Monday, September 11, 2017

मेरी आत्मकथा -1 (जीवन के रंग मेरे संग) बचपन

मेरी आत्म कथा
जीवन के रंग मेरे संग
(1)

एक मार्च 1980 की रात के आठ बजे होंगे | बाहर घना अंधेरा छाया हुआ था | बादलों की गड़गड़ाहट तथा बिजली की चमक से पता चला कि शायद बारिश होने वाली है | घुप अंधेरा हो गया था | गली में चलने वाला दिखाई नहीं दे रहा था कि कौन जा रहा था केवल उसकी पदचाप ही सुनाई देती थी | सामने दादी के घेर में पड़ी टीन पर बून्दों के गिरने से टन टन की आवाज से पता चला कि बून्दा बान्दी शुरू हो गई थी | उसी घेर में घास फूंस से बने एक छप्पर की आड़ में दो दिन पहले ही एक कुतिया ने बच्चे दिए थे | वैसे तो थोड़ी ठंड का मौसम था परंतु वर्षा प्रारम्भ होने से शायद पिल्ले भीग गए थे अतः उनकी कूँ कूँ करने की आवाज सुनाई देने लगी थी | इतने में तेज चलती सैं सैं करती हवा के एक ठंडे झोंके ने अपनी दुकान में बैठे मेरी रूह को कपाँ दिया | मैं सिमट कर बैठ गया | बाहर हो रही बून्दा बान्दी तथा ठंडी हवा के चलने से दूकान पर ग्राहक आने भी बन्द हो गए थे |
मैं अकेला बैठा अपने अतीत के बारे में सोचने लगा | इस समय हम दस भाई बहन हैं | मेरी एक छोटी बहन का बचपन में ही देहांत हो गया था | इस प्रकार गिनती में मैं अपने परिवार में मध्य में आता था | अर्थात मैं नीचे से भी छठा था तो उपर से भी छठा था | अब मेरे से छोटी सभी बहनें हैं तथा मेरे से बड़े तीन भाई तथा दो बहनें हैं | मेरे पूज्य पिता जी, लाल राम नारायण मंगल, का स्वर्गवास मेरी शादी के दो वर्ष बाद 1970 में ही हो गया था | उन्हें हमारे गाँव नारायणा में रामलीला के मंचन का संस्थापक कहा जाता है क्योंकि पहली बार उनकी पहल पर ही गाँव में रामलीला का आयोजन किया गया था | पूज्य पिताजी के रहते तक हमारा परिवार एक सम्मिलित परिवार था | हालाँकि उनकी मृत्यु के बाद हम सभी भाई अलग अलग रहने लगे हैं परंतु बड़ों को पूरी इज्जत देते हुए सभी शादी, विवाह, भात आदि का लेन-देन, एक साथ मिलकर किया जाता है |
मेरे बड़े भाई साहब शिव चरण गवर्मैंट आफ इंडिया प्रैस में कार्यरत हैं | उनसे छोटे ज्ञान चन्द, गाँव में ही अच्छे खासे जनरल मर्चैंट का काम सम्भाले हुए हैं तथा मेरे से बड़े औम प्रकाश सरकारी स्कूल मास्टर लगे हुए हैं | उन सभी के पास घर में हर सुविधा उपलब्ध है | मसलन फ्रिज, कूलर, टी.वी., स्कूटर,सोफा इत्यादि | इस प्रकार उन तीनों का परिवार अच्छा खाता पीता परिवार है | परंतु मेरे पास इनमें से अभी कोई वस्तु नहीं है | मैं चार पाँच महीने पहले ही अपने भाईयों के उकसाने पर भारतीय वायु सेना की नौकरी छोड़कर आया हूँ | यहाँ आकर  यही गनीमत है कि मेरी पूज्य माता जी श्रीमति सरबती देवी की वजह से मुझे फिलहाल सिर छुपाने के लिये छत तथा अपने पिताजी की जायदाद में से कुछ हिस्सा मिल गया है |  जो भी मिला मैं उसी में खुश हूँ |
मेरे पैदा होने के समय में बच्चे के जन्म-मृत्यु का कोई हिसाब नहीं रखा जाता था | जब भी बच्चा स्कूल में भर्ती कराया जाता था अन्दाजा लगाकर उसकी जन्म तिथि दर्ज कर दी जाती थी | बच्चे की पढाई पर माँ बाप अधिक ध्यान नहीं देते थे | बच्चा स्कूल जाए या न जाए, पढे या न पढ़े, यहाँ तक कि उसके खाने-पीने पर भी कोई खास तवज्जो नहीं दी जाती थी | भाई बहन आपस में मिलकर ही अपना जीवन निर्वाह कर लेते थे |
कहते हैं बचपन में मैं बहुत कमजोर सेहत का लड़का था परंतु पढ़ाई लिखाई में काफी अच्छा था | मुझे याद है कि हमारा स्कूल गाँव के बाहर एक चार दिवारी के अन्दर टैंटों में लगता था | पक्के के नाम पर मात्र एक कमरा था जिसमें स्कूल का हेड मास्टर बैठता था तथा ऐसा सामान रखा जाता था जिसका बाहर खुले में रखने से खराब हो जाने का डर था | बच्चों की स्कूल ड्रैस जरूर थी परंतु उसका पालन मुश्किल से ही किया जाता था | पढ़ने वाले बहुत से बच्चे तो नंगे पैर ही स्कूल में आते थे |
सुलेख लिखने के लिए लकड़ी की तख्तियों का इस्तेमाल किया जाता था |  रोजाना स्कूल से घर जाकर पहला काम यही होता था कि तख्ती को रगड़ रगड़ कर धोना | फिर उस पर मुल्तानी मिट्टी का लेप चढ़ा कर धूप में सूखने के लिए रखना |  जिससे उस पर अगले दिन फिर कलम द्वारा काली स्याही से लिखा जा सके | अगर तख्ती को जल्दी सुखाना होता था तो उसे मुल्तानी मिट्टी से पोतकर हवा में लहराते हुए बरबस मुंह से एक कविता सी फूट पड़ती थी ‘सुख-सुख पाटी, चन्दन घाटी’ |
तख्ती से याद आया | मेरे साथ मेरे ही नाम राशी का एक और लड़का पढ़ता था | मैं जितना डरपोक एवं कमजोर था वह उतना ही निडर तथा बलिष्ठ था | उसमें उदंडता कूट कूट कर भरी हुई थी | ऐसा कोई दिन नहीं जाता था जब उसकी शिकायत मास्टर या उसके घर वालों के पास न पहूँचती थी | इसी वजह से उसका नाम ही नटखट पड़ गया था | सुना गया है कि सचिन तेन्दुलकर जिस बैट से क्रिकेट खेलता है वह और सभी के बैटों से भारी होता है | उसी प्रकार नटखट के पास जो तख्ती थी वह और बच्चों की तख्तियों से लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई तथा वजन में दोगुनी ही बैठती थी | वह लड़का शरारत तथा लड़ाई झगड़े का एक चलता फिरता पुतला था | थोड़ी सी बात पर ही वह भड़ककर अपना आपा खो देता था | रोज एक दो बच्चों की तख्तियाँ फाड़ना तो उसका असूल सा बन गया था | पढ़ाई लिखाई में उसकी कोई रूचि नहीं थी |   
नटखट के कारनामों से तंग आकर एक बार मौह्ल्ले के सभी लड़कों  ने मिलकर उसको सबक सिखाने की योजना बनाई | शाम को सभी बच्चे मिलकर गाँव के बाहर मैदान में खद्दा-खोली का खेल खेला करते थे | उस दिन भी सभी खेल रहे थे | अपनी पूर्व योजना के अनुसार उस नटखट लड़के के खेल में बेईमानी करने पर सभी ने उसे पीटना शुरू कर दिया | परंतु थोड़ी देर में ही सभी यह देखकर दंग रह गए कि वह नटखट अकेला ही उन सभी बच्चों पर भारी पड़ने लगा था | इस पर सभी लड़के भागकर अपनी जान बचाने के लिए अपने घरों में घुस गए | उस नटखट लड़के ने वहाँ भी उनका पीछा नहीं छोड़ा तथा इस चक्कर में कई घरों के दरवाजों को बहुत नुकसान पहुँचाया | बड़ी मुश्किलों से उसके घर वाले उस पर काबू पा सके | उस दिन के बाद उस नटखट बच्चे ने स्कूल जाना ही छोड़ दिया | परंतु व्यस्क होते होते उस नटखट बालक में अप्रत्याशित एवं आश्चर्य जनक बदलाव आया | अब वह अपने व्यवहार में सभ्य, सुशील, कोमल एवं भद्र बन गया है |
आजकल की तरह उन दिनों गाँव के स्कूलों में बैंच या डैस्क नहीं होते थे | बच्चों को जमीन पर बीछे फर्शों पर ही बैठना होता था | जिसकी वजह से पहने हुए कपड़े एक ही दिन में गन्दे हो जाया करते थे | कपड़ों पर प्रैस करना तो कोई जानता ही न था |  अगर कहीं रिस्ते नाते में जाना पड़ता था तो धुले कपड़ों की सलवटें हटाने के लिए उनकी तह बनाकर रात को सोते समय उन्हें अपने तकिए के नीचे या बिस्तर के नीचे दबाकर सो जाते थे |       
स्कूल में कोई बिरला बच्चा ही होता था जो पैरों में जूते पहन कर आता था |
लिखने पढ़ने के लिए इस्तेमाल  होने वाली किताबें, कापियाँ वगैरह हमारे गाँव में नहीं मिलती थी | अगर किसी भी सामान की जरुरत पड़ती थी तो गाँव से लगभग तीन मील दूर सदर-देहली कैंट या फिर गोपी नाथ बाजार जाना पड़ता था |
एक बार हमारे स्कूल में जादूगर का तमाशा हुआ था | हमारी अध्यापिका ने उस पर एक लेख लिखकर लाने को कहा | मेरे पास कापी नहीं थी तथा मैं सदर से ला भी न सका था | अगले दिन जब स्कूल में अध्यापिका ने मुझे अपना लेख पढ़ने को कहा तो मैं अपनी पुरानी कापी खोलकर झूठ्मूठ ही पढ़ने लगा जैसे सचमुच में ही मैंने लिखा हुआ था | अध्यापिका ने मेरा लेख बहुत सराहा था | शायद उन्हें मेरी चालकी का पता भी न चलता अगर एक लड़के ने मेरा भंडाफोड़ न कर दिया होता | इस पर अध्यापिका ने चेतावनी देते हुए इतना ही कहा कि वैसे तुम्हारा प्रयास अति उत्तम है फिर भी आईन्दा ऐसा न करना |
उन दिनों आजकल की तरह बच्चों के खाने के लिए कुरकुरे, चिप्स, 5-स्टार चाकलेट, केडबरी, पतीशा, हाजमोला, कैम्पा इत्यदि नहीं मिलते थे | स्कूल के बाहर महज एक पंडित जी बैठते थे जो संतरे की टॉफी, पानी पताशे, और पिसे चूर्ण की पुड़िया रखते थे | गर्मियों में बर्फ की बनी चुस्की मिलती थी | बरसात के दिनों में तो ये सब चीजें मिलनी भी मुश्किल हो जाती थी |  |   
बरसात के दिनों में हमारी गली में पानी ऐसे भरकर चलता था जैसे कोई नदी बह रही हो | ऐसे में बड़े आदमी बच्चों को अपनी कमर पर लाद कर घर तक पहुँचाते थे |
घरों में पानी का कोई साधन नहीं था | पीने के लिए घर से लगभल एक किलोमीटर दूर स्थित बनिए वाले कुएँ से भरकर सिर पर ढोकर लाना पड़ता था | कपड़े धोने के लिए गाँव के चारों कौनों पर बने जोह्ड़ अर्थात तालाब या खेतों में चलते रहट अथवा बैलों द्वारा खींची जा रही मसक से आने वाले पानी का ही सहारा लेना पड़ता था | मसक खीचते हुए बैलों के गले में बंधी घंटियों की झनझनाहट तथा भरी मसक को पकड़ने वाले किसान की गुनगुनाहट बहुत ही मधुर एवं मनमोहक वातावरण बना देती थी |
उन दिनों में इक्का दुक्का खुला सिनेमा घर होता था वह भी गाँव से कोसों दूर | अतः जाना ही मुश्किल हो जाता था | टेलिविजन, कमप्यूटर की तो बात सपने में भी नहीं सोची जा सकती थी | यहाँ तक कि घरों में बिजली भी नहीं थी | रात को मोमबती, डिबरी या लालटेन का ही सहारा था | पखाने के लिए खुले में पहाड़ो पर जाना पड़ता था |
खेलों में, पहाडू, पिट्ठू, खद्दा खोली, कंचे, गिल्ली डंडा, लट्टू तथा ताश ही मुख्य थे | आजकल के बच्चों को तो इनमें से कई खेलों के बारे में तो पता ही नहीं होगा कि वे खेले कैसे जाते हैं | और हमारे जैसों के लिए वे केवल यादें ही बन कर रह गई हैं | पहाडू खेलने से बच्चों में निडरता आ जाती थी तथा वे अंधेरे में कहीं भी जाने में किसी प्रकार का डर महसूस नहीं करते थे | इस खेल में दो पार्टियाँ बन जाती थी | एक पार्टी के बच्चे गाँव के बाहर खेतों तक में जाकर छिप जाते थे और उसके बाद उनका एक साथी पहाडू कहकर भागकर उनसे जा मिलता था | दूसरी पार्टी के सदस्य उन्हें ढूढ़ने निकल पड़ते थे | खेतों में छुपे बच्चे वहाँ बोई गई गाजर, मूली, खरबूजे तथा खीरे आदि का खुब लुत्फ उठाते थे | इस तरह रात को खेले जाने वाले इस खेल से बच्चे निडर हो जाते थे |
बच्चों के मन में केवल एक ही चीज का डर बसा रहता था वह था भूत | उन दिनों भूतों की कहानियाँ बहुत प्रचलित थी | इस लिए शमशान घाट अर्थात चौहानी के रास्ते का इलाका शाम ढ़लते ढ़लते विरान हो जाता था |      
गाँव के स्कूल से पाँचवीं पास करने के बाद साईंस लेने के लिए मुझे आई.ए.आर. आई पूसा के स्कूल में दाखिला लेना पड़ा था | यह स्कूल मेरे घर से छः मील दूर था | आने जाने के लिए कोई सवारी न थी अतः पैदल ही आना जाना पड़ता था | गाँव से स्कूल जाने का रास्ता शमशान घाट तथा इन्द्रपुरी होकर जाता था | इन्द्र्पुरी और मेरे गाँव के बीच एक छोटी सी पहाड़ी पडती थी | सर्दियों के दिनों में शाम को जब मैं स्कूल से लौटता था तो अन्धेरा घिर आता था | इन्द्रपुरी की पहाड़ी से शमशान घाट नजर आते ही पैर आगे चलने के लिए मना कर देते थे | फिर वहाँ बैठकर वह टुकड़ा पार करने के लिए किसी व्यस्क राहगीर की इंतज़ार करनी पडती थी |
गाँव के स्कूल और इस स्कूल के वातावरण में बहुत भारी अंतर था | फिर भी किसी तरह मैनें अपने को उस वातावरण में ढ़ालने में अधिक देर न लगाई | दसवीं कक्षा तक मेरी पढ़ाई बहुत अच्छी चली |
मेरा नया स्कूल को.एजूकेशन था | अर्थात यहाँ लड़के और लड़कियाँ साथ साथ पढ़ते थे |
वैसे तो ज़माना बदल गया है परन्तु एक चीज रत्ती भर भी नहीं बदली | वह है लड़के लड़की का एक दूसरे के प्रति खिंचाव | उस जमाने में भी १३-१४ वर्ष का होते होते ऐसे कई किस्से सुनने को मिल जाते थे और आज तो इनकी  भरमार है | मेरे स्कूल के दिनों में मैं महसूस करता था की बहुत सी लड़कियां मेरी और आकर्षित हो रही हैं परन्तु यह सोचकर रह जाता था की शायद यह मेरी गलत फहमी है | क्योंकि न तो मेरा रंग गोरा था न ही मैं अपने को इतना खूब  सूरत समझता था | मैं तो गांव का रहने वाला एक सीधा साधा सांवले रंग का लड़का था |
उन्ही दिनों मेरे भाई साहब ज्ञान चंद  की शादी हुई | मै अकसर उनके साथ उनकी ससुराल जाया करता था | वहां मै इस आकर्षण से बच न सका और उस कच्ची उम्र में मुझे भी एक  लड़की ने अपनी और आकर्षित कर लिया | हांलाकि एक समय वह सीमा लांघने को तैयार थी परन्तु मैंने अपना संयम न खोया और दोनों को मजधार में बहने से बचा लिया | (पूरी कहानी मेरे उपन्यास 'आत्म तृप्ति' में पढ़ें)

Sunday, September 10, 2017

मेरा परिचय

                                                                
                                                          चरण सिहँ गुप्ता


मेरा जन्म 02 मार्च 1946 को नारायणा गाँव में हुआ था | मेरी प्रारम्भिक शिक्षा, पाँचवी तक, गाँव के ही सरकारी मिडिल स्कूल में हुई | इसके बाद इंडियन एग्रीक्ल्चर रिसर्च इंस्टीच्युट पूसा के स्कूल से हायर सैकेंडरी करके, सन 1963 में, मैं भारतीय वायु सेना में भर्ती हो गया | वायु सेना की सोलह साल की नौकरी के दौरान मैनें जोधपुर विशव विधालय से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की तथा वायु सेना से ‘डिप्लोमा इन इलैक्ट्रोनिक्स’ का हकदार भी बना |
मार्च 1980 में भारतीय वायु सेना की नौकरी छोड़कर मैनें भारतीय स्टेट बैंक में नौकरी कर ली | बैंक की नौकरी में रहते हुए सन 2000 में जब वहाँ हिन्दी प्रतियोगिता हुई तो मेरे द्वारा लिखित कहानी की प्रविष्ठी को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ | यहीं से मेरे अन्दर कुछ रचनाएँ लिखने की जागृति पैदा हुई तथा फिर लगातार छः वर्षों तक, जब सन 2006 में मैं बैंक से रिटायर हो गया, मेरी कहानियों की प्रविष्ठियों को हिन्दी दिवस प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार ही मिलता रहा |
यही कारण रहा कि मैंने अपनी पुस्तक मन की उड़ान, अहंकार, ठूँठ, मन की उड़ान-२  तथा आत्म तृप्ति के बाद अपनी आत्मकथा ‘जीवन के रंग मेरे संग’ लिखने का प्रयास किया है | आशा है आपको मेरा यह जीवन प्रसंग रोचक, पठनीय एवम कुछ शिक्षा प्रदान लगेगा |
धन्यवाद |

सम्पर्क:
डब्लू.जैड.-653, नारायणा गाँव
नई देहली-110028
फोन:9313984463
Email: csgupta1946@gmail.com


मेरी आत्म कथा - भूमिका


भूमिका 
जीवन के रंग मेरे संग
वक्त कभी रूकता नहीं | वह हमेशा चलता ही रहता है और चलता भी है एक ही गति से | उसकी गति न कभी कम होती है न ज्यादा | चाहे उसके रास्ते में कितनी भी बड़ी से बड़ी बाधा आ जाए वह सब को लाँघ जाता है | यह कहना उचित होगा कि संसार में ऐसी कोई अड़चन नहीं जो उसकी चाल पर असर डाल सके | वक्त कभी मरता नहीं न ही वह बूढा होता है इसीलिए तो वह युगों युगों से एक समान चाल से चलता आ रहा है |
वक्त की मस्त मतवाली चाल देखकर पृथ्वी, आकाश तथा पाताल का हर प्राणी वक्त का अनुशरण करना चाहता है | हर जीव वक्त को पकड़ कर उसके अनुरूप अजर अमर होने को तत्पर रहता है परंतु आज तक वक्त को कोई पकड़ नहीं पाया |
वक्त तो अपनी निर्बाध गति से आगे बढता रहता है परंतु एक मनुष्य इस पृथ्वी पर जन्म लेने के बाद वक्त के साथ अपनी बाल्य अवस्था, जवान अवस्था, प्रौढ अवस्था तथा बूढेपन को प्राप्त करने के बाद इस संसार से विलीन हो जाता है |
मनुष्य को इस दुनिया में पदार्पण करने के बाद असंख्य प्रकार के घटनाक्रमों का सामना करना पड़ता है | उसे अमीरी-गरीबी, दुःख-दर्द, ईर्षा-द्वेष, प्रेम-त्याग इत्यादि क्षणों को सहन करना पड़ता है | इसी को विधि का विधान या किस्मत कहते हैं |
माना जाता है कि इस संसार में अवतरित हुआ हर प्राणी अपनी किस्मत में लिखे अनुसार ही अपना जीवन निर्वाह करते हुए सदगति को प्राप्त हो जाता है | वैसे यह भी माना जाता है कि मनुष्य अपनी किस्मत खुद बना सकता है | परंतु अपनी किस्मत खुद बनाने के लिए अग्रसर व्यक्ति को भी आखिर इसी बात पर भरोसा करना पड़ता है कि उसकी किस्मत में ऐसा ही होना लिखा था | क्योंकि कोई नहीं जानता कि भविष्य का अगला पल जीवन में क्या फेर बदल लाने वाला है |
दूसरों के जीवन के घटनाक्रमों से सीख लेकर मनुष्य अपना भविष्य कुछ हद तक सुखद तो बना सकता है परंतु यह सुनिश्चित कदापि नहीं कर सकता कि उसके साथ आगे कोई अनहोनी घटना घटित नहीं होगी |
दूसरों के जीवन के अनुभव तथा घटित घटनाक्रमों को जानने के लिए एक व्यक्ति को कोई न कोई माध्यम चाहिए | इस जानकारी के लिए किसी के द्वारा लिखित अनुभव से उत्कृष्ट माध्यम और क्या हो सकता है | परंतु इस संसार के कई करोड़ लोगों में से कुछ ही लेखन कला में पारांगत होते हैं जो अपने जीवन के अनुभव से दूसरों को अवगत कराने में कामयाब हो पाते हैं |
मेरे इस लेख 'जीवन के रंग मेरे संग' के माध्यम से मैं भी अपने जीवन के संस्मरणों को क्रमशः पाठकों तक पहुचाने का ऐसा ही प्रयास कर रहा हूँ |
चरण सिंह गुप्ता
डब्लू.जेड.-६५३, नारायणा गाँव
नई देहली-११००२८
मो:९३१३९८४४६३
Email:csgupta1946@gmail.com


Tuesday, April 18, 2017

पराकाष्ठा

पराकाष्ठा देश अराजकता के दौर से गुजर रहा था | चारों दिशाएँ असंतुष्टता से पीड़ित जान पड़ती थी | पूर्व में नक्सलवादियों ने सिर उठाया हुआ था | उत्तर में उग्रवादी अपनी क्रूरता की धाक जमाने में तुले थे | पश्चिम में धर्म के नाम पर लोग बंट गये थे तथा प्रत्येक दिन कहीं न कहीं दो गुट आपस में उलझे रहते थे | दक्षिण में लिट्टे ग्रुप अपनी पहचान बनाने को आतुर था | प्रत्येक दिन समाचार पत्र आगजनी,लूटपाट,बम विस्फोट इत्यादि खबरों से भरे रहते थे | आहिस्ता आहिस्ता लोगों में धार्मिक विचारों के साथ साथ जात पात की आस्था भी प्रबल होती जा रही थी | तभी तो झारखंड मुक्ति मोर्चा,बोदोलैंड खलिस्तान तथा गौरखालैंड आदि बनाने की मांगे जोर पकड़ती जा रही थी | देश का प्रशासनिक ढांचा चरमरा सा गया था | आम जनता बढती महंगाई से परेशान थी | राशन गोदामों पर राशन न के बराबर था और जो था भी वह ब्लैक में बिक रहा था | नौकरी पेशे वाले भी परेशान थे | उनकी कोई न कोई संस्था हर रोज हड़ताल पर रहती | देश की आमदनी दिन पर दिन घटती जा रही थी क्योंकि काम करने के नाम पर औहदेदार देश की बजाय अपनी जेब का अधिक ख्याल रखने लगे थे | विरोधी राजनितिक दल सत्तारूढ दल को किसी प्रकार की कोई सहायता देने को तैयार न थे | इसके विपरित वे सत्तारूढ दल के हर उन्नति की तरफ बढाए कदमों में रोड़ा अटका रहे थे और जनता को गुमराह करके खुद सत्ता सम्भालना चाहते थे | इस प्रकार चारों और अराजकता का राज्य स्थापित था | देश की आंतरिक स्थिति को भाँप कर पड़ौसी देश भी अपना उल्लू सीधा करने की तैयारी में लग गए थे | देश की सीमा पर उनका आना जाना तथा जमाव शुरू हो गया था | समय की नजाकता को देखते हुए वे किसी भी दिन अपनी सीमा लांघकर अपने देश की सीमा बढा सकते थे | इन सभी समस्याओं से निबटने का केवल एक ही विक्लप था और वह थी देश में आंतरिक इमैरजैंसी | अतः देश के प्रधान मंत्री ने जरूरी समझते हुए यह कदम उठा भी लिया | इमरजैंसी की घोषणा से पहले सभी सेनाओं की छुट्टियाँ रद्द कर दी गई तथा सभी फौजियों को अपनी अपनी यूनिटों में शिघ्रातिशिघ्र पहुँचने की ताकिद दे दी गई | आंतरिक इमैरजैंसी के तहत देखते ही देखते एक ही रात में हजारों लोगों को बन्दी बना लिया गया | यहाँ तक कि कई घरों की औरतों एवं बच्चों को तो पता ही न चला कि कब उनके पिता या पति को पकड़ लिया गया तथा जेल में डाल दिया गया | अधिकतर ऐसा ही पाया गया कि जब घर के सद्स्य सुबह सोकर उठे तो उनके बड़े आदमी घर से नदारद पाए गये | कुछ लोग जिन्हें पहले से ही ऐसी भनक लग गई थी वे पकड़े जाने के डर से कहीं छुप गये थे | चारों और आशचर्य एवं भय का वातावरण बन गया था | विरोधी दलों का ऐसा मुश्किल से ही कोई नेता बचा होगा जो जेल में न डाल दिया गया था | यहाँ तक कि पार्टियों के छोटे मोटे कार्यकर्ताओं को भी नहीं बक्शा गया था | जो थोड़ा सा भी विरोधी पार्टी के किसी भी नेता के साथ देखा गया था वह भी जेल में बन्द कर दिया गया था | जेल के अधिकारियों को खास हिदायत दे दी गई थी कि वह जेल में बन्द व्यक्तियों को इमरजैंसी कानून के तहत किसी भी कीमत पर रिहा नहीं किया जाएगा | जब तक कि देश की आंतरिक स्थिति सुधर नहीं जाती | इन्हीं दिनों चरण एयरफोर्स में कार्यरत होने के कारण जोधपुर में नौकरी कर रहा था | उसे घर से एक पत्र मिला | चिरंजीव चरण , प्रसन्न रहो ! अत्र कुशलम तत्रास्तु | आगामी समाचार यह है कि आपके बड़े भाई ज्ञान चन्द को जेल में बन्द कर दिया गया है | उस पर इल्जाम है कि वह जनसंघ का कैशियर है | आप तो इतनी दूर जाकर देश सेवा करने में तत्पर हो परंतु अब मुझे तथा तुम्हारे बच्चों को सम्भालने वाला कोई नहीं है क्योंकि औम प्रकाश भी सिविल डिफैंस की डयूटी पर अधिकतर बाहर ही रहता है | उसके बच्चे भी अब अकेले से ही रहते हैं | अतः जानना | आपकी माता सरबती पत्र पढकर चरण सन्न रह गया | उसने थोड़ी देर सोचा फिर वर्दी पहन कर सीधा अपने कमांडिंग आफिसर के पास पहुंचा | चरण की पूरी व्यथा सुनने के बाद उसके कमांडिंग आफिसर ने अपने स्टेशन कमांडर से स्पेशल आज्ञा लेकर चरण को पाँच दिनों की छुट्टी मंजूर कर दी | जब चरण घर पहुंचा तो घर में मुर्दानगी छाई हुई थी | उसने सभी को ढांढस बंधाया | फिर अपने से बडे भाई औम प्रकाश से,जो सिविल डिफैंस में भी थे, सलाह मसवरा करने बैठ गया | चरण :- भाई साहब ,ज्ञान चन्द जी को जेल में गए कितने दिन हो गये है ? औम :- आज शायद पाँचवा दिन है | चरण :- वे किस इल्जाम में जेल भेजे गए हैं ? औम :- वैसे तो पूरा पता मुझे भी नहीं है | मैं भी कल शाम को ही आया हूँ | जब तुम्हारी छुट्टियाँ रद्द कर दी गई थी तथा तुम चले गये थे तो उसके अगले दिन ही मुझे भी सिविल डिफैंस की तरफ से देहली की सीमाओं पर तैनात कर दिया गया था | चरण :- भाई साहब हम दोनों तो देश सेवा में लगे हैं | अपने बाल बच्चों की परवाह न कर उनसे हजारों मील दूर अपने देश की स्थिति सुदृड बनाने में सहयोग दे रहे हैं | दूसरी तरफ हमारी गैर हाजिरी में हमारी फैमिली की देखभाल करने वाले हमारे भाई को ही झूठी खबर के मातहत जेल में डाल दिया गया है | औम :- मैनें अपने ब्लाक वार्डन से यह बात करी थी | आज हम सब सैंट्रल जेल चलेंगे जहाँ हमारा भाई ज्ञान चन्द बन्द है | देखते हैं वहाँ क्या बात बनती है | सैंट्रल जेल देहली के बाहरी इलाके में स्थित थी | चरण अपने भाई औम प्रक|श एवं सिविल डिफैंस के नारायणा क्षेत्र के वार्डन के साथ वहाँ पहुंचा | वहाँ जन समूह की अपार भीड़ थी | ऐसा लगता था जैसे देहली के सभी रास्ते यहीं आकर खत्म हो रहे थे | लोगों की भीड़ पलपल और भी बढती जा रही थी | चरण ने देखा कि सैंट्रल जेल का काले रंग का दानव सा दिखने वाला दरवाजा बन्द था | दरवाजे के एक पाट में छोटा सा एक दरवाजा दिखाई देता था | परंतु यह आम घरों में लगने वाले दरवाजों से किसी प्रकार भी छोटा नहीं था | दरवाजे के दूसरे पाट में एक छोटी सी खिड़की लगी थी | सैंट्रल जेल के दरवाजे के बाहर एक संतरी बन्दूक लिये पहरा दे रहा था | उसकी बगल में ड्रम जैसी कोई वस्तु रखी थी | जनता जनार्दन एवं सैंट्रल जेल के उस भीमकाय दरवाजे के बीच लगभग 500 गज का फासला था परंतु इस फासले को मनुष्यों की एक सर्पाकार पंक्ति ने आपस में जोड़ रखा था | कतार का सबसे आगे वाला व्यक्ति गेट पर खड़े संतरी के हाथ पर कुछ रखता तथा सैंट्रल जेल के दरवाजे पर लगी खिड़की की ओर बढ जाता | फिर वह खिड़की के अन्दर एक दो बार इधर उधर झाँकता इतने में ही संतरी की जोरदार आवाज "अगला आदमी" सुनकर वह व्यक्ति खिड़की के सामने से हट जाता | संतरी उस वस्तु को जो आने वाले लोग उसके हाथ पर रखते थे ड्रम में डालता जाता था | यह सब देख चरण की उत्सुकता बढी तथा वह नारायणा क्षेत्र के वार्डन श्री हरग्यान सिहं से पूछे बिना न रह सका | चरण :- भाई साहब, यह क्या हो रहा है ? हरग्यान :- जो हो रहा है वह तुम्हारे सामने हो रहा है | चरण :- परंतु मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा कि यह लाईन क्यों है ? हरग्यान :- यह इस लिये है कि उस खिड़की के अन्दर वे व्यक्ति बैठे होंगे जो आज रिहा होने वाले हैं | चरण :- तो फिर ? हरग्यान :- लोग उस खिड़की में झाँककर अपने प्रियजन को देखकर संतुष्टि प्राप्त करना चाहते हैं कि वह रिहा हो रहा है | चरण :- परंतु वह संतरी हर व्यक्ति को क्या दे रहा है ? उस खिड़की में झांकने के लिये क्या कोई टोकन मिलता है? जो हमें संतरी को देना पड्ता है | हरग्यान :-(चरण की मासूमियत पर मुस्कराते हुए) भाई जी वह लोगों को कुछ दे नहीं रहा परंतु उनसे ले रहा है | चरण :- क्या मतलब ? हरग्यान :- मतलब साफ है ! जो व्यक्ति अपने प्रियजन का दिदार करने को उत्सुक हो उसे कुछ तो खर्च करना ही पड़ेगा | चरण :- आश्चर्य से ! क्या ? हरग्यान :- हाँ अब तुम समझे | फिर भी बता देता हूँ कि हर व्यक्ति संतरी के हाथ पर दो रूपये रख रहा है और वह तुम्हें भी रखने पड़ेंगे | चरण :- दो रूपये ! दो रूपये क्यों ? क्या यह यहाँ की फीस है ? हरग्यान :- मेरे भोले भाई तुम फौज में हो | बाहर कैसे क्या होता है तुम नहीं जानते | यह न फीस है, न जूर्माना, न कानून इसे यहाँ का कायदा कहता हैं | और यहाँ के कायदे के अनुसार यह जमा राशी यहाँ की पुलिस के कर्मियों में इनके निर्धारित अनुपात के अनुसार शाम को इनमें बाँट दी जाएगी | चरण :- क्या यह हमारे देश के खाते की जमा राशी समझी जाती है ? हरग्यान :-(एक बार फिर चरण की ना समझी पर मुस्कराया) देश की आमदनी तो तब होती जब तुम्हें इसकी रसीद मिलती | ऐसी सब बातें करते करते इनका नम्बर भी आ गया | सबसे पहले औम प्रकाश था उसके बाद हरग्यान तथा सबसे पीछे चरण था | औम प्रकाश तथा हरग्यान ने तो दो दो रूपये दिये और खिड्की की तरफ बढ गये परंतु चरण संतरी की हथेली पर बिना पैसे टिकाए ही आगे बढ गया | संतरी :- अबे ओए जंगली है क्या ? चरण :- कभी था | अब तो एक देश सेवक हूँ | संतरी :- कहाँ जा रहा है ? चरण :- जहाँ सब जा रहे है | संतरी :- क्या करने जा रहा है ? चरण :- जो सब करने जा रहे हैं | संतरी :- सब तो कुछ और भी कर रहे हैं | चरण :- वैसा करने के लिये मेरे पास हराम के पैसे नहीं हैं | संतरी :- बडा बदतमीज है | चरण :- बदतमीज तो तू है जो बोलने की तमीज नहीं रखता | संतरी :- वापिस आता है कि नहीं ? चरण :- औरों को भी बुला ले मैं भी आ जाऊँगा | संतरी :- अच्छा तो तू ऐसे नहीं मानेगा | चरण बेपरवाह आगे बढता गया तथा खिड़की के पास पहूँच गया | संतरी की ऊंची आवाज सुनकर गेट के दूसरे छोटे दरवाजे से दो तीन संतरी और निकल आए तथा चरण को धकेल कर गेट के अन्दर कर दिया | चरण को बहुत आश्चर्य हुआ जब गेट के अन्दर वे संतरी उसे यूं ही अकेला छोड्कर एक कमरे में चले गये | चरण ने गेट के अन्दर का जायजा लिया | वहाँ बहुत से व्यक्ति पंक्ति बध बैठे थे | एक तरफ बिना दरवाजे के कमरे नूमा जगह में एक मजिस्ट्रेट बैठा था जो एक एक करके बैठे हुए उन कैदियों के पेपर चैक कर रहा था जिन्हें आज जेल से छुट्टी मिलने वाली थी | इस गेट के अन्दर जहाँ वह अब खड़ा था एक और बड़ा गेट था जो इस समय बन्द था | चरण ने देखा कि उसका भाई ज्ञान चन्द उनमे नहीं था जो लोग वहाँ बैठे थे | वह मौका पाकर मजिस्ट्रेट के सामने जाकर खड़ा हो गया | अर्दली :- क्या बात है ,तुम कौन हो ? चरण :- मजिस्ट्रेट साहब से बात करनी है | अर्दली :- पहले यह बताओ कि तुम कौन हो और यहाँ कैसे आए ? चरण :- मैं एक फौजी हूँ | इमरजैंसी के दौरान मेरे भाई को बन्दी बना लिया गया है | उसके बारे में ........... चरण अपना वाक्य पूरा भी न कर पाया था कि चार संतरी अन्दर आए | एक ने चरण की बाँह पकड़ी और जोर देकर कहा " आजा जरा तुझे तमीज सिखा दें कि वह क्या होती है " | चरण ने भाँप लिया कि अब वे संतरी उसको अपने कमरे में ले जाकर उसकी धुनाई करेंगे | चरण :- (अपनी बाँह छुड़ाते हुए जोर से चिल्लाया) नहीं आता | तुम होते कौन हो मुझे छूने वाले ? एक संतरी :- यह आराम से नहीं मानेगा | इसे तो उठाकर ही ले जाना पड़ेगा | (चारों संतरी चरण की और बढते हैं) चरण ने मौके की नजाकता समझते हुए एक लम्बी छलाँग लगाई तथा मजिस्ट्रेट के कमरे के दरवाजे पर पहरा दे रहे संतरी की आटोमैटिक स्टेनगन फुर्ती से झपट कर वापिस अन्दर कमरे में घुस गया | जब तक चारों संतरी उसे पकड़ते चरण ने स्टेनगन मजिस्ट्रेट की कनपटी पर लगा दी तथा जोर से चिल्लाया "खबरदार जो किसी ने आगे बढने की कोशिश की ,मैं सबको भूनकर अपने को भी खत्म कर दूंगा" | कुछ देर के लिये सन्नाटा छा गया | मजिस्ट्रेट :- क्या बात है, तुम कौन हो ? चरण :- साहब मैं एक फौजी हूँ | मजिस्ट्रेट :- तुम क्या चाहते हो ? चरण :- अपने भाई की रिहाई | मझ्स्ट्रेट :- अपने भाई की रिहाई ! वह कहाँ है ? चरण :- इसी जेल में बन्द है | मजिस्ट्रेट :- यहाँ से रिहाई बिना कोर्ट के आर्डर के भला कैसे मुमकिन है | चरण :- साहब जी मेरा भाई कोई मुजरिम नहीं है | मजिस्ट्रेट :- मुजरिम नहीं है तो फिर यहाँ जेल में बन्द कैसे है ? चरण :- साहब उसे शक की बिना पर कि वह भारतीय जन संघ का कैशियर है , इमरजैंसी के तहत बन्द करवा दिया गया है | मजिस्ट्रेट :- अच्छा यह बात है | चरण :- हाँ साहब मैं एक फौजी हूँ | घर से अधिकतर बाहर ही रहता हूँ | मेरा एक भाई सिविल डिफैंस में डिप्टी वार्डन है | उसकी ड्यूटी भी आजकल देहली बार्डर पर लगी हुई है | अतः केवल यही भाई जिसे लोगों ने बन्द करवा दिया है , हम दोनों भाईयों की फैमिली की देखभाल करता था | साहब अब आप खुद ही निर्णय करो कि जिसके दो दो भाई देश की सेवा में तत्परता से लगे हों वे अपनी ड्यूटी पूरी लगन से कैसे निभा पाएंगे अगर उनके बच्चों की देखभाल एवं परवरिश ठीक से न हो रही हो | इसके साथ साथ अगर उनके बच्चों की देखभाल करने वाले को ही झूठी बातों के आधार पर जेल में डाल दिया गया हो तो हमारा देश सेवा में रूची दिखाना कैसे सम्भव होगा | मजिस्ट्रेट :- आप कैसे कहते हैं कि आपके भाई के खिलाफ झूठा आरोप लगाया गया है ? क्या कोई मौजिज व्यक्ति इस बात की गवाही दे सकता है | चरण :- हाँ दे सकता है , साहब | बाहर मेरे भाई औम प्रकाश एवं हमारे ब्लाक के सिविल डिफैंस के वार्डन श्री हरग्यान सिहं जी भी आए हैं | पहले तो मजिस्ट्रेट ने ,संतरी, जो चरण के लिये घात लगाए खड़े थे की तरफ इशारा किया कि वे चले जाएँ | फिर उसने अपने गार्ड को बुलाकर आदेश दिया कि चरण के भाई औम प्रकाश तथा वार्डन हरग्यान सिहं को बाहर से बुला लाए | थोडी देर में दोनों मजिस्ट्रेट के सामने खड़े थे | वार्डन हरग्यान ने चरण को जब मजिस्ट्रेट पर स्टेनगन ताने देखा तो अचरज में पड़ गया | हरग्यान :- (गुस्से में)यह क्या कर रहे हो ? चरण :-:-कुछ नहीं इंसाफ मांग रहा था | हरग्यान :- यह कौन सा तरीका है इंसाफ मांगने का | तुम तो देश के रक्षक हो | ऐसे इंसाफ मांगना तुम्हे शोभा नहीं देता | चरण :- ऐसा मैनें मजबूर होकर किया है | अगर मैं ऐसा न करता तो यहाँ के संतरी मेरा कचूमर निकाल देते तथा मजिस्ट्रेट साहब को मेरी दास्तान पता भी न चलती | हरग्यान :- ठीक है ठीक है | अब यह खत्म करो और मजिस्ट्रेट साहब से माफी मांगो | चरण :-(असमंजसता के वातावरण में) स्टेनगन मजिस्ट्रेट की कनपटी से हटा कर थोड़ा दूर खड़ा हो जाता है | मजिस्ट्रेट :- अच्छा चौधरी साहब क्या आप चरण के भाई ज्ञान चन्द को जानते हैं ? हरग्यान :- हाँ साहब इनकी पूरी फैमिली को खूब अच्छी तरह से जानता हूँ | मजिस्ट्रेट :- तो क्या ज्ञान चन्द जन संघ से सम्पर्क नहीं रखता ? क्या वह उस पार्टी का कैशियर नहीं है ? हरग्यान :- साहब ये बनिया आदमी हैं | खजांची तो ये जन्म से होते हैं | परंतु ये खजांची "धरोड़" के होते है | मजिस्ट्रेट :- (कुछ सोचते हुए) धरोड़ के ! यह धरोड़ क्या होती है ? हरग्यान :- साहब ये लोग ब्याज बट्टे का काम करते हैं | कुछ रखकर रूपया ब्याज पर दे देते हैं | उसे ही धरोड़ कहते हैं | आजकल के जमाने में धरोड़ रखने वाले को अनपढ लोग भी कैशियर का नाम देने लगे हैं | मजिस्ट्रेट :- तो क्या ज्ञान चन्द का जन संघ से कोई वास्ता नहीं है ? हरग्यन :- नहीं साहब ,इन्हें इतनी फुर्सत कहाँ कि किसी पार्टी वार्टी के चक्कर में पड़ें | ये लोग तो वैसे भी दिल के बड़े कमजोर और डरपोक होते हैं | मजिस्ट्रेट :- (मुस्कराते हुए) डरपोक | चौधरी साहब जब डरपोक का दिल (चरण की तरफ देख कर ) इतना निडर है तो फिर निडर का दिल कैसा होगा यह तो मैं सोच भी नहीं सकता | हरग्यान :- यह तो फौजी है साहब | अखड़ दिमाग जो ठहरा | इसकी तरफ से मैं आपसे माफी मांगता हूँ | मजिस्ट्रेट :- (चरण को सम्बोधित करते हुए) यह जो आज तुमने निडरता दिखाई है उससे मैं बहुत खुश हूँ परंतु तुमने जो किया है वह कानूनन अपराध है | तुम यह मत सोचना कि मैं तुम्हारे कारनामें से डरकर तुम्हारे भाई को छोड़ रहा हूँ | अगर मैं चाहता तो तुम्हें कभी का बन्दी बनाकर जेल में डलवा देता | परंतु मैनें ऐसा किया नहीं क्योंकि मैने सोचा कि मेरे ऐसा करने से हमारे देश के दो सच्चे सेवकों का बागी हो जाने का खतरा पैदा होने का डर था (औम प्रकाश की तरफ देखता है )| फिर भी तुम्हें हिदायत देता हूँ कि आईन्दा कभी भी कानून को अपने हाथ में न लेना अन्यथा जिन्दगी भर पछ्ताते रह जाओगे | चरण :- साहब मुझे माफ कर दो | परंतु यहाँ की घुसखोरी एवं बेईमानी को देखकर जो आपकी नाक के नीचे हो रही है मैं अपने आप पर काबू न रख पाया | मजिस्ट्रेट:- घुसखोरी और बेईमानी यहाँ ! ? चरण :- हाँ साहब | अभी पिछले महीने ही हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी ने हमारे देश की स्वर्ण जयंती पर ऐतिहासिक लालकिले की प्राचीर से घुसखोरी के खिलाफ जेहाद छेड़ने की घोषणा की थी | उन्होने कहा था कि घुसखोरों को बड़े अधिकारियों की जानकारी में जनता को लाना चाहिये तभी हम उनके खिलाफ कुछ कार्यवाही करने में समर्थ हो पाएंगे | परंतु यहाँ मुझे यह जानकर बहुत आश्चर्य एवं आघात लगा कि जिस जेल के दरवाजे के इस पार खून,चोरी,मारपीट,बेईमानी और घुसखोरी जैसे जूर्मों के कारण सैकडों लोग बन्दी हैं उसी दरवाजे के बाहर उस पार हजारों लोगों के सामने पुलिस वाला अपनी मुट्ठी गरम हुए बिना किसी को आगे बढने ही नहीं देता| क्या कानून उसके लिये नहीं है | क्या घुसखोरी पुलिस वालों का जन्म सिद्ध अधिकार है ? मजिस्ट्रेट :- यहाँ ऐसा हो रहा है मुझे विशवास नहीं होता | चरण :- साहब, हाथ कंगन को आरसी क्या | खुद चलकर देख लिजिए | सभी व्यक्ति जो वहाँ मौजूद थे उठ खड़े होते हैं | मजिस्ट्रेट साहब सबसे आगे थे | उनके कदम एक विजेता की तरह बढ रहे थे | वे आनन फानन में गेट के छोटे दरवाजे को लांघकर बाहर जा खड़े हुए | बाहर का दृश्य देखा तो उनकी आंखे फटी की फटी रह गई | अब उनमें इतनी भी हिम्मत न रही कि चरण से आंख मिला सकें | मन पर एक बोझ लिये वे वापिस गेट की तरफ पल्टे | उनके चेहरे का तेज गायब हो चुका था | चेहरे का पीलापन ऐसा आभास देने लगा था जैसे उनके शरीर का सारा खून एकदम पानी बन गया हो | उन्होने अपनी बेजान सी उंगली के इशारे से संतरी को छोटा दरवाजा खोलने का इशारा किया तथा औम प्रकाश,हरग्यान्,ज्ञान चन्द तथा चरण को बाहर छोड़कर खुद अन्दर चले गये | मजिस्ट्रेट साहब के बढते कदम बोझल हो गए थे | चरण को ऐसा महसूस हुआ जैसे वे भी इस घुसखोरी को रोकने में असमर्थ थे क्योंकि तभी तो वे नीची गर्दन किये ,एक मुजरिम की तरह,यह कहते हुए वापिस लौट गए कि "भगवान न जाने इस देश का क्या होगा ,यह तो घुसखोरी की पराकाष्ठा है " |

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