Tuesday, November 21, 2017

मेरी आत्मकथा- 31 (जीवन के रंग मेरे संग) इंदिरा की बरसी

सन २००३ | जून का महीना | तिथि १९ | रात का समय | सैक्टर २३-ए गुडगावां का मकान | न जाने क्यों रात के ११-३० बजने के बावजूद मुझे नींद नहीं आ रही थी | सोने की सभी कोशिशें नाकाम साबित हो गई थी | नींद मुझ से कोसों दूर नजर आ रही थीं | करवटें बदलते बदलते मैं इतना परेशान हो गया था कि अब ऐसा लगने लगा था जैसे बिस्तर मुझे काट रहा था | मैं बिस्तर से उठा तथा कमरे में ही चहल कदमी करने लगा | भरपूर गर्मी का मौसम था परन्तु उससे निजात पाने के लिए मेरे घर में कूलर व एयर कंडीशनर का पूरा इंतजाम था |
अमूमन मैं प्रत्येक दिन रात के १०.३० बजे सो जाता था तथा कूलर के पंखे की आवाज मेरी नींद में कोई बाधा उत्पन्न नहीं करती थी | परन्तु आज अपने कमरे में चहल कदमी करते हुए मुझे कूलर के पंखे की आवाज नगांडो के बजने जैसी महसूस हो रही थी | मेरी पत्नी मेरी अवस्था से बेखबर साथ वाले बिस्तर पर निंद्रा के आगोश में लेटी हुई थी | अगर मैं कूलर बंद करता तो उनकी नींद में खलल पड़ने का अंदेशा था इसलिए उनको उसी हालत में छोड़ मैं अपने ड्राईंग रूम में आ गया |
मुझे अपने ड्राईंग रूम की तनहाईयों में भी चैन न मिला | अत: मैं दरवाजा खोलकर अपने मकान की तीसरी मंजिल की खुली छत पर पहुँच गया | यहाँ मंद मंद हवा चलती महसूस हुई | आधी रात बीत चुकी थी | दूर दूर तक खुला वातावरण होने की वजह से गर्मी का प्रकोप भी कुछ कम लगा | सुबह के पांच बजे तक मैं अपनी छत पर यूं ही घूमता रहा | शरीर में हल्कापन तथा नीदं की खुमारी छाने लगी | अब तक आसपडौस के लोग भी जागने लगे थे इसलिए मैं नीचे अपने कमरे में आकर बिस्तर पर लेट गया और न जाने कब नींद ने मुझे दबोच लिया |
गहरी नींद में अचानक मुझे महसूस हुआ कि मुझे कोई पुकार रहा है, पापा जी, पापा जी |
मैंने बिना आँखें खोले नींद में ही कहा, हूँ |
मुझे सुनाई पड़ा, पापा जी फोन आया है |
मैनें उसी हालत में पूछा, किसका फोन ?
भाई साहब का |
पवन के मुहं से भाई साहब का नाम सुनते ही मुझे एक झटका सा लगा | मैं उठकर बैठ गया | मैनें आँखे खोलकर घड़ी की तरफ देखा | वह ०६-१५ दिखा रही थी | मैं बुदबुदाया, इतनी सुबह, भाई का फोन ! क्या बात है पवन ?
मुझे नहीं बताया | कह रहे थे कि आप से ही बात करनी है |
मैं बिस्तर से उठकर टेलीफोन की तरफ जाते हुए अपने आप से ही बोला, सुबह सुबह ऐसी क्या बात हो गई जो मेरे से बात करने की जरूरत पड़ गई | फिर जल्दी से मैनें फोन का चोगा कान पर लगा कर आशंका वश पूछा, हाँ प्रवीण क्या बात है ?
प्रवीण ने अपने चिरपरिचित अंदाज में शुरू किया,  “पापा जी मैं प्रवीण, नमस्ते |
नमस्ते, हाँ बोल ?
पापा जी साथ वाले ताऊ जी आए थे | बता गए हैं कि बड़ी बुआ जी का स्वर्गवास हो गया है |
मुझे प्रवीण की बात पर एकदम विश्वास नहीं हुआ अत: अपने को आशवस्त करने के लिए दोबारा पूछा, क्या कहा बड़ी बुआ का स्वर्गवास ?
हाँ पापा जी और उन्होंने यह भी बताया है कि अस्पताल से उनका पार्थिव शरीर सीधा निगम बोध शमशान घाट ले जाएंगे |           
मुझे प्रवीण की बात पर अब भी विश्वास नहीं हो पा रहा था अत: अपने भाई ओम प्रकाश को फोन मिलाकर इसके बारे में एक बार और पुष्टि करनी पड़ी | मैं अपने परिवार के सदस्यों के साथ निगम बोध घाट पर २०-०६-०३ को सुबह ०८-३० बजे पहुँच गया | अभी तक वहाँ मेरी बहनजी का पार्थिव शरीर नहीं लाया गया था | मैं एक तरफ एकांत में बैठकर उनके आने का इंतज़ार करने लगा | अकेला एकांत में बैठने से मैं पुराने ख्यालों में खो गया |
सारे भाईयों में खासकर मैं अपनी सबसे बड़ी बहन इंदिरा को अपनी मां के समान मानता था | मानता भी क्यों नहीं | क्योंकि जब इंदिरा बहन की शादी हुई थी तो मैं बहुत छोटा, लगभग छ: वर्ष का था | इसलिए उनकी शादी की कुछ धूमिल सी यादें ही मेरे जहन में याद बनकर अटकी हुई थी |
मैं सत्तरह वर्ष छ: महीने की आयु में ही भारतीय वायु सेना में भर्ती होकर बैंगलौर चला गया था तथा अलग अलग कई स्थानों पर सोलह वर्ष नौकरी करके १९७९ में वापिस घर आ गया था | इस दौरान मैनें अपनी बड़ी बहन से हमेशा सम्बन्ध बनाए रखे | मैं पत्र के माध्यम से उनकी कुशलता का समाचार लेना कभी नहीं भूला था | भारतीय वायु सेना से रिटायरमैंट लेने के बाद जब मैं नारायणा रहने लगा था तो मुझे जब भी मौक़ा मिलता मैं उनसे मिलने शामली अवश्य चला जाता था |
मेरे जीजा जी बहुत ही नेक एवम नरम दिल इंसान थे परन्तु थोड़ी सी भी गल्ती करने वाले के लिए पक्के अड़ियल भी थे | वैसे तो उनका काम धंधा ठीक था परन्तु सालों से उस जमीन के ऊपर, जिस पर वे मकान बनाकर रह रहे थे, मुकदमें के कारण कमाई का अधिकतम मोटा हिस्सा उसमें खर्च हो जाता था | इसलिए उनकी आर्थिक स्थिति मेरी और बहनों तथा भाईयों की तुलना में कुछ नरम थी | और जब ऐसी स्थिति हो तो संभल कर गृहस्थी चलाना ही श्रेयकर होता है |
उनका यह सम्भलकर चलना ही मेरे बड़े भाईयों को अखरता था | हांलाकि मैं जब भी उनके यहाँ जाता था तो मुझे भी उनके यहाँ कुछ खामियां महसूस होती थी परन्तु अपनी बहन के स्नेहमयी शब्द एवम निष्कपट ममतामयी  आचरण को भांपकर मुझे एक अजीब आनंद का आभाष होता था जो उनकी खामियों को महसूस ही नहीं होने देता था | इसका मुख्य कारण, मेरा, मेरे अपने भाईयों के विचारों से भिन्न ‘मोटी पार्टी’ से ज्यादा महत्त्व अपनों एवं मनुष्य के आचरण को देना था | वैसे इस संसार में ऐसा कोई इंसान नहीं तथा कोई घर नहीं जिसमें कोई खामी न हो |      
यादों की कड़ी में मुझे तीन चार दिन पहले १६ जून की यादें ताजा हो आई | मेरी भाँनजी और मेरी बहन इंदिरा की लड़की मनु की सगाई का मौक़ा था | सभी रिश्तेदार इकट्ठा हुए थे | चारों और खुशी का माहौल था | सगाई स्थल पर पहुँच कर मैंने अपने जीजा जी को सामने देखकर, जीजा जी नमस्ते |
अरे भई ‘चरनी’ बड़ी देर लगा दी |
मैं उनका आशय तो समझ गया था फिर भी मजाक के तौर में पूछा, जीजा जी किस में ?
आने में और किस में |
जीजा जी मैनें देर कहाँ लगा दी | देर तो लड़के वाले लगा रहे हैं जो अभी तक पहुंचे ही नहीं | और लड़के वालों से पहले पहुँचने वालों पर आप देरी से पहुँचने का इल्जाम नहीं लगा सकते |
मेरे जीजा देवी चरण जी मेरी बातों पर हँसे बिना न रह सके और अपनत्व दर्शाते हुए मेरा हाथ पकड़ कर खाने के स्टालों की तरफ ले जाते हुए कहा, अच्छा अच्छा ठीक है | चल कुछ नाश्ता वगैरह कर ले |
अपने जीजा जी के साथ जाते हुए जैसे ही मेरी निगाह अपनी बहन जी पर पड़ी मैंने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा, जीजा जी मैं बहन जी से तो मिल आऊँ ?
जीजा जी ने मेरा हाथ छोड़कर हंसकर चुटकी ली, क्यों नहीं साले साहब उनके पीछे ही तो हम हैं वरना हमें कौन पूछता | और मैं अपनी बहन जी की तरफ बढ़ गया तथा मेरे जीजा जी और किसी की आवभगत में लग गए |
बहन जी नमस्ते |
मेरी बहन मुझे देखकर अपने चिरपरिचित अंदाज में चेहरे पर मंद मंद मुस्कान लाकर बड़े ही ममतापूर्ण शब्दों में बोली, भाई आ बैठ जा |
मेरे बैठते ही उन्होंने मेरे सिर पर अपना ममतामयी हाथ फेरकर इधर उधर देखते हुए पूछा, कौन कौन आया है ?
जीजी, सभी आए हैं |
बहन जी जो शामली में हमेशा अपनों के आने की बाट जोहती रहती थी तथा आज अंदर ही अंदर सभी से मिलने को लालायित थी बोली, हाँ भाई ऐसे मौकों पर ही सब का मिलन हो जाता है अन्यथा तेरे सिवाय मुझे मिलने कोई नहीं आता |
उनके मन की सी बात कहते हुए मैनें उनके साथ रजामंदी दिखाई, हाँ बहन जी आज तो सभी परिवार वाले मिल जाएंगे |
मेरे इतना कहने भर से मेरी बहन जी का चेहरा गुलाब की तरह खिल उठा जैसे उन्हें मन की मुराद मिल गई हो | शायद पीहर के सभी व्यक्तियों के दीदार होने की आशा ने उनके मन की उस टीस को दबा दिया था जो शामली रहकर वे हमेशा महसूस करती रहती थी | हालाँकि इंदिरा का स्वास्थ्य कई सालों से कुछ ठीक नहीं चल रहा था परन्तु आज उनको देखकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता था कि वे वर्षों से किसी न किसी मर्ज की दवा ले रही होंगी |
जैसा मैनें बताया था कि मेरे जीजा जी की आर्थिक स्थिति खास मजबूत नहीं थी फिर भी उनके बच्चों की शादी  एक से बढकर एक मोटी पार्टी के यहाँ हुई थी | मनु की सगाई भी एक जाने माने फ़ार्म हाऊस में सम्पन्न होने जा रही थी | सगाई के सभी कार्य सुचारू रूप से पूरे होने के बाद मैनें बहन जी से कहा, जीजी मनु की सगाई तो निबट गई | हम सभी भाई यहाँ मौजूद हैं ही तो लगे हाथ भात भी ले लो ?
बहन जी ने अपनी सहमती जताई, हाँ भाई ठीक है |और उन्होंने अपनी लड़की बबली को आवाज लगाई, बबली आरते का थाल ले आ |
इसके बाद मेरी बहन ने अपनी और बहनों के साथ मिलकर पूरे जोश के साथ भात के गीत गाने में उनका साथ दिया | भात का आरता करते हुए उन्हें अपने सभी पीहर वालों को एक साथ देखकर अपार खुशी का एहसास हो रहा था | ज्यो ज्यों वे टीके कर रही थी त्यों त्यों उनके चेहरे पर संतुष्टता का निखार बढता जा रहा था | अंत में वे इतनी भाव विभोर हो गई कि अपने भाईयों भाभियों एवम भतीजों से अप्रत्याशित रूप से हाथ मिलाकर उनके गले लगते हुए खुशी में सराबोर होकर झूमने लगी | इंदिरा के अपने पीहर वालों के प्रति उसके ऐसे रूप और चेहरे की रौनक देखकर उनके कई अपनों को उनके मन में ईर्ष्या जाग्रत हो गई | यहाँ तक कि इंदिरा की खुद की लड़की बबली अपनी मम्मी जी पर टोंट कसे बिना न रह सकी जब उसने कहा, मम्मी जी को उठकर अपनी समधन से मिलने में कष्ट हो रहा था | अब देखो अपने पीहर वालों से कैसी हंसी-ठट्ठे के साथ मिलकर झूम रहीं हैं |
इतने में किसी ने मुझे झन्झोडा | मेरी तंद्रा टूटी |
मैनें देखा कि मेरी बहन जी का पार्थिव शरीर शव वाहन से उतारा जा रहा था | उनका मृत शरीर अस्पताल से सीधा यहाँ, निगम बोध घाट पर लाया गया था इसलिए उनकी अंतिम स्नान तथा रिश्तेदारों द्वारा चादरें चढाने आदि की रस्म यहीं पूरी की गई | उनके अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी तथा अन्य सामग्री का इंतजाम भी कर लिया गया | इतने में मनोज जी, मेरे दामाद, ने धीरे से मेरे कानों में कहा, पिता जी, परसों की मनु की शादी है |
हाँ है |
अगर बुआ जी को दाग यहाँ लगाया गया तो आगे कैसे होगा ?
वह तो सभी को दिख रहा है कि शादी करना बहुत मुश्किल हो जाएगा | कोई भी काम सुचारू रूप से समपन्न नहीं हो पाएगा |
इस पर मनोज जी ने सुझाव दिया, तो ऐसा क्यों नहीं करते कि बुआ जी के पार्थिव शरीर को दाग गंगा जी के तट पर लगाकर वहीं सब काम पूर्ण कर दिए जाएँ |
मनोज जी का सुझाव मुझे भी जंच गया | मैनें यह सुझाव अपने जीजा जी श्री शिव शंकर जी को बताया | उन्होंने वहाँ मौजूद मौजीज बुजुर्गों के सामने यह प्रस्ताव रखा तो इस से सभी सहमत हो गए | आनन फानन में एक बस का इंतजाम कर लिया गया | इंदिरा का नहाया धोया बेजान शरीर कफ़न में लिपटा बस की पिछली डिक्की में रख दिया गया | इंदिरा के सभी नजदीकी रिश्तेदार खासकर उनकी बहनें बेजार रो रही थी | उनके आंसू रोके नहीं रुक रहे थे | वे अपनी बड़ी बहन का पार्थिव शरीर देख देखकर एक दूसरे के गले लगकर लगातार रोए जा रही थी | वातावरण बहुत ही ग़मगीन हो रहा था | डिक्की का दरवाजा बंद होते ही सभी रिश्तेदारों के साथ इंदिरा की बहनें भी अपनी बड़ी बहन को अंतिम विदाई देने के लिए गंगा घाट पर जाने के लिए बस में चढ गई |
निगम बोध घाट से गंगा घाट के लिए बस दोपहर लगभग बारह बजे निकल पाई थी | इसलिए देहली की भीड़ भा से निकलते निकलते एक बज गया था | अमूमन धूर्त व्यक्तियों के लिए एक कहावत प्रसिद्द है कि ‘आँखों से ओझल तो मन से ओझल’ | परन्तु यहाँ तो आज इंदिरा के अपनो ने ही यह कहावत चरितार्थ कर दी थी | इंदिरा के बेजान शरीर को डिक्की में बंद करके बस में बैठते ही जैसे सब भूल गए की वे किसी अपने को अंतिम विदाई देने जा रहे हैं | सभी के लिए बस के अंदर का माहौल, केवल चंद इंसानों को छोकर, ऐसा बन गया था जैसे वे किसी पिकनिक पर जा रहे थे |
यह माना जाता है कि सफर में पिकनिक या सैर सपाटे पर जाते हुए भूख कुछ ज्यादा ही लगती है | हमारा गंगा जी की तरफ जाने का असली सफर अभी शुरू हुआ ही था तथा लगभग दो बजे थे कि बस में बैठे इंदिरा के रिश्तेदारों तथा उसकी बहनों को भूख का एहसास होने लगा | उनकी आपस में कुछ खुसर-पुसर हुई और बस एक झटके के साथ रुक गई | इससे पहले कि कोई बस रूकने का कारण पूछता ड्राईवर ने पिछला गियर लगा कर उसे पीछे ले जाकर एक होटल के सामने रोक दिया |
बस में आवाज गूंजी उतरो, नीचे उतरो और एक के बाद एक सभी बस से नीचे उतर गए | देवी चरण एवम मनीष की तंद्रा टूटी | वे चारों और आश्चर्य जनक निगाहों से देखने लगे | शायद वे सोच रहे थे कि इतनी जल्दी गंगा का किनारा कैसे आ गया | वास्तव में ही वह गंगा का घाट नहीं परन्तु पेट पाटने का ठिकाना था | लोगों ने उन्हें भी जबरदस्ती बस से उतार कर होटल के एक किनारे में बैठा दिया | बस के सभी यात्री अपने मन के मुताबिक़ खाने पर टूट पड़े | किसी ने कैम्पा ली, किसी ने लस्सी, किसी ने चाय-पकौड़े, किसी ने छोले कचौड़ी, तो किसी ने बर्फी-बालूशाही |
मृतक की बहनों ने बस से उतरते ही होटल की कौने की एक मेज पर अपना कब्जा जमा लेने के बाद काँता ने  बैरे को बुलाया और पूछा, खाने को क्या है ?
मैडम सभी कुछ है |       
शान्ति जिससे भूख बर्दास्त नहीं हो रही थी बोली, जल्दी से कुछ खाने को लिया |
दाल फराई तथा नान ले आ,सुशीला ने आर्डर दिया |
ज़रा जल्दी लाना भईया,क्योंकि भूख सहन नहीं हो रही अंगूरी ने अपनी व्यथा जताई |
अभी ये सब खाने लाने का इंतज़ार ही कर रही थी कि मेरी छोटी बहन शान्ति ने मुझे खड़ा देखकर कहा, भईया जी यहाँ आ जाओ |
मैं अपनी बहनों के साथ वाली कुर्सी पर बैठ गया | अपनी माँ शरीकी बहन की डिक्की में पड़ी लाश और अपने सामने बैठी, उनके कारनामों के कारण, ज़िंदा लाशों को देखकर मेरा मन व्यथित हो गया | क्योंकि वे ज़िंदा लाश जैसा ही व्यवहार करने लगी थी | उनकी चेतना मर चुकी थी तभी तो उन्हें खाने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा था | मैं विचारों में बह गया कि देखो अभी एक घंटा पहले उसकी ये सारी बहनें अपनी बड़ी बहन की मौत पर आसूओं से नहा रही थी |अभी उनकी बड़ी बहन कफ़न में लिपटी बस की डिक्की में लेटी है परन्तु वह इनके मन से ओझल हो चुकी है | भूख के कारण इन्हें रोटियों के अलावा अब कुछ याद नहीं रह गया है |
फराई दाल के साथ सभी ने ऐसे खाना शुरू कर दिया जैसे न जाने कितने दिनों से भूखी थी | उनकी पेट की आग ने उन्हें सब कुछ भुला दिया था, रिश्ते, नाते, सम्बन्ध, प्यार, मोहब्बत और इंसानियत | उनको खाता देख मेरे मन में प्रश्न उठा, क्या यही वे औरतें हैं जो पूरा पूरा दिन निर्जल व्रत रखकर रात का चाँद देखकर ही अपना व्रत तोड़ती हैं ? क्या यही वे बलिदान देने वाली देवी की मूर्तियां हैं ? क्या यही वे इंदिरा की छोटी बहनें हैं जिसका निर्जीव शरीर कफ़न में लिपटा गाड़ी की डिक्की में बंद पड़ा है तथा इंतज़ार कर रहा है उस गंगा के किनारे का जहां दो घंटे बाद उसका अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा और विलीन हो जाएगा पंच तत्वों में | बस फिर रह जाएँगी केवल यादें |
 अनजाने में मेरी आँखों से अश्रु धारा बह निकली और मेरी तंद्रा तब टूटी जब मेरे कानों में आवाज सुनाई दी, भईया जी आप भी खाने के लिए कुछ मंगा लो |
मै अपने आपे में आते हुए बुदबुदाया, हैं, हाँ |
मैनें चारों तरफ नजर दौड़ाई तो पाया कि लगभग सभी खाना खाने में मशगूल थे | अपनी बहन के आग्रह पर मैं खाने की मेज पर तो बैठ गया परन्तु मेरा मन अपनी बहन के अंतिम संस्कार से पहले खाने का मन बिलकुल नहीं था | सोच रहा था कि कैसे क्या करूँ | इतने में एक युक्ति सूझी | मैं यह कहता हुआ उठ गया कि मनीष और जीजा जी, जो अकेले एक कोने में बैठे आंसू बहा रहे थे, से भी पूछ लेता हूँ कि वे कुछ लेना चाहते हैं |
वहाँ से उठने का तो मेरा बहाना था | मुझे पता था कि मनीष और मेरे जीजा जी कुछ भी खाने के लिए कभी भी राजी नहीं होंगे | मैं तो यह मालूम करना चाहता था कि उस होटल पर खाने का क्या नहीं था | पता करके मैं फिर से अपनी बहनों के साथ खाने की मेज पर आ बैठा | बैरे को नजदीक देखकर मेरी बहन अंगूरी ने पूछा, क्या खाओगे ?
चावल राजमां |
मैनें पता तो कर ही लिया था कि चावल छोले नहीं मिलेंगे | बैरे ने भी जवाब दिया, चावल राजमां तो नहीं हैं |
भाई हमारी तरह रोटी दाल फराई लेलो, सुशीला बोली |
मैं अपने दांत नहीं लाया इसलिए रोटी चबा नहीं पाऊंगा |
फिर ?
कोई बात नहीं आगे कुछ देख लूंगा |कहकर मैनें भगवान का शुक्रिया अदा किया कि उसने समय पर एक माकूल रास्ता सुझा दिया था |
सभी खा-पीकर बस में ऐसे बैठ गए जैसे किसी पिकनिक पर जा रहे हों | भरे पेट पर हाथ फेरते हुए सभी एक दूसरे से हंसी, मजाक एवम ठिठोली करने में लग गए | खाली पेट था तो केवल मनीष और देवी चरण का | आँखें नम थी तो केवल उन दोनों की | रोने वालों की तरफ किसी का ध्यान नहीं था | किसी ने सच ही कहा है कि ‘अगर आप रोओगे तो आपके साथ कोई नहीं रोएगा अर्थात आप अकेले ही रोओगे परन्तु अगर आप हंसोगे तो सारा संसार आपके साथ हंसेगा’ |   
बस में धमा चौकड़ी के चलते पता ही न चला कि हम कहाँ चल रहे थे कि अचानक बस के रूकने से खबर लगी कि हम अपने गंतव्य स्थान पर पहुँच गए थे | बस के रूकते ही सभी को एक बार फिर इंदिरा के पार्थिव शरीर के साथ अपने रिश्ते याद आ गए | बस की डिक्की खोलते ही अपने अपने रिश्ते अनुसार सभी इंदिरा के साथ बिताए पलों की याद करके कुछ न कुछ बोलकर अपना अपना शोक प्रकट करने लगे | इन्द्रा की कफ़न में लिपटी लाश देखकर उनको एक बार फिर अहसास हुआ कि वह बेजान शरीर उनके किसी अपने का है | यह आभाष होने से बहनों की आँखों में एक बार फिर अश्रु ढलकने लगे |       
इंदिरा का पार्थिव शरीर गंगा के किनारे ही अग्नि के हवाले कर दिया गया | तीन चार घंटे बाद पूरे विधि विधान से  इंदिरा की राख एवम फूल वगैरह सभी कुछ गंगा में प्रवाहित कर दिया गया | पंडितों से इंदिरा की तेरहवीं, छमाही तथा वर्षी की औपचारिकता भी पूर्ण करवा दी गई जिससे मनू की शादी में कोई विघ्न न रहे |

इसके बाद सभी आए व्यक्ति बस में बैठकर वापिस देहली के लिए रवाना हो चले | यह बताना जरूरी नहीं होगा कि वापिस रवाना होने से पहले सभी, भरे पेट पर एक बार फिर भरपेट दावत खाने के साथ, खुशी खुशी पेडे खाना न भूले थे | क्योंकि बरसी जो पूरी हो गई थी इंदिरा की |   

Sunday, November 19, 2017

मेरी आत्मकथा- 30 (जीवन के रंग मेरे संग) छोटी बहू

पवन एवम अंजू का महावीर  एन्कलेव आना जाना शुरू हो गया था | पवन वहाँ जाता जरूर था परन्तु किसी प्रकार की मेहमान नवाजी नहीं कराता था | वह अपनी ससुराल में न खाना खाता था न टीका माथा ही ग्रहण करता था | समय के साथ उसके छोटे साले का रिस्ता भी पक्का हो गया | रोका रूकाई के लिए चुन्नी लाल ने फोन पर मुझे  भी निमंत्रण दिया | मैं कैसे जा सकता था जब तक मेरे दामाद मनोज तथा मेरा लड़का पवन उन्हें उनकी करनी के लिए माफ नहीं कर देते |
चुन्नी लाल ने मनोज जी को शादी का कार्ड पहुंचवा कर इसकी शुरूआत कर दी | इसके बाद चुन्नी लाल स्वम मुझे  निमंत्रण देने मेरे घर आया तथा कार्ड देकर आग्रह किया, आप को पूरे परिवार के साथ अवश्य आना है |
मैं ने सामाजिक बंधन के ख्याल से बे-मन हाँ तो करदी परन्तु वास्तव में मैं सोच रहा था कि इसकी शुरूआत तो तभी संभव हो सकती है अगर मनोज जी भी इससे सहमत हो जाएँ | चुन्नी लाल की आवाज ने मेरे सोच की कड़ी को तोड़ा, समधन जी कहाँ हैं ?
अंदर कमरे में |
चुन्नी लाल अंदर जाकर, समधन जी नमस्ते |
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मेरे लड़के कपिल की शादी है | आपको आना है |
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संतोष ने चुन्नी लाल की किसी बात का कोई जवाब नहीं दिया तथा उनकी और पीठ करके ही खड़ी रही | मैं अपनी पत्नी की आदतों का तथा व्यवहार करने के तरीकों से भली भांती परिचित था | अगर उसे किसी से नफ़रत हो जाए तो उसके साथ सौहार्द वातावरण बनाने में सालों लग जाता है | संतोष के रवैये को भांपकर मैं ने ही कहा, आप चिंता न करें हम सब आएँगे |
बाहर आकर चुन्नी लाल ने हाथ जोड़कर मेरे से फिर एक बार कहा, आपसे आग्रह है कि पुरानी रंजीस को भूला कर नए सम्बंधों की शुरूआत कर दो |
चिंता मत करो भगवान ने चाहा तो सब दुरूस्त हो जाएगा |
चुन्नी लाल ने अपनी कमजोरी बतानी चाही, देखो जी आप तो एक बड़ी वैश्य महासभा के कार्यकर्ता हो | आप तो सामाजिक बंधन के ताने बाने से अच्छी तरह से वाकिफ हो तथा इस बारे में भी माहिर हो कि सामने वाले से कैसे निबटा जाता है | मैं तो हमेशा नून तेल में ही उलझा रहा | मुझे व्यवहार क्या होता है इसकी पूरी समझ नहीं थी |आपके सद्भावानात्मक व्यवहार ने मेरी आँखें खोल दी हैं | मुझे माफ करके मेरा मान  बढा दो तो आपकी बड़ी कृपा होगी |
मैंने चुन्नी लाल के जुड़े हाथों को अपने हाथ में लेकर कहा, जो बीत गया सो बीत गया | अब उसे भूल जाओ | परन्तु इतना जरूर बताना चाहूँगा कि आज से घर के दामाद को अपने घर में विष्णु भगवान का पदार्पण समझ कर उसका सम्मान करना सीख जाओ | इसके साथ ही भारतीय संस्क्रती ‘अतिथि देवो भव:’के मूल मन्त्र को भी अपना लोगे तो सुखी रहोगे |
मैंने आपकी सीख की गाँठ बाँध ली है | मैं आपको आश्वासन देता हूँ कि अब ऐसी गल्ती कभी नहीं होगी |
ठीक है, ठीक  है आप चिंता न करो |
मैनें मनोज जी के पास भी अपने बड़े लड़के को निमंत्रण देने भेजा था |
अच्छा, क्या कहा उन्होंने |
खुशी खुशी कार्ड ले लिया तथा कहा कि वे अवश्य आएँगे | 
उनके जाने के बाद संतोष ने अपनी आदतन टोंट कसते हुए कहा, समधाने के लड्डू की सोचकर मुहँ में पानी आ गया दीखता है ?
क्यों ऐसा क्यों कह रही हो ?
तभी तो फट से कह दिया कि चिंता मत करो हम सभी आएँगे |
तो क्या एकदम से जड़ काट देता ?
ऐसे लोगों की तो जड़ ही काटनी चाहिए |
सामाजिक रीती- रिवाज भी तो कुछ मायने रखते हैं ?
उन्होंने कौन से रीती रिवाज निभाए हैं, निर्ल्लज कहीं के ?
तो क्या तुम मुझे भी उनकी तरह निर्लज्ज कहलाना चाहती हो ?
आपने ऐसा कोई काम किया ही नहीं |
परन्तु अब तो करने को उकसा रही हो |
संतोष अपना पीछा छुडाने के लिए, अच्छा बाबा माफ करो | मुझ से मत उलझो | मैं साफ़ कह दे रही हूँ कि मुझ से शादी में चलने की मत कह देना |
फिलहाल अपनी पत्नी का मन रखने के लिए मैं ने कहा, मैं ही कौन सा जा रहा हूँ | 
वास्तव में भी मेरा शादी में जाने का कोई विचार नहीं था | मैं तो इस बात की जुगत में था कि मेरा लड़का तथा पुत्र बधू किसी तरह शादी में सम्मिलित हो जाएँ | अपने दामाद मनोज जी के मन की इच्छा जानने हेतु मैं ने उनको फोन मिलाया, नमस्ते जी, कैसे हो ?’
पापा जी यहाँ सब कुशल मंगल से हैं |
आज हमारे यहाँ महावीर  एन्कलेव से आपके भाई साहब आए थे |
मनोज जी थोड़ा सोचने के अंदाज में, महावीर ... एन्कलेव...से ...मेरे..भाई |
मनोज जी की स्थिति भांपकर, शायद आजकल आप भूलते बहुत जल्दी हो |
मनोज जी थोड़े हंसी के पुट में, अच्छा अच्छा आप उनकी बात कर रहे हैं |
मैंने भी अपनी बोली में हंसी घोलकर, हाँ हाँ उन्हीं की |
पापा जी उनका लड़का आया था | हाथ पैर जोड़कर बहुत माफी मांग रहा था |
तो उसे माफी मिली या नहीं |
मनोज जी अपनी सास के लहजे में टोंट कसकर बोले, पापा जी माफी देना तो आपकी फितरत है |
चंदकांत ने भी चुटकी ली, और मेरा अनुशरण करना आपकी फितरत |
इस पर दोनों खूब जोर से हंस पड़े |
समय व्यतीत होने लगा | ज्यों ज्यों कपिल की शादी की तारिख नजदीक आती जा रही थी दोनों तरफ के लोगों की धड़कने तेज होती जा रही थी | चुन्नी लाल के फोन हर दूसरे दिन आने शुरू हो गए थे | किसी तरह समझा बुझाकर मैं ने पवन को कपिल के लगन समारोह में भेज दिया था परन्तु उसने वहाँ से कोई उपहार लेने से यह कहकर मना कर दिया कि वह ससुराल से विदाई के समय एक साथ ही भेंट स्वीकार करेगा | क्योंकि शायद उसका इरादा था कि अगर उसके पापा जी शादी में नहीं गए तो वह भी अपनी ससुराल से कोई भेंट स्वीकार नहीं करेगा |
मैं अपने बेटे के अनमने मन से, मेरे दबाव में आकर, अपने साले की शादी में जाने से खुश नहीं था | मुझे यह चिंता थी कि यह महावीर  एन्कलेव वालों के लिए अपने रिस्ते फिर से हरे बनाने का आख़िरी मौक़ा था और अगर अपने अहंकार की आदत वश अगर वे इस बार चूक गए तो फिर समबन्धों को स्थापित करना बहुत कठिन हो जाएगा | शादी वाले दिन मनोज जी को उनके पूरे परिवार के साथ मैंने यह सोचकर अपने यहाँ बुला लिया था कि अगर सुलह सफाई हो जाए तो निर्णय लेने में किसी प्रकार की देर न हो |
यह प्रकृति का नियम है कि समय के साथ पीढ़ियों में बदलाव आ जाता है | यही कारण होता है कि समय के साथ कोई राजा रंक हो जाता है तो कोई रंक से राजा बन जाता है | उच्च शिक्षा मनुष्य के रहन-सहन, खाने-पीने और सबसे महत्त्व पूर्ण तथा सबसे अहम उसके मन में दूसरों के प्रति व्यवहार कुशलता का संचार करती है | अपने घर के और सदस्यों से अलग अपनी उच्च शिक्षा के कारण ही चुन्नी लाल का लड़का कपिल इस पर खरा उतरा |
शादी वाले दिन मैं अपने घर बैठा सोच रहा था कि उसने अपने लड़के को महावीर  एन्कलेव भेज तो दिया है | वह वहाँ से बरात के साथ विवाह स्थलपर भी चला जाएगा परन्तु जब वह मुझे शादी के पांडाल में नहीं देखेगा तो वह भी वापिस आ जाएगा | क्योकि घर से जाने से पहले उसने मेरे सामने यह शर्त रख दी थी | हालाँकि चुन्नी लाल अपने किए की माफी मांग चुका था परन्तु मुझे अभी भी विश्वास नहीं था कि वह अपनी व्यवहार कुशलता दिखाएगा तथा जाते हुए रास्ते से उसे लिवाकर अपने साथ शादी में सम्मिलित होने के लिए लेकर जाएगा क्योंकि बुरी आदतें बहुत मुश्किल से बदलती हैं |
जैसे जैसे समय व्यतीत हो रहा था मेरे दिल की धड़कने बढ़ती जा रही थी | शाम ढल चुकी थी | बरात का पंडाल में पहुचने का समय होता जा रहा था | अचानक एक कार मेरे दरवाजे पर आकार रूकी | यह सोचकर की कहीं उसका लड़का तो वापिस नहीं आ गया मेरी साँसे थमने को थी कि गाड़ी में से कपिल निकला | उसे देखकर मेरी  की जान में जान आई | वह दुल्हे की पौशाक में था तथा घर से घुड़चढी करके बिना किसी को बताए पंडाल पहुँचने की बजाए सीधा यहाँ आ गया था | घर के अंदर घुसते ही उसने मेरे चरण छूकर कहा, मौसा जी क्या बात है आप अभी तक तैयार नहीं हुए ?
मैंने जवाब देने की बजाय उल्टा प्रश्न दाग दिया, बेटा यह तो प्रचलन है कि घर से घुड़चढी करने के बाद दुल्हा सीधे दुल्हन को लेने ही जाता है फिर तुम यहाँ ?
मौसा जी दुल्हन लाने के लिए सगे संबंधी भी तो साथ होने जरूरी हैं |
वैसे तो तुम्हारे साथ और बहुत हैं परन्तु तुम्हें रीती-रिवाज का भी ध्यान रखना चाहिए था |
मौसा जी हमारे रिश्तेदारों में आप सबसे बड़े हैं अत; रिती-रिवाज आपको ही तो बताने पड़ेंगे |
कपिल मनोज जी से मुखातिब होकर, जीजा जी आप सब भी तैयार हो जाओ |  
हाँ हाँ होते हैं |
इसके बाद कपिल ने फोन मिलाया और धीरे से कहा, मैं मौसा जी के घर हूँ आप भी आ जाओ |
मैं असमंजस में था कि कपिल की सभी रिती रिवाजों को दरकिनार करके रिस्ते जोडने की कोशिश काबिले तारीफ़ है | कपिल के आग्रह से मैं जाने न जाने का निर्णय लेने की ऊहोपोह में था कि चुन्नी लाल आ पहुंचा और कहा, चलो जी, चलो |
चुन्नी लाल ने गर्म जोशी दिखाते हुए मनोज जी को अपने बाहुपाश में जकड़ते हुए कहा, आप तो दुल्हे के जीजा जी भी हो | शादी में आपकी भूमिका तो बहुत अहम् होती है | चलो तैयार हो जाओ |
कपिल का आग्रह मैं टाल न सका | संतोष तो न गई परन्तु उसे मनोज जी तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ शादी में जाना पड़ा | और बिगड़े रिस्ते कुछ हद तक फिर से संभल गए |
अब अंजू दो बच्चों की माँ बन चुकी थी तथा अपनी गृहस्थी का भार थी ठीक से संभालने लगी थी परन्तु मैं ने महसूस किया कि जब भी अंजू कुछ दिनों के लिए अपने पीहर जाती या अपने कुटुम्ब में किसी की शादी में होकर आती तो अपनी ससुराल में उसके वर्ताव में परिवर्तन आ जाता था | वह अपने पुराने स्वभाव द्वेष, ईर्षा, अनादर, गुस्सा करना और काम के प्रति बहाने बाजी दिखाना शुरू कर देती थी | उसके इस स्वभाव को बदलना बहुत आवश्यक था | इसी समस्या के समाधान हेतु एक दिन मैं ने एक दिपक अंजू के हाथ में पकड़ा दिया |
अंजू आश्चर्य से मैं की तरफ देखते हुए, यह क्या है पापा जी ?
एक दिया है |
वह तो है परन्तु मैं इसका क्या करूँ ?
इसको रोशन करो |
अंजू की समझ में नहीं आ रहा था कि उसके ससुर का ऐसा बेतुका काम करवाने का क्या मतलब था | फिर भी अनमने मन से उसने दीपक को रोशन कर दिया था | दीपक की रौशनी में अंजू और मेरा चेहरा रोशन हो गया था | फिर मैंने कहा, बेटा, हम इसी की रोशनी में घर के सारे काम किया करते थे यहाँ तक की अपनी पढाई भी |
अंजू असमंजस में थी कि उसके ससुर करना क्या चाहते हैं इसलिए उसके मुंह से निकला, तो |
मैं ने अबकी बार बिजली के बल्ब की और इशारा करके कहा, क्या तुम इस बल्ब से दूसरा बल्ब रोशन कर सकती हो ?
अंजू को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि माजरा क्या है जो उसके ससुर पहेलियाँ सी बुझा रहे हैं | उसने कुछ सोचकर कहा, नहीं |
मैं ने फिर एक और प्रशन दाग दिया, क्या तुम इस दिये से और दिये रोशन कर सकती हो ?
अंजू ने इस बार बिना देर लगाए झट से कह दिया, हाँ पापा जी |
अंजू मैं तुम्हें यही समझाने की कोशिश कर रहा हूँ कि जैसे एक बिजली का बल्ब रोशनी तो दे सकता है परन्तु अपने दूसरे साथियों को रोशनी देने का सहारा नहीं बन सकता | परन्तु एक दीपक खुद तो रोशनी देता ही है वह दूसरे दीपकों को भी रोशन कर सकता है | इसी प्रकार मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे मन के अंदर जो बल्ब रूपी अहंकार एवम द्वेष भावना बसी हुई है जिसने तुम्हें अपनों से बिल्कुल अलग कर रखा है उसे बुझा कर दीपक रूपी भावना अपने मन में धारण करो जिससे अपने साथ साथ दूसरों को भी सौहार्द पूर्ण वातावरण नसीब हो जाए | अब तो तुम  मेरे कहने का तात्पर्य समझ गई होंगी कि असली खुशी दूसरों को खुश करने से ही मिलती है और खुश होने वाले व्यक्ति के दिल में तुम हमेशा के लिए बस जाते हो | इसका मैं तुम्हें एक उदाहरण देता हूँ | 
हम हिंदुस्तानियों को मेहमान नवाजी की महान परम्परा विरासत में मिली है | यहाँ मेहमान को भगवान का दर्जा दिया जाता है | हमारे पूर्वजों का मानना था कि वे लोग बहुत भाग्यवान होते हैं जिनके घर मेहमान आते हैं | तभी तो यहाँ की संस्कृति में लिखा गया है कि ‘अतिथि देवो भवः’|
वैसे तो तुम्हारी सास और मेरी पत्नी संतोष भी मेहमान नवाजी में अति उत्तम हैं | मैं पिछले ४२ वर्षों से, जब मेरी शादी हुई थी, देख रहा हूँ कि वे प्रत्येक मेहमान पर, बिना किसी प्रकार के भेदभाव के अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार रहती हैं |कभी कभी तो मुझे उनकी मेहमान नवाजी पर खीज सी भी आने लगती है परन्तु उनके हाथ के इशारे को समझकर, कि कुछ नहीं होता, मुझे संभलना पडता है | अपनी पत्नी द्वारा की गई मेहमान नवाजी को देखकर, मेहमान के चले जाने के बाद, कभी कभी मैं उन पर टोंट भी कस देता हूँ कि भला आजकल ऐसा कहाँ होता है | परन्तु मेरा यह भ्रम हाल ही में टूट गया |      
साल का आख़िरी महीना था | स्कूलों में बड़े दिनों की छुट्टियाँ हो गयी थी | पहाड़ों पर बर्फ गिरने के कारण देहली में बर्फीली हवा ने कहर बरसाना शुरू कर दिया था | जिससे देहली का मौसम बहुत ठंडा हो गया था | मेरे दामाद मनोज कुमार एवं उनके बच्चों ने बैद्यनाथ, बौद्ध गया, पटना, इलाहाबाद, अयोध्या, काशी तथा लखनऊ इत्यादी स्थानों का घूमने का प्रोग्राम बना लिया | जब उन्होंने मेरे से पूछा तो मैनें भी उनके साथ जाने की हामी भर दी | क्योंकि देहली की सर्दी ठिठुरन भरी थी जबकि भ्रमण वाले स्थानों पर, समाचार पत्रों के अनुसार, काफी गर्म वातावरण बताया जा रहा था |
रेलवे के नारे, हल्का सफर करो, के तहत हमने गर्म कपडे भी बहुत कम लिए तथा सफर में सर्दी से बचने के लिए रेल के एयरकंडीशन डब्बों में ही जाना उचित समझा | आजकल की सुविधाओं के चलते हमने सफर पर चलने से पहले ही सभी जगह से आने जाने की रेलगाड़ी की रिजर्वेशन के साथ साथ ठहरने की जगह भी सुनिशचित कर ली थी | मुझे देहली रेलवे स्टेशन पर पहुंचकर पता चला कि हम सब मिलकर कुल तेरह यात्री हो गए थे | जिसमें दो बच्चे तथा बाकी सभी तेरह वर्ष से अधिक उम्र के थे |
हंसते-खेलते, खाते-पीते, गाड़ी से बाहर के दृशयों का नजारा देखते हम सबसे पहले बैद्यनाथ पहुँच गए | इस स्थान पर महादेव शिव जी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक यहाँ पर स्थित है | इसके बारे में कहा जाता है कि लंकापति रावण ने एकबार शिव की घोर तपस्या की थी |
इसके बाद हम बोधगया, पटना, इलाहाबाद इत्यादि होते हुए बनारस पहुँच गए |
एक गुलशन नाम का व्यक्ति है जो मनोज जी के घर के पास ही रहता है | दोनों में अच्छी जान पहचान है क्योंकि दोनों ही रामलीला कमेटी के कार्यकारी सदस्य हैं | जब गुलशन को पता चला कि मनोज अपने परिवार के साथ काशी भ्रमण को जा रहा है तो उसने काशी में रह रहे अपने भांजे का पूरा पता तथा टेलीफोन नंबर देते हुए कहा कि आप उससे बात कर लेना वह उनके ठहराने का पूरा प्रबंध करा देगा | साथ ही गुलशन ने अपने भांजे को भी सूचित करते हुए कहा, काकू, मामा जी सह परिवार, काशी की यात्रा पर आ रहे हैं उनका ख्याल रखना |
काकू के दो मामा जी हैं और दोनों ने उसका घर देखा हुआ था | हालांकि काकू को अपने मामा जी का ऐसे कहना कुछ अटपटा सा लगा परन्तु वह यह सोचकर चुप रहा कि उसके मामा जी ने अपनी आदत अनुसार मजाक किया होगा | वाराणसी पहुँच कर मनोज ने काकू से फोन पर पूछा, काकू आप कहाँ हो |
काकू ने किसी अनजान व्यक्ति को अपना नाम लेते सुनकर अचंभित होकर प्रशन किया, माफ करना मैनें आपको पहचाना नहीं, आप कौन हैं ?
मैं मामा जी |
काकू को घोर आशचर्य तो होना ही था अत: पूछा, कौन से मामा जी ?
मामा नंबर तीन |
काकू और भी असमंजस से बोला, मामा नंबर तीन |
अरे भाई हम देहली से आए हैं |
देहली के नाम से काकू को अपने मामा जी गुलशन द्वारा कही बात याद आ गयी | उसने बड़ी नम्रता से कहा, ओ हो मामा जी मुझ से बड़ी गलती हो गयी | अगर मुझे यह अंदाजा होता कि आप(मनोज मामा जी) आ रहे हैं तो मैं  आपको स्टेशन पर लेने ही आ जाता | मैं तो गुलशन मामा जी की बातों को मजाक में ले गया था |
फिर काकू ने फोन पर मनोज जी को कहा, मामा जी आप गाड़ी वाले को फ़ोन दे दो मैं उसे समझा दूंगा कि यहाँ कैसे पहुंचेगा |      
काकू बेहतर रहेगा कि हम पहले सीधे होटल ही चले जाएँ इसलिए आप अभी तो ड्राईवर को उसी होटल का नाम बता देना जहां हमें रूकना है | 
हाँ मामा जी वह होटल हमारे घर के पास ही है | मैं आपको गली के बाहर ही खडा मिलूँगा |
मनोज अपने पूरे लाव-लशकर के साथ काकू के द्वारा बताए गए स्थान पर पहुंच गया | वहाँ काकू भी अपने कई साथियों के साथ हमारी प्रतीक्षा कर रहा था | मैं अभी इस असमंजसता से निकला भी नहीं था कि आखिर काकू है कौन कि वहाँ खड़े लोगों में से एक इकहरे बदन के लडके ने आगे बढकर, शायद यह देखकर कि मैं अपने ग्रुप में सबसे बुजुर्ग था, मेरे चरण छू लिए | मनोज ने काकू को पहले कभी नहीं देखा था अत: वह सोच रहा था कि उसे कैसे पहचाना जाए | इसी प्रकार काकू सोचा रहा था कि इनमें से मामा जी कौन से हैं |
काकू के चेहरे पर उसी प्रकार की भाव भंगिमा थी जैसे उस शिष्य द्वारा दर्शाई गयी थी जब वह आश्रम में पहुंचा था तथा गुरू और गोविन्द दोनों को सामने खडा पाया था | वह नहीं जानता था कि गुरू कौन है और गोविन्द कौन है | शिष्य की दुविधा को भांपकर गुरू ने इशारा कर दिया था कि दूसरा व्यक्ति ही गोविन्द है |      
काकू के द्वारा मेरे चरण छूना यह तो दर्शा गया था कि काकू कौन है परन्तु काकू को पता नहीं चला था कि मामा जी कौन से हैं | मैनें काकू की मनोइच्छा को भांप कर उसकी दुविधा का अंत करते हुए मनोज जी की तरफ इशारा कर दिया | और जब काकू मनोज की तरफ बढ़ा तो उसके झुकने से पहले ही मनोज ने उसे गर्मजोशी के साथ अपने सीने से लगा लिया था |
इस बीच जब काकू के साथियों ने गाड़ी से हमारा सामान नीचे उतारना शुरू कर दिया तो मनोज इधर उधर देखकर विस्मय से बोला, यहाँ होटल कहाँ है, नजर नहीं आ रहा ?
अंदर गली में है, काकू का जवाब था |
काकू की बात सुनकर जब हम सभी अपना सामान उठाने लगे तो उसके साथियों ने ऐसा करने के लिए मना करते हुए कहा, आप सभी कमरों में जाकर तरोताजा हो जाओ तथा आराम करो | सामान की चिंता मत करो इसे हम आपके कमरे में पहुँचा देंगे |
काकू ने हम सभी को गली के एक मकान में ले जाकर एक बड़े से हाल में ठहरा दिया | यह चार मंजिला मकान था | यहाँ पहले से ही पूरा इंतजाम किया हुआ था | बिस्तर बिछे हुए थे | मकान में स्थित चारों गुसलखाने सभी जरूरी सामान जैसे साबुन, तेल, कंघा, शैम्पू, ठंडा-गरम पानी, बाल्टी तथा मग इत्यादि से लैस थे |सभी के साथ मनोज भी यह देखकर शायद आश्चर्य चकित था क्योंकि वह मकान किसी हालत में भी होटल नहीं लग रहा था | अपनी दुविधा का निवारण करने के लिए मनोज ने अपना मुहं खोला ही था कि उनके मन की बात भांपकर काकू खुद ही बोल उठा, मामा जी अपनों को होटल में नहीं घर में ठहरा कर सेवा की जाती है |
काकू के ये शब्द मेरे जहन में समा गए | कहते हैं दिल का राज बता देता है असली नकली चेहरा | मैनें यही सोचते हुए काकू के चेहरे को निहारा तो पाया कि उसकी आँखों के रास्ते उसके दिल के निस्वार्थ भाव एवं हमारे प्रति मेहमान नवाजी की लालसा, निर्मल जल में सीप की तरह, साफ़ झलक रही थी | इतनी थोड़ी उम्र और कितने नेक, उच्च एवं सुलझे हुए विचार, मेरा मन गदगद हो उठा |
मैं अपने में ही खोया था कि काकू की आवाज कानों में पडी | वह हाथ जोड़े खडा कह रहा था, आप सभी लंबे सफर से थक गए होंगे | हाथ मुहं धोकर तरोताजा हो जाईये | मैं चाय नाश्ता भिजवाता हूँ |
बिना किसी की सुने वह झट से ऊपर की मंजिल पर चढ गया जहां उनकी रसोई थी | आधा घंटे बाद एक हाथ में चाय की केतली तथा दूसरे हाथ में कपों से भरी थाली लिए एक सुन्दर सी, सादा कपडे धारण किए, बिना किसी श्रृंगार के, इकहरे बदन की, चेहरे पर मंद मंद मुस्कान बिखेरती एक लडकी कमरे में दाखिल हुई |उसके पीछे काकू नाश्ते की प्लेट थामें अंदर आया | सभी सामान मेज पर रखने के बाद उस लडकी ने कपों में चाय भरकर तथा नाश्ता छोटी प्लेटों में रखकर सभी को पकडाना शुरू कर दिया | सभी यह अंदाजा लगाने में मशगूल थे कि वह लडकी कौन हो सकती है ? इस संशय का निवारण स्वंम काकू ने किया, यह मेरी पत्नी किरण है |
मैं तो अभी तक इसी भ्रम में रहता था कि मेरी बेटी प्रतिभा इतनी उम्र की नहीं लगती थी कि वह तीन बच्चों की माँ है जिनमें सबसे बड़ी लडकी उन्नीस वर्ष की हो गयी है | परन्तु मेरे क्या सभी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब हमें बताया गया कि किरण दो बच्चों की माँ है |क्योंकि वह अभी भी बिन ब्याही एक कपिल की तरह नजर आ रही थी |
सफर की थकान के बाद प्रेमभाव से परोसी गयी घर में बनाई चाय व नाश्ता पाकर हमारे सभी के शरीर स्थिल से हो गए तथा नींद की झपकी ने अपने आगोश में ले लिया | इतना काम एवं सेवा करने के बाद भी शायद काकू और किरण पर थकावट अपना बर्चस्व स्थापित नहीं कर पाई थी तभी तो रात के आठ बजते बजते ही उन दोनों ने रात के खाने का सारा सामान लाकर मेज पर लगा दिया था |                          
खाना खाते हुए हमारे में से दो औरतों ने जब प्याज के छोंक से बनाई सबजी सेवन करने से इनकार कर दिया तो किरण अपने आप में शर्मिंदगी महसूस करते हुए कई प्रकार से माफी माँगने लगी | आनन फानन में उसने, उन औरतों के लिए जो प्याज का सेवन नहीं करती थी, के लिए दूसरे खाद्य पदार्थों का इंतजाम कर दिया | उस दिन के बाद जब तक हम उनके घर ठहरे उस घर में प्याज लहसून का इस्तेमाल नहीं किया गया | बल्कि, हो सकता है अपने मेहमानों का मन रखने के लिए, किरण यह कहते न थकती थी कि उसे नहीं पता था कि बिना प्याज के छोंक के भी सबजी इतनी स्वादिष्ट बन सकती है | जैसे वही गुरू वास्तव में गुरू कहलाने लायक होता है जो पहले अपने आप उन आदर्शों को अपनाए जिनको वह अपने शिष्यों द्वारा ग्रहण करने की इच्छा रखता है |
हर रोज, अपने नाम को सार्थक करते हुए, किरण सुबह के उगते महावीर  की तरह अपने मुख मंडल पर मुस्कान की किरण बखेरती हुई चाय के साथ आती  थी और डूबते महावीर  की तरह हमारी सेवा करते करते रात को थककर सोती थी | काकू ने भी अपना काम धंधा भुलाकर हमारे घूमने, नहाने, खाने, गंगा घाट पर आरती दर्शन यहाँ तक की काशी विशवनाथ मंदिर में भगवान ज्योतिर्लिंग शिव के दर्शन कराने के लिए अति विशिष्ट व्यक्तियों के गेट से अंदर जाने का भी इंतजाम किया जिससे हमें किसी प्रकार की कोई असुविधा न हो |
काकू ने बनारस के आसपास ऐसा कोई स्थान नहीं छोड़ा जो हमें दिखाया न हो तथा ऐसा कोई खाद्य पदार्थ, जो काशी में नामी माना जाता था, खिलाया न हो | यहाँ तक कि वह हमें बनारस के प्रसिद्ध पान का स्वाद भी कराना नहीं भूला |हम काकू के परिवार के द्वारा प्रदर्शित, चेहरे पर बिना किसी शिकन लाए, सेवा भाव के कायल से हो गए थे |
तीन दिनों बाद काकू और किरण से बिछोह को सोचकर मेरे शरीर में सिरहन सी दौड रही थी | सोच नहीं पा रहा था कि उनकी मेहमान नवाजी के एवज में उन्हें क्या तोहफा दिया जाए जिससे मैं कुछ ॠण मुक्त हो सकूं | मुझे संसार की हर वस्तु उनके द्वारा किए आदर सत्कार के सामने तुच्छ नजर आ रही थी | यहाँ तक की आसमान के चाँद सितारे भी काकू-किरण के श्रद्धा भाव की चमक के सामने फीके महसूस हो रहे थे |
फिर भी कुछ तो करना था | हमने, जबरदस्ती काकू और किरण की मर्जी के खिलाफ, किया तो जरूर परन्तु यह सोचकर अपने मन में अब भी ग्लानि हो रही है कि उन्होंने कहीं हमारी करनी को अन्यथा न ले लिया हो |
वर्त्तमान युग के प्रचलन को देखते हुए मेरा जो विचार बनता जा रहा था कि भारत देश, जो अपनी मेहमान नवाजी और अतिथि सेवा के लिए एक समय विश्वभर में प्रसिद्ध था, आज अपनी यह खूबी खोता जा रहा है | मेहमानों का आदर सत्कार करना तो दूर आज हम अपने पवित्र संस्कारों को भूलकर अपने अतिथियों से कन्नी काटने की जुगत भिड़ाना शुरू कर देते हैं | परन्तु काकू और किरण के व्यवहार से मेरा यह मत खंडित होकर धराशाही हो गया था |मुझे गर्व महसूस होने लगा था कि आज भी हमारे देश भारतवर्ष में ऐसे लोग मौजूद हैं जो अपने देश की परम्पराओं एवं संस्कारों को जीवन्तता प्रदान करने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने को उतारू हैं और मौक़ा मिलने पर वे चूकते नहीं | इन्हीं विचारों के चलते मेरी अंतरात्मा से काकू और किरण के लिए शत शत प्रणाम का उद्धघोष निकलता महसूस हुआ |             
    
इसके बाद मैं ने किरण एवं काकू का उपरोक्त फोटो अंजू की तरफ बढाते हुए कहा, मैं आज भी इनका यह फोटो श्रद्धा भाव से देखता हूँ | इन्हें कभी भूला नहीं पाऊंगा |
अंजू किंकर्तव्य मूढ़ कुछ देर तक उस फोटो को एकटक देखती रही | शायद उसने सोचा कि उसके ससुर के मन में किसी अनजान व्यक्ति ने अपने स्वार्थहीन कर्म से इतनी श्रद्धा भर दी है कि उसे पूजने से लगे हैं और एक मैं हूँ जो उनकी मेरे प्रति दिखाई गई सदभावना और सहायता को कोई महत्त्व नहीं देती | उसका मन ग्लानी से भर गया तभी तो वह रोते हुए अपने ससुर के चरणों में गिरकर गिडगिडाई, पापा जी मुझे माफ कर दो | आपने मेरी आँखें खोल दी हैं | मुझे समझ आ गया है कि घर में आपसी प्रेम भाव ही उन्नती का मार्ग होता है | आज से मैं प्रण करती हूँ कि यही मार्ग अपनाऊंगी |
इन्हीं दिनों पवन को सदभावना का सबक सिखाने का एक ईश्वरीय चमत्कार भी हुआ | उसके साथ एक छोटी सी दुर्घटना हो गई | वह अपने स्कूटर से अचानक औंधे मुंह जमीन पर गिर पड़ा | उसके हाथ पैरों में चोट के साथ होठों में दांत गडने से उनमें आरपार छेद हो गया | पवन यह दर्द बर्दास्त नहीं कर पा रहा था | एक माँ अपनी संतान का दुःख सहन नहीं कर सकती | अपनी संतान के शरीर के घाव एक माँ को बेचैन कर देती है | अपने पुत्र का दुःख देख वह पवन के सिर को अपनी गोदी में रखकर उसे सांतवना देने लगी | अपनी माँ की ममता से सराबोर हो पवन अपने को संभाल न सका और छोटे बच्चों की तरह उनसे लिपट कर मम्मी जी मम्मी जी कहते हुए फूट फूट कर रोने लगा | माँ पीछे कैसे रह सकती थी | ईशवर की अनुकम्पा से गंगा जल की तरह आसूँओ की बहती धारा ने पुराने मन के मैल धोकर दोनों के मन को निर्मल, स्वच्छ और ममतामयी बना दिया |    
इस प्रकार मेरी निडरता, साहस, सद्भावना, सहन शक्ति, साम, दाम, दंड और भेद की नीति तथा ईश्वरीय चमत्कार रंग ले आया था | सेर को सवा सेर टकरा चुका था | सभी को, जिनको जैसे सबक मिलना चाहिए था मिल चुका था | इसके बाद सभी के जीवन में खुशहाली का संचार प्रारम्भ हो गया |