शादी
दिनेश अपने छोटे भाई की बात पर भड़क गया | अरे झूठी थाली में भी कोई
दूसरा खाना कैसे खा सकता है | क्या मेरे लड़के के रिश्ते
आने बंद हो गए हैं जो हम नए रिश्ता आने का इंतज़ार नहीं कर सकते | अभी उसकी उम्र भी तो नहीं
निकली जा रही |
इस पर पास बैठी दिनेश की पत्नी बोल पडी, जी पहले छोटे भाई की पूरी
बात तो सुन लो कि वह ऐसा प्रस्ताव क्यों लाया है |
अर्जुन का कुछ ढाढस बढ़ा और उसने बताया कि उस
दिन लडकी शादी के नाम पर डरी हुई थी इसलिए उसने बचने के लिए मन मनघडंत कहानी बना
दी थी |
दिनेश झल्लाया, “नहीं-नहीं मैं इस कहानी
को नहीं मानता |”
दिनेश की माँ जो अभी तक सभी का वार्तालाप सुन
रही थी ने अपने मन की बात बताई, “देखो बेटा ऐसे समय में
लडकी का मन बहुत डरा हुआ होता है | वह सोचती है न जाने दूसरे
घर जाकर उस पर क्या बीतेगी | वैसे उससे गलती तो हुई थी परन्तु यह लडकी सुन्दर, पढी-लिखी, नौकरी लगी हुई, नजदीक की रहने वाली, खानदानी है | मुझे तो वह देखते ही पसंद
आ गयी थी और अब भी पसंद है |”
आखिर में माँ-बाप, दादा-दादी, चाचा-चाची तथा लड़के ने
भी रिश्ता जोड़ने की हामी भर ली | देखने-दिखाने का दौर चला | एक तरफ लड़के वालों ने कुछ
शर्ते रखी तो दूसरी तरफ लड़के वालों लडकी वालों को भी कुछ शर्तें माननी पड़ी | इसी तरह कुछ बातों में
लड़के ने भी अपनी मनमानी चाही तो लडकी कहाँ पीछे रहने वाली थी | उसने साफ़ कर दिया कि वह
घूंघट नहीं करेगी, नौकरी नहीं छोड़ेगी, आगे पढाई भी करेगी, सलवार कुर्ता पहनने की
मनाई नहीं होगी, यदा-कड़ा पीहर जाने की मनाही नहीं होगी
इत्यादि और रिश्ता पक्का हो गया |
दोनों ओर शादी की तैयारियां पूरे जोरशोर से
प्रारंभ होने लगी | जल्दी ही बाजे, ताशे, नपीरी, ढोल, घोड़ी-बग्गी, कपड़े-लत्ते, चीज-बस्त, विवाह स्थल सब बुक कर
दिए गए |
शादी वैसे तो सुचारू रूप से संपन्न हो गई
परन्तु जैसा अमूमन होता है रूसा रूसवाई, छोटा – मोटा कहन सुनन, नुक्ता-चीनी से यह शादी
भी अछूती न रह सकी | लडकी सही समय पर विदा हो गई और सभी ने सुखचैन
की सांस ली |
ससुराल में नव नवेली दुल्हन का भावभीना स्वागत
तो हुआ परन्तु मस्तानी को वहां अपनापन महसूस नहीं हुआ | घर के सभी सदस्यों का एक
साथ बैठना तो दूर कोई किसी से बात करने को राजी ही नहीं दिखाई देता था | एक-एक करके खाने के समय
तो दर्शन हो जाते थे जैसे ईद का चाँद दिखाई देता है वरना कोई अपने कमरे से बाहर ही
नहीं निकलता था | घर में किसी की हंसी तो गूंजती सुनाई ही नहीं
पड़ती थी बल्कि हमेशा मुर्दानगी का आभाष होता था |
स्वछंद वातावरण और हंसी खुशी के माहौल में पली
बढ़ी मस्तानी का तीन दिनों में ही ससुराल में दम सा घुटने लगा | परन्तु उसने चुपचाप यह
सहन कर लिया क्योंकि इसके बाद उन्हें हनीमून के लिए बाली (आस्ट्रेलिया) जाना था और
वह इसकी तैयारी में लगी हुई थी |
मस्तानी :- क्यों जी कितने दिन का प्रोग्राम है
?”
“एक हफ्ते का |”
“यहाँ तो गर्मी का मौसम है क्या वहां भी गर्मी
होगी ?”
मदन :- हाँ गर्मी के कपड़े ही रखना |
“ठीक है |”
“क्या ठीक है, हम वहां हनीमून के लिए जा
रहे हैं | ऐसे यादगार पलों के लिए तुम्हारे पास पहनने के
लिए कपड़े है भी |”
मस्तानी :- हाँ-हाँ कई नए बढ़िया सूट व साड़ियाँ
हैं |
मदन थोड़ा रोमांचित होकर अरे भई ऐसे मौके पर
रोमांस भरा माहौल तो बनना चाहिए |
मस्तानी :- तो फिर क्या करूँ ?”
मदन ने सलाह दी कि तेरे घर चलते हैं | वहां के बाजार से हनीमून
के दौरान पहनने लायक कपड़े खरीद कर ले आएँगे | उन्होंने मस्तानी एवं खुद
के लिए निक्कर, टी-शर्ट, जूते, बनियान इत्यादि अपनी
पसंद का सामान खरीद लिया | मस्तानी ने उसके लिए
खरीदी गई निक्कर पहनने पर एतराज भी उठाया परन्तु मदन के आगे उसकी एक न चली |
दोनों बाली में हनीमून मनाकर खुशी-खुशी घर लौट
आए | घर में पैर रखते ही मस्तानी की सारी खुशी काफूर हो गई जब उसने
देखा कि घर में उपस्थित देवर, नन्द, दादी जी और पापा जी अपने-अपने
कमरों की खिडकियों से झांककर उनको आया तो देख रहे है परन्तु कोई भी बाहर आकर उनके
आने की खुशी जाहिर नहीं कर रहा | मस्तानी ने भी अपना सामान
समेटा और एक अनजान बस्ती की तरह बूझे मन से अपने कमरे में समा गई |
अकेली बैठी मस्तानी चिंतन करने लगी कि आज अगर
वह कहीं से भी अपने पीहर आती तो घर के सभी सदस्य उसे घेर कर प्रश्नों की झड़ी लगा
देते और बीच –बीच में ऐसे मजाक करते कि हसीं के फव्वारे बंद ही न होते | आया जान आस पडौस के हम
उम्र भी अपनी भागीदारी अवश्य निभाते | परन्तु यहाँ तो अपने घर
में ही वे अनजान से बनकर रह गए थे | उसका मन विषाद से भर गया | फिर भी थकी हारी होने की
वजह से वह जल्दी ही निंद्रा की आगोस में चली गई |
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