चाची की आवाज दबाने के लिहाज से अपना मत दोहराया | इस पर बैठक की शालीनता, जो अभी तक थोड़ी दिखाई पड रही थी, भंग हो गई | इस दौरान नाना जी के उस मत का भी प्रमाण मिल गया कि मदन के घर का आवा ही पूरा ऐसा था जहां बड़ों को कोंई इज्जत नहीं दी जाती क्योंकि गर्मागर्मी के माहौल में अर्जुन ने भी नाना जी के लिए ‘ओएं’ शब्द का इस्तेमाल किया था |

खैर नाना जी को शांत करके बाहर बैठा दिया गया तथा मोहन सभी अपनों के साथ बाहर आते हुए दृड शब्दों में दो टूक कह आए “मेरी लडकी न तलाक लेगी, न दूसरी शादी करेगी तथा न मैं लड़के को दूसरी शादी करने दूंगा“ जो तुम्हें करना है कर लो | 

इस प्रकार चांडाल चौकड़ी के मंसूबे धरे के धरे रह गए  |

Saturday, May 10, 2025

मस्तानी - भाग 26

 

समझाने की कोशिश (26)

 

      एक दिन फिर समझाने हेतु नाना जी ने लिखा :

          पति-पत्नी

एक बनाया गया रिश्ता, पहले कभी एक दूसरे को देखा भी नहीं था...

अब सारी जिंदगी एक दूसरे के साथ |                      

पहले अपरिचित, फिर धीरे धीरे होता परिचय | धीरे-धीरे होने वाला हृदय स्पर्श,

फिर नोकझोंक, झगड़े, बोलचाल बंद |

कभी जिद, कभी अहम का भाव, फिर धीरे धीरे बनती जाती प्रेम पुष्पों की माला

फिर एकजीवता, दो शरीर एक आत्मा |

जीवन को परिपक्व होने में समय लगता है | धीरे धीरे जीवन में स्वाद और मिठास आती है...

ठीक वैसे ही जैसे अचार जैसे जैसे पुराना होता जाता है, उसका स्वाद बढ़ता जाता है.......

पति पत्नी एक दूसरे को अच्छी प्रकार जानने समझने लगते हैं,

वृक्ष बढ़ता जाता है, बेलें फूटती जातीं हैं, फूल आते हैं, फल आते हैं,

रिश्ता और मजबूत होता जाता है, धीरे-धीरे बिना एक दूसरे के अच्छा ही नहीं लगता |

उम्र बढ़ती  जाती है, दोनों एक दूसरे पर अधिक आश्रित होते जाते हैं, एक दूसरे के बगैर खालीपन महसूस होने लगता है |

फिर धीरे-धीरे मन में एक भय का निर्माण होने लगता है,

"ये चली गईं तो मैं कैसे जिऊँगा", "ये चले गए तो मैं कैसे जीऊँगी"..........??

अपने मन में घुमड़ते इन सवालों के बीच जैसे, खुद का स्वतंत्र अस्तित्व दोनों भूल जाते हैं |

कैसा अनोखा रिश्ता, कौन कहाँ का और एक बनाया गया रिश्ता | "पति-पत्नी"

 सभी शादीशुदा जोड़ो को समर्पित |

अबकी बार जब नाना जी ने मिलने का समय पूछा तो टका सा जवाब मिला कि ‘अभी मेरे पास समय नहीं है , जब होगा तो फोन कर दूंगा | और वह दिन कभी नहीं आया | फिर भी यदा कदा नानाजी मदन को वैवाहिक जीवन के सुखमय राजों से अवगत कराते रहे |

विवाह एक भरोसा है, समर्पण है |

तारीफ उस स्त्री की, जिसने खुद का घर छोड़ दिया

और

धन्य है वो पुरुष, जिसने अंजान स्त्री को, घर सौंप दिया ..........

 Dedicated to all Couples.

अचानक नाना जी को एक दिन पता चला कि मदन ने मस्तानी से पूछा कि तलाक के पेपर किस पते पर भेज दूं | अभी तक नाना जी ने समझ रखा था कि मदन समय के अनुसार समझ कर सुलह तक पहुँच जाएगा | क्योंकि वह नाना जी से हमेशा बात करता रहा था और अपनी ऐसी मर्जी कभी जाहिर नहीं की थी | इसके बाद नाना जी ने मदन को कभी फोन नहीं किया क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि कोइ उसे उसका अपना सगा ही उसका परिवार तोड़ने की घिनौनी साजिस रच रहा है तथा वह पढ़ा लिखा मूर्ख बन रहा है | मदन अपना खुद का पक्का निश्चय लेने में असमर्थ था इसलिय दूसरों की हाथ की कठपुतली बन कर ऐसा व्यवहार कर रहा था | यह भी निश्चित था कि उसकी गृहस्थी को बर्बाद करने की चाहत रखने वाले एक दिन खुद सामने आएँगे और मुंह की खाएंगे | वह व्यक्ति ठोकर लगने के बाद ही संभलेगा | इसी आशय से नाना जी ने मदन को त्यौहारों पर शुभकामनाओं के सन्देश भेजना भी बंद नहीं किया |

Tuesday, April 29, 2025

समझाने की कोशिश -25

 समझाने की कोशिश (25)

राम राम जी |

आपके कहे अनुसार मैंने आपके आपसी मन मुटाव का सारा माजरा जानने की कोशिश की इसमें मैत्री ने तो सहयोग किया परन्तु आपने अपनी प्रतिकिर्या नहीं दी अत: एकतरफा बात सुनकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि आप वर्तमान युग के एक शिक्षित नौजवान होते हुए भी एक कुँए के मेढक की तरह अपने घर की चार दिवारी में रहकर इंसानियत के संस्कार भूलकर रूढ़िवादी विचारों से भी निचले स्तर का व्यवहार करने लगते हैं | उदाहरण के तौर पर:

1.    वैसे तो हनीमून पर आप पत्नी को निक्कर तक पहनाना पसंद करते हो परन्तु घर पर उसको सलवार जम्फर पहनने पर पाबंदी के खिलाफ उसका साथ न देकर चुप्पी साध लेते हो |

2.    अधिकतर बातों में पत्नी को झूठा साबित करने के लिए अपने बाप के सामने उसे मुजरिम की तरह पेश करते हो और ससुर भी सामाजिक मान मर्यादा भूलकर पुत्रवधू से सवाल जवाब करने लगता है |

3.    अपने को बहुत अकल्मन्द तथा जासूस साबित करने के लिए आधी अधूरी बातें टेप करके अपने रिश्तेदारों को बदनाम करने का प्रयत्न करते हो |

4.    घर में पत्नी को पैर की जूती एवं दासी समझ कर उसके हर कदम पर अंकुश लगाते हो तथा उसके हर काम में कमी निकालते हो |

5.    अगर पत्नी घर से, घर के बुजूर्ग से कहकर,10 मिनट के लिए भी बाहर चली जाए तो पूरा कुटुम्ब आपे से बाहर हो जाता है तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के लांछन लगाने लगता है |

6.    पत्नी को यह भी पूछने का हक़ नहीं कि आप तीन दिनों के लिए अचानक कहाँ जा रहे हैं | अगर पूछ लिया तो बखेड़ा खड़ा कर देना और मरने मारने पर उतारू हो थाना कचहरी की नौबत आ जाना |

7.    अपनी पत्नी पर हर प्रकार की शक्की निगाह रखना आपको मिले संस्कारों में शामिल है | माना आदमी दूध का जला छाछ को फूंक-फूंक कर पीता है इसका मतलब यह तो नहीं कि अपने घर के गोरख धंधे को ढांपने के लिए अपनी पत्नी पर भी शक की सुई गडा दी जाए |

8.    जैसा आपका परिवार आपको तथा शादी के बाद पत्नी को भी प्यारा हो जाता है उसी प्रकार आपका दायित्व बनता है कि आप पत्नी के परिवार का भी उतना ही सम्मान करें |

9.    मैं यह नहीं कहता कि सभी दूध के धुले होते हैं परन्तु शादी के बाद पुराणी बातों को भूलकर पति – पत्नी को एक दूसरे पर विशवास बांधकर समर्पित हो जाना चाहिए |

10.               पत्नी की कमाई का हिसाब मांगना आपका हक़ है परन्तु बेवजह तथा बिना सबूत के उस पर फालतू खर्च करने का इलजाम लगाना गलत है |

11.               विष्णु रूप की शालीनता के बजाय अहंकार वश अपने को महान समझ पत्नी के भाई को “अबे तू होता कौन है” से संबोधित करना तथा छोटी बहन पर बेवजह लांछन लगाने से पद की महत्ता धूलधूसरित हो जाती है |

मेरी बातों पर गुस्सा होने की बजाय इन पर चिंतन मनन करना बेहतर होगा | वर्तमान युग के नौजवान अपने बुजर्गों की बातों को तो अहमियत देते नहीं और अक्सर युवा जोश में होश खो बैठते हैं | रही मिलकर बात करने की तो यह आपको सुनिश्चित करना है कि कब और किसके यहाँ करनी है |वर्तनाम समय में मेरी तो बस इतनी तमन्ना है कि:

रिश्ते बनते रहें,सब हंसते रहें, बस इतना ही बहुत है |

एक दूसरे को, कभी-कभी मिलते रहें, बस इतना ही बहुत है |