Wednesday, September 13, 2017

मेरी आत्मकथा - 2 (जीवन के रंग मेरे संग)

मेरी आत्मकथा -2 (जीवन के रंग मेरे संग)  
दसवी कक्षा पास करने के बाद मेरे अन्दर बहुत बड़ा बदलाव आया | उन दिनों मेरे भाई ज्ञान चंद  ठेकेदारी का काम करने लगे थे | इससे पहले वे पिताजी के साथ गांव में ही जनरल मर्चेंट का काम करते थे |  हमारी दूकान का सामान नजफ़गढ़ की मंडी से आता था | मंडी क्या पूरे इलाके में ज्ञान चंद के नाम से सभी परिचित थे | वे दिल के बड़े ही रंगीन थे | पैसों की उनके पास कोई कमी थी | और अब ठेकेदारी में तो उनकी जेब हमेशा रूपयों से भरी रहती थीखर्च करने के लिए  वे मुझे बिना मांगे ही पैसे दे दिया करते थे | खुद तो वे पिक्चर देखने के शौक़ीन थे और पैसे थमाते हुए मुझ से भी यह कहना नहीं भूलते थे की जा ऐश कर और नई पिक्चर  लगी है उसे देखकर  | साथ ही साथ पास खड़ी मोटर साईकिल को देखकर अपनी गर्दन व आखें घुमाकर मुझे इशारा कर देते थे जैसे कह रहे हों कि यह भी तुम्हारे लिए है | उनका इशारा समझ कर मेरे पंख लग आते थे और मैं भरी जेब के साथ मोटर साईकिल पर बैठ हवा से बातें करने लगता था |
उन दिनों मेरे साथ मेरे ही गांव के तीन चार लड़के और पढ़ते थे | योगेन्द्र पाल सुधाकर के परिवार वाले काफी अच्छे  ओहदो पर लगे हुए थे अत: सुधाकर को भी जेब खर्च के लिए पैसों की कोइ कमी  रहती थी | सिद्धार्थ सक्सेना के पिता जी एक स्कूल के हेडमास्टर थे तथा उसकी माता जी भी मास्टरनी लगी हुई थी | इसलिए उसे भी जेब खर्च को खूब पैसे मिला करते थे | दसवीं में आकर हम तीनों की तिकड़ी बन गई | हम तीनों मौज मस्ती मारने लगे | रोकने वाला कोइ था नहीं | हम स्कूल से अनुपस्थित होकर पिक्चर देखने लगे और पढाई लिखाई  में कमजोर होते चले गए | हायर सैकेंडरी के परीक्षा परिणामों ने बता दिया की हमने क्या किया था | मेरे दोनों साथी फेल हो गए थे तथा मेरी कम्पार्टमेंट आई थी | मुझे इससे बहुत भारी झटका लगा | मेरे लिए यह शर्मिन्दगी की बात थी | मैं  किसी निष्कर्स पर नहीं पहुंच पा रहा था कि  आगे क्या किया जाए |
उन्हीं दिनों भारतीय वायु सेना में भरती चल रही थी | मैनें कई सूत्रों से पता कर लिया कि वायु सेना में नौकरी करते हुए पढाई भी की जा सकती है | अपनी मनोइच्छा की पूर्ति को ध्यान में रखकर मैनें कमाई के साथ पढ़ाई करने की लालसा लिए भारतीय वायु में भर्ती होना ही उचित समझा |
भारतीय वायु सेना में भर्ती होने का दूसरा कारण था मेरे दिलो दिमाग पर १९६२ के चीन  हिन्दुस्तान के बीच युद्ध का प्रभाव होना |
चीन के आक्रमण को देखते हुए भारत सरकार ने अपने सभी मिलिट्री के जवानों की छुट्टियां रद्द कर दी थी | सभी जवान चाहे कैसी भी या किसी भी स्थिति में क्यों हो अपने बीबी, बच्चे, माता-पिता तथा सभी काम त्याग कर अपनी अपनी यूनिटों को जाने लगे | रेलवे ने जवानों की सहूलियत के लिए हर रेलगाड़ी में उनके लिए स्पेशल बोगियां लगा दी थी | उस दौरान मैनें देखा था कि भारत के हर वर्ग, हर उम्र तथा हर वर्ण के लोगों ने एक जुट होकर सीमा पर जाने वाले जवानों की किस प्रकार हौसलाफजाई की थी | सभी बच्चे, बूढ़े, जवान, किशोरी, तथा औरतों ने  अपने अपने तरीकों से हर जवान को उत्साहित किया था |
अपने घरवालों तथा देशवासियों  द्वारा भावभीनी विदाई देने को महसूस करके जवानों की चौड़ी छाती फूलकर दोगुनी हो जाती थी तथा वे अपना कर्तव्य निभाने खुशी खुशी आगे बढ़ जाते थे | सफ़र के दौरान हर स्टेशन पर लोगों ने जवानों के खाने के लिए बिस्कुट, टॉफी, फल, यहां तक की होटल वालों ने खाना भी बिना कीमत लिए दिया था | मतलब हर तरफ से जवानों की होसलाफजाई करते हुए ऐसा माहौल बनाया जा रहा था जैसे भारत की सारी जनता कहना चाहती हो कि जवानों आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं |
फिल्म जगत के साथ साथ भारत की कोकिला कहे जाने वाली लता मंगेशकर ने 'खुश रहना देश के लोगो अब हम तो सफ़र करते हैं ' का गाना जवानों को सुनाकर उनको अदम्य साहसी बनाने में अमूल्य योग दान दिया था | मेरे मन में आगे पढ़ने की लगन तथा जवानों के प्रति देशवासियों का लगाव देखकर ही मैंने भारतीय वायु सेना में जाने का निश्चय किया था |
सन १९६२ में चीन देश जिसने हिन्दी चीनी भाई भाई का नारा बुलंद किया था उसी ने भारत की भूमि पर आक्रमण कर दिया | दोस्ती से पकड़े हाथ को चीनियों ने काटना चाहा था | परन्तु भारतीयों की सतर्कता के सामने वे अपना मकसद हासिल  कर सके और मुहं की खाकर उन्हें  वापिस लौटना पड़ा | भारत  के पास अत्याधुनिक रडार  होने के कारण चीनियों के हवाई जहाज इसकी सीमा के अन्दर तक वार करने में तो कामयाब हो गए परन्तु अधिक नुकसान  पहुंचा सके थे | 
चीनियों की इसी कामयाबी को देखते हुए तथा यह सोचकर की भविष्य में फिर कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न  हो भारत की सरकार ने अपने देश में रडार श्रंखला बनाने का फैसला लेते हुए अपनी भारतीय वायु  सेना का विस्तार करने की ठान ली | सरकार ने  अपनी योजना को अंजाम देने के लिए रडार कर्मियों की भर्ती शुरू कर दी |
 यह जानकर  मेरे अन्दर देश सेवा करने की भावना उत्पन्न हुई साथ में मन में आगे पढ़ने की लगन तथा जवानों के प्रति देशवासियों का लगाव देखकर ही मैनें भारतीय वायु सेना में रडार आपरेटर बनना स्वीकार कर लिया था | हालांकि जब मैं वायु सेना में भर्ती हुआ था तो मेरी उम्र अठारह  वर्ष पूरी नहीं हुई थी परन्तु हमारे गांव के कर्नल बलबीर के हस्तक्षेप से मुझे भर्ती करके 20-10-1963  को  ट्रेनिंग के लिए बैंगलोर भेज दिया गया |
सिक्स जी.टी.एस. बैंगलोर में ट्रेनिग महज एक औपचारिकता ही थी क्योंकि वहां केवल थियोरी ही पढ़ाई जाती थी जो हमारी पास की हुई दशवीं कक्षा के सामान थी | इसी लिए तो वहां के( इन्सट्रेक्टरमास्टर अपने विध्यार्थियों से अक्सर मजाक में कहा करते थे ' मारो बण्डल, फैंको   परैशीनो बोडीविल आशक यूंसम बोडीवील पास यूं' | अर्थात गप्प सप्प मारो, अपनी पढ़ने की किताबों को फैंक दो | आप से कोई कुछ नहीं पूछेगा, आपको कोई न कोई पास कर ही देगा | मास्टरों  का  कहना किसी हद तक ठीक था क्योकि असली ट्रेनिंग तो रडार यूनिट में ही जाकर होनी थी |
परंतु शुरू शुरू में मुझे वहाँ का रहन सहन, शख्त वातावरण तथा खाना पीना रास नहीं आया था | वैसे मैनें सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं, एक कमजोर सेहत का बच्चा, कभी फौज में भी जा सकता हूँ | ट्रेनिंग सैंटर के शख्त एवं सूची बद्ध कार्यक्रमों ने मेरे शरीर में भी जान फूंक दी  | वहाँ सुबह सवेरे दौड़ लगाने जाना पड़ता था | वहाँ से आकर फटाफट तैयार होकर तथा नाशता खाकर सुबह की हाजिरी परेड़ में सम्मिलित होना पड़ता था | मुझे अब भी याद है कि उस परेड़ का कमांडर सार्जेंट नाम्बियार बहुत ही शख्त एवं बाज की दृष्टि रखता था | अपने से 100 मीटर दूरी पर खड़े जवान की दाढ़ी बनी या नहीं बनी, किस ने जूतों पर पालिस नहीं की, इस हफ्ते किसने सिर के बाल नहीं बनवाए, किसके कपड़े गन्दे हैं तथा किस में क्या कमी है वह एक नजर में ही पहचान लेता था | यह सब जानकर वह चुप नहीं रहता था | वह शख्त सजा देता था | अतः उसके सामने आने से सब कतराते थे
बैंगलोर से ट्रेनिंग पास करके मै अपनी पहली बदली पर जम्मू गया था | यह स्थान मुझे कोई अजनबी नहीं लगा क्योंकि मेरे साथ बैंगलोर में रहे मेरे सात और साथी मेरे साथ ही यहां आए थे | हमें जम्मू के सतवारी इलाके में रडार यूनिट पर तैनात कर दिया गया | यहां शिफ्ट ड्यूटी में काम करने के कारण बहुत सा खाली समय मिलता था | वहां मैंने देखा था कि अधिकतर जवान खाली समय का सदुपयोग  करके जुआ, शराब, गप्प सप्प और नशीले पदार्थ इत्यादि व्यसनों को अपनाना ज्यादा पसंद करते थे | मैं तो अपना एक ध्येय लेकर ही वायु सेना में भरती हुआ थावह था उच्च शिक्षा ग्रहण करना | अत: जम्मू पहुँचने के बाद मैनें  अपने साथियों से सलाह मशवरा किया तो मेरे  साथी उससे सहमत हो गए |
केवल कृष्ण ने कहा, "मेरी रुचि तो यहां चलने वाले जूए और शराब में बिलकुल नहीं है |"
राकेश बोला, "देखो भाई आप तो सभी जानते हैं की मैं शादी शुदा हूं इसलिए अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिए मैं उन्नति ही करना चाहूँगा |" 
इन्द्र दत्त ने ऐसे कहा जैसे उसके मुहं का जायका खराब था, "मुझे तो  इस नौकरी में अभी से घुटन सी महसूस होने लगी है | मैं तो इसे छोड़ना चाहता हूँ  तथा आगे पढाई करना चाहता हूँ |"  
विध्यार्थी ने अपनी रुचि हम सबकी हाँ में हाँ मिलाकर जता दी | इस पर मैनें फैसला सुनाते हुए कहा, "तो साथियो यह तय हो गया है की हम सभी मिलकर अपना लक्ष्य अपनी शिक्षा की उन्नति को मानते हैं |"
इसके बाद चारों साथियों ने जम्मू विशव विध्यालय से स्नातक की प्रथम वर्ष की परीक्षा के लिए फ़ार्म भर दिए और सभी उतीर्ण भी हो गए | इस शैक्षिक शिक्षा के साथ साथ चारों ने अपने भारतीय वायु सेना में अंदरूनी होने वाली सभी परीक्षाएं भी समय पर पास कर ली |
पठानकोट से जम्मू जाने वाली सड़क पर एक स्थान सतवारी पड़ता है | यह जम्मू इलाके की छावनी है | शहर की भीड़भाड़ से दूर यह शांत इलाका होने के साथ साथ हरा भरा इलाका भी  हैमुख्य सड़क पर होने के कारण यहाँ आने जाने में किसी प्रकार की कोई दिक्कत नहीं होती |
मेरी रडार यूनिट सतवारी में ही एक लम्बे चौड़े मैदान के बीचों बीच थी | रडार यूनिट चारों और से : फुट से भी ऊंची ऊंची घास से घिरी थी | घास क्या उसे बांस का छोटा रूप कहना उचित होगा | काम करने वालों को अपनी यूनिट जाने के लिए इसी घास के बीच बनी पगडंडी से जाना पड़ता था | घास इतनी घनी थी कि दिन में भी नीचे की जमीन ठीक से दिखाई नहीं देती थी | थोड़ा अन्धेरा होते ही उस घास के बीच से गुजरते हुए डर सा लगने लगता था कि कहीं कोई जी-जनावर पैरों के नीचे आकर कुछ नुकसान  पहुंचा दे | 
सतवारी में जम्मू का हवाई अड्डा भी है | उसके समानांतर एक सड़क है जो आगे एक क़स्बे में स्थित प्रसिद्द पीर बाबा की मजार तक जाती है | हर शुक्रवार को पीर बाबा की मजार पर सैकड़ों  लोग  अपनी अपनी मन्नत माँगने आते थे |अत: अच्छी खासी भीड़ लग जाया करती थी |  इसी सड़क के दूसरी तरफ हमारी रडार यूनिट थी |   
सैनिकों की बैरक से १०-१५ मिनट चलने के फासले पर एक छोटा सा बाजार था जहां रोजमर्रा की जरूरत का हर सामान मिल जाता था | इसी के पास एक नहर बहती थी जिसका पानी बहुत निर्मल, स्वच्छ तथा बहुत ठंडा होता था |
कहा जाता है कि देहली का अपना कोई प्राकृतिक वातावरण नहीं है | अगर पहाड़ों पर बर्फ गिर जाए तो देहली में ठण्ड महसूस होने लगती है नहीं तो गर्मी के कारण झुलसती रहती है | उसी प्रकार जम्मू का वातावरण भी श्री नगर के पहाड़ों के मौसम पर निर्भर रहता है | हाँ इतना अवश्य है कि जम्मू में बहती नहरों  का पानी हमेशा खूब ठंडा रहता है | गर्मियों की हर शाम सतवारी में बहने वाली नहर के किनारे मेला सा लगा रहता था | लोग अपने फल वगैरह एक पोटली में बांधकर नहर के बहते जल में डुबो देते थे और फिर ठंडा होने पर उन्हें खाकर तरोताजा महसूस करते थे |  
उन दिनों हमारी रडार यूनिट के कमांडर स्क्वाड्रन लीडर बावा, जम्मू इलाके के स्टेशन  कमांडर का पद भार भी संभाले हुए थे | वे जवानों को अपने खाली समय का सदुपयोग करके अपनी योग्यता बढाने  को प्रेरित  करते रहते थे | उनके द्वारा प्रोत्साहन दिए जाने के कारण ही मैं तथा मेरे सभी साथी जम्मू यूनिवर्सिटी से स्नातक की प्रथम वर्ष की परीक्षा पास करने में सफल हो गए थे |  
 सन १९६५ में मेरे से बड़े मेरे भाई औम प्रकाश मेरे से मिलने जम्मू आए | हमने वैष्णो  देवी के दर्शन का प्रोग्राम बना लिया | उन दिनों वैष्णो माता पर जाने के लिए पक्का रास्ता  था | पथरीली तथा उबड़ खाबड़ पगडंडी भर थी | रास्ते पर रात को रोशनी करने का कोई साधन नहीं था | रात को चढ़ाई करने नहीं दी जाती थी क्योंकि जंगली जानवरों का खतरा रहता था | गर्भ जून था तो सही परन्तु उसमें जाने से लोग डरते थे क्योंकि उसके चारों तरफ बेतरतीब जंगली झाड़ियाँ उगी थी | इससे भय रहता था कि कहीं किसी जगंली जानवर ने उसमें शरण ले रखी हो | माँ वैष्णों देवी के दरबार में जाने तथा वापिस आने के लिए केवल गुफा का ही द्वार था | गुफा के अन्दर रोशनी के लिए केवल डिबरी का ही सहारा था
औम प्रकाश एक दबंग किस्म के व्यक्ति थे | देवी के दर्शन करने के बाद हम श्री नगर जा रहे थे | बस में हमारे आगे की सीट पर एक औरत बैठी थी | लम्बे सफ़र तथा थकावट के कारण मैनें अपने पैर अगली सीट के नाचे फैला लिए थे तथा मुझे नींद की झपकी  गयी | घुमावदार रास्तों के कारण मेरे पैर हिल हिलकर एक दो बार आगे वाली सीट पर बैठी औरत के पैरों से स्पर्श कर गए होंगे | उसने इसे छेड़खानी समझते हुए बड़े तेज तर्रार शब्दों में कहा, " छेड़खानी करता है | पिटेगा क्या ?"
इससे पहले की बस में बैठी सवारियां कुछ प्रतिक्रिया दिखाती मेरे भाई ने उस औरत की
तीखी आवाज सुनकर  बिना किसी हिचकिचाहट के उलटा गुर्राया, " वैजयंती माला तू ही मिली है हमें छेड़खानी करने को, अपनी शक्ल भी देखी है शीशे में ?"
औम प्रकाश के इतना कहते ही वह औरत चुपचाप बैठ गयी और फिर पूरे रास्ते उसने चूँ तक नहीं किया |  
मुझे जल्दी ही महसूस होने लगा कि फौज की नौकरी हमारे जैसे भावुक बच्चों को नहीं फब सकती | फौज के माहौल में वही पनप सकता है जो अपनी आँखे, जजबात, दिमाग तथा जबान बन्द रखे तथा कान खुले रखे | यह मेरे लिए मुमकिन नहीं था | इसलिए मैनें जल्दी से जल्दी उच्च शिक्षा प्राप्त करके फौज की नौकरी छोड़ने का निर्णय ले लिया | परंतु  'बन्दा जोड़े पली पली और राम बढ़ावे कुप्पा' वाली कहावत चरितार्थ हो गई | स्नातक की प्रथम वर्ष की परीक्षा पास करते ही पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया जिसने मेरी आगे की पढ़ाई पर रोक लगा दी          
पाकिस्तान से युद्ध के दौरान मुझे भारत के साथ चीन की पिछली लड़ाई याद आ गई जिसमें भारतवासियों के जवानों के प्रति अथाह प्रेम, त्याग, ममता तथा हर प्रकार का समर्पण, देखकर ही मैं भारतीय वायु सेना में भर्ती होने को लालायित  हो गया था |   
खबरें   रही थी की इस बार भी अपने देशवासी अपने सैनिकों को खुले दिल से काजू, बादाम, किशमिस, पिस्ताछुआरेबिस्कुट, फल, पहनने का सामान और कम्बल इत्यादि प्रचुर मात्रा  में भेज कर उनका प्रोत्साहन बढ़ा रहे थे |
पाकिस्तान की लड़ाई चलते एक दिन हमारी यूनिट के सार्जेंट रंधावा ने सभी जवानों को अपने यहाँ की रणनीति समझाने के लिए इकट्ठा किया | सभी जवान पंक्ति बद्ध खड़े थे कि  उसने एक संतरा हवा में उछालकर जोर से कहा, " जवानों पकड़ो |"
अधिकतर जवान संतरा पकड़ने के लिए उछल पड़े | फिर तो रंधावा फलों और बिस्कुटों के पैकटों को एक एक करके उछालता रहा और जवान उन्हें पकड़ने के लिए धमा चौकड़ी करते रहेमैंने उस धमा चौकड़ी में कोई हिस्सा लिया अपितू शांत स्वभाव सभी को उछलता कूदता देखता रहा | जब यह खेल समाप्त हो गया तो रंधावा ने बताया कि ये सब चीजें हमारे लिए हमारे देशवासियों ने भेजी हैं |
सार्जेंट रंधावा की बात सुनकर मैं सोच में पड़ गया | ताजा खबरों के अनुसार तथा १९६२ में चीन के साथ लड़ाई के दौरान तो मैनें प्रत्यक्ष देखा था कि ऐसी कठीन परिस्थिति में भारतवासी  अपने जवानों के लिए कितना कुछ भेजते हैं | परन्तु रंधावा द्वारा उछाले गए सामान में किसी भी मेवा या महंगे सामान का नामों निशाँ नहीं था | ही ऐसा सामान कहीं रखा दिखा जो बाद में बांटा जा सकता था |  मेरा मन खिन्न हो गया क्योंकि देशवासी सभी चीजें सभी के लिए भेजते हैं | इसलिए हर सैनिक का हक़ बनता है कि आई हुई हर वस्तु सलीके से वितरित की जाती | परन्तु आज सार्जेंट का रवैया देखकर ऐसा महसूस हुआ जैसे वह किसी रिफ्यूजी कैम्प में रह रहे भूखे लोगों को जो चारों और से बाढ़ के पानी से घिरा हो को खाने का सामान ऊपर से फैंक कर उन तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा था |  
वायु सेना में भर्ती होते समय मेरे मन में फ़ौज के सैनिकों के सम्मान में उनके देशवासियों द्वारा तन, मन एवं धन से अर्पित सेवाओं का खुमार बसा था | परन्तु फ़ौज में हुक्मरानों के भ्रष्टाचार  भरे रवैये को देखकर मेरा खून खौल उठता था | परन्तु मैं क्या कोई भी सैनिक इन बातों का प्रतिरोध करने की जुर्रत भी नहीं कर  सकता था | ऐसी बहुत सी घटनाओं  ने एक एक करके मेरे फ़ौज छोड़ने के निशचय को मजबूती प्रदान करने में बहुत योगदान दिया |  वास्तव में ही फ़ौज भावुक लोगों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है |   


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